भारतीय संस्कृति में दीपावली..जो दीप जलाता है,वह अश्वमेध यज्ञ करने का फल करता है प्राप्त..!

भारतीय संस्कृति में दीपावली..जो दीप जलाता है,वह अश्वमेध यज्ञ करने का फल करता है प्राप्त..!

   candles-or-diyas-on-diwali-1446965063ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजान:सपर्यन्कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन्।अत्रि: सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरपमाया अघुक्षत।।यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविघ्यदासुर।अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन्।।ऋग्वेद की यह श्रुति कहती है कि अग्नि का आविष्कार सबसे पहले महर्षि अत्रि ने किया। वे हमेशा पत्थरों को टकराते हुए अग्नि को उत्पन्न करते थे। अत्रि के द्वारा अग्नि का आविष्कार इसी दीपावली के दिन हुआ। यही कारण है ऋग्वेद काल से यह अग्नि प्रज्वलित करने की अर्थात दिए के द्वारा दीप जलाने की परम्परा मनाई जा रही है। बाद में विविध कारण इस पर्व के साथ जुड़ गए। जैसे श्रीराम का अयोध्या लौटना, श्री कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध, आदि घटनाएं जुड़ गईं। यह पर्व हमारे राष्ट्र पर्व के रूप में उभरा। इस पर्व को आज के रूप में मनाने की परम्परा कब शुरु हुई है यह कहना कठिन है। बृहदारण्यक उपनिषद के ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ वाक्य से यह पता चलता है कि यह पर्व न केवल सामाजिक है अपितु  आध्यात्मिक भी है। पुराण काल से विविध देवताओं की उपासना के चलते दीपावली पर्व में भी विविध देवताओं की उपासना की जाती है।जब सूर्य का अन्धकार से आच्छादन हुआ अर्थात सूर्य ग्रहण हुआ तब महर्षि अत्रि ने ही इस ग्रहण तत्त्व को समझकर उस अंधकार को हटाकर सूर्य तेजस को वापस लौटाया। सूर्य तेजस वापस लौटाने के दिन अमावस्या थी इसलिए इस दिन सूर्य के प्रतीक के रूप में दीपक जलाकर दीपावली मनाने की परम्परा शुरु हुई। दीपोत्सव की परम्परा वेद काल से ही चली आ रही है।इस पर्व की अति प्राचीनता मोहन-जोडड़ों में मिले मिट्टी के दीपकों से भी प्रमाणित होती है। दीपावली (दीपों की आवली अर्थात श्रृंखला) दीपाली (दीपों की आली यानि श्रृंखला) ये दोनों शब्द ठीक हैं। इन्हीं से निकला दिवाली शब्द है जो कि अपभ्रंश है।
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल (दीपावली)
आजकल दीपावली पर्व, धनतेरस, नरकचतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भाई दूज के नाम से पांच दिन मनाया जाता है। धनतेरस यानि धनत्रयोदशी अथवा धन्वंतरि त्रयोदशी के नाम से प्रसिद्ध इस त्रयोदशी में सभी प्रकार के धर्म कार्य करना चाहिए क्योंकि इस त्रयोदशी को वराहपुराण में धर्म तिथि के नाम से उल्लेख किया गया है। इस दिन कुबेर की भी उपासना की जाती है। इस समय बरतन आदि खरीदने की प्रथा है।नरकासुर के वध के उपरांत उस की प्रार्थना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गए वर के अनुपालन में नरकचतुर्दशी मनाई जाती है। दीपावली तो इन पांच दिनों के मध्य का पर्व है जो कि लक्ष्मी के पूजन के रूप में मनाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अति वृष्टि से गाय व लोगों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। यम और उसकी बहन यमी के इस दिन मिलन के कारण यह भ्रातृद्वितीया यानि भाई दूज के नाम से बहनों के द्वारा भाईयों के सत्कार के रूप से मनाया जाता है। दीपावली के नाम जाना जाता यह पर्व भगवान को दीप जलाकर पूजा करने का दिन है। इस पर्व पर जो दीप जलाएगा वह संसार के संकटों से मुक्त होगा।दीपावली के पर्व पर सात प्रकार के पदार्थ से दीपक जलाया जा सकता है। वे हैं घी, तिल का तेल, सरसों का तेल, राई तेल, किसी फल से प्राप्त तेल जैसे मूंगफली आदि नवनीत और चीने का तेल। वैसे ही दीपक की बातियों के भी कई प्रकार शास्त्रों में कहे गए हैं। जैसे कमल के सूत्र, कुश के सूत्र, सन और कपास आदि। वैसे दीपक भी लोहे, मिट्टी, काष्ट और नारियल के किसी भाग से बना हुआ होना चाहिए। दीप जलाते समय यह भी ध्यान देना है कि भूमि जैसे ताप प्राप्त न करे ऐसे दीपक जलाना है। कभी भी तेलों का मिश्रणकर दीपक नहीं जलाना चाहिए। ऐसे करने वाला तामिस्त्र नामक नरक प्राप्त करता है।भारतीय हर वर्ष कार्तिक अमावास्या के दिन दीपक जलाकर उत्सव मनाते है। दीपावली पर अमावस्या के दिन जो दीप जलाता है वह अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है और सभी तीर्थों में स्नान करने का फल तथा सभी पापों से भी मुक्त होता है।  (विनायक फीचर्स) आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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