भगाया जा सकता है परीक्षा का भूत..!

भगाया जा सकता है परीक्षा का भूत..!

 कल पहला पेपर, पता नहीं कैसा होगा? जो कुछ पढ़ा था, सब भूलता जा रहा है। जाने क्या होगा? ऐसी कितनी ही बातें एक परीक्षार्थी के मन में परीक्षा के दिनों में उभरती हैं और तनाव का कारण बनती हैं। कभी-कभी यह तनाव इस सीमा तक बढ़ जाता है कि इसके कारण परीक्षार्थी वर्ग के सामने अनेक मानसिक तथा शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। आज परीक्षा के इस भूत से बचने के लिए प्रत्येक विद्यार्थी सदा प्रयत्नशील रहता है।
परीक्षा के दिनों में प्रत्येक विद्यार्थी अपने सारे क्रिया-कलाप भूलकर केवल दिन-रात मेहनत में जुट जाता है जो तनाव का एक मुख्य कारण बनता है। परीक्षा की तैयारी के लिए विद्यार्थी वर्ग का क्या केवल उन्हीं दिनों की पढ़ाई पर निर्भर रहना उचित है? क्या परीक्षा की तैयारी उसी दिन से आरंभ नहीं की जा सकती जब नई कक्षा का पहला दिन हो? क्या विद्यार्थियों को पूरे वर्ष भर चाहे परीक्षा हो अथवा नहीं, एक टाइम टेबल के अनुसार नहीं पढऩा चाहिए? क्या उन्हें अपने अन्य क्रिया कलापों को भी पढ़ाई के समान ही महत्त्व नहीं देना चाहिए?
सी. बी. एस. ई. के पूर्व अध्यक्ष अशोक गांगुली के अनुसार ”विद्यार्थियों को पूरे वर्ष भर का टाइम टेबल शुरू में ही बना लेना चाहिए और रोज के केवल दो या तीन घंटे ही परीक्षा की तैयारी के लिए काफी होते हैं। यदि विद्यार्थी वर्ष भर सभी विषयों में टच में रहते है तो उन्हें परीक्षा के समय किसी भी प्रकार के तनाव या बोझ अनुभव नहीं होगा।
परीक्षा आखिर क्या है? आज इस प्रश्न का उत्तर तलाशना कठिन है। प्रतिस्पर्धा के इस युग में क्या तीव्र तथा कुशाग्र बुद्धि वाले विद्यार्थियों के चयन को ही परीक्षा माना जाए या फिर एक साथ अनेक विद्यार्थियों की बुद्धि की जांच को ही परीक्षा माना जाए? अथवा परीक्षा केवल अपने को परखने का एक माध्यम है।
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सही मायने में अगर देखा जाए तो परीक्षा एक ऐसी अवस्था है जिसमें विद्यार्थी के ज्ञान की जांच करके उसे आगे बढऩे का मौका दिया जाता है। यदि परीक्षा केवल ज्ञान की जांच ही है तो फिर क्या इसकी तैयारी भी इसी प्रकार से नहीं की जानी चाहिए? प्रत्येक विद्यार्थी का उद्देश्य ज्ञान अर्जन होना चाहिए न कि परीक्षा में सफलता या असफलता पाना। यदि विद्याथी वर्ग अपनी पाठ्य पुस्तकों को अधिक से अधिक ज्ञान अर्जन करने में सफल होते है तो वह परीक्षाओं में भी अवश्य ही सफल होंगे।
परीक्षा के दिनों में विद्यार्थियों में अक्सर यह देखा जाता है कि अपनी नियमित दिनचर्या को भूलकर केवल दिन रात की मेहनत को ही अपना कर्तव्य समझने लगते हैं जिसे उचित नहीं माना जा सकता।
दैनिक कार्यों का महत्व उन दिनों में कुछ अधिक बढ़ जाता है जब यह वर्ग परीक्षाओं से उत्पन्न होने वाले तनाव से गुजरता है। इस तनाव से बचने के लिए व्यायाम एक सही साधन सिद्ध हो सकता है। यदि दिन की शुरूआत व्यायाम से की जाए तो अपने पूरे दिन को व्यवस्थित किया जा सकता है।
पढ़ते समय घंटों से अधिक महत्त्व एकाग्रता को देना चाहिए। किसी भी विषय को अगर पूरी लगन और एकाग्रता से पढ़ा जाए तो केवल एक या दो घंटे ही काफी होंगे। यदि एकाग्रता के साथ नहीं पढ़ा जाए तो उसी विषय को पांच-पांच घंटे पढऩा भी व्यर्थ माना जाएगा। यह पूर्ण सत्य है कि यदि शरीर और मन दोनों स्वस्थ न हों तो दिमागी कसरत भी ठीक प्रकार से नहीं की जा सकती, इसीलिए विद्यार्थी वर्ग को अपनी पूरे दिन की मेहनत को ही परीक्षा की तैयारी के लिए सही मार्ग नहीं मानना चाहिए।
परीक्षा के इस तनाव से बचने के लिए डॉक्टरों द्वारा भी अनेक उपाय सुझाए जाते हैं। इन दिनों में विद्यार्थियों में मुख्य रूप से पढ़ते समय घबराहट होना, भूल जाना, अधिक नींद आना या नींद न आना, फेल होने के सपने आना, कम अंक पाने का डर आदि बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं। उनके अनुसार इसका एक मुख्य कारण बच्चे से स्कूल तथा परिवार की बड़ी-बड़ी उम्मीदें जुड़े होना भी है। स्वभाव से संवेदनशील होने के कारण यह वर्ग यह सोच-सोचकर परेशान होता है कि यदि वह सबकी उम्मीदों पर खरा न उतरा तो क्या होगा?
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मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐसे समय में बच्चों को अपने अभिभावकों तथा अध्यापकों की एक खास देखभाल तथा दोस्ती की आवश्यकता होती है। आज के समय में यह डर इतना बढ़ चुका है कि इससे बचने के लिए युवा तथा किशोर वर्ग दवाओं का भी सहारा लेने लगे हैं जो सही नहीं है। इस तरह वह केवल अपनी समस्याओं में बढ़ोत्तरी ही करता है। इसीलिए अभिभावक तथा अध्यापक वर्ग को चाहिए कि वह बच्चे से उसकी क्षमता के अनुरूप ही आशा रखें और उसके भविष्य को संवारने में उसकी मदद करें।
परीक्षाओं में अच्छे अंक पाने के लिए कुछ बातों का ध्यान अवश्य ही रखना चाहिए:-
– प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट तथ्यपूर्ण तथा संक्षिप्त होना चाहिए।
– गाइडों तथा कुंजी की भाषा के बजाय अपनी भाषा का प्रयोग करें।
– शब्दों की सीमा का ध्यान अवश्य रखें।
– विषयों के अध्यापकों से नए पैटर्न, जांचने के नए तरीके और मार्किंग के बारे में अवश्य सलाह कर लें।
– अच्छी तरह स्पष्ट लिखाई की महत्ता को समझें।
– विषय को रटने के बजाय उसे अच्छी तरह समझने की कोशिश करें।
यदि परीक्षा के दिनों में इन बातों का ध्यान रखा जाए तो अच्छे अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।
वर्तमान समय में कम्प्यूटर की उपयोगिता बढ़ती जा रही है। जिस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में यह उपयोगी सिद्ध होती है उसी प्रकार परीक्षाओं के लिए भी यह छात्र-छात्राओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
कम्प्यूटर इस वर्ग का एक अच्छा साथी माना जा सकता है। यह न केवल इस वर्ग की समस्याओं को सुलझाने में सहायता करता है बल्कि उनके लिए एक लायब्रेरी का भी कार्य करता है। आज ऐसे अनेक वेबसाइट उपलब्ध हैं जो इस दिशा में कार्य करने के साथ-साथ उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उनका मार्गदर्शन भी करती हैं।
परीक्षा की तैयारी में इस साधन का उपयोग छात्रा-छात्राओं के लिए अति सहायक सिद्ध हो सकता है। परीक्षा की तैयारी के लिए अपनी पाठ्य पुस्तकों पर निर्भरता को ही उचित माना जाना चाहिए। गाइड आदि तो केवल हेल्पबुक ही हैं। वह तो केवल थोड़ी बहुत सहायता ही कर सकती हैं पर वर्तमान समय के बच्चों की समस्या ट्यूशन आदि पर पूरी तरह निर्भर होने की वजह से कम होने के बजाय बढ़ रही है।
इन सभी अतिरिक्त साधनों को अपनी पाठ्य पुस्तकों के बाद ही महत्ता देनी चाहिए क्योंकि प्रश्नपत्र के अधिकतर प्रश्न पाठ्य पुस्तकों पर ही आधारित होते हैं।भारत में ‘अल्लाह का इस्लाम’ चलेगा या ‘मुल्ला का’…!
सैम्पल पेपर आदि भी परीक्षा की तैयारी का एक अच्छा साधन सिद्ध हो सकता है। आज ट्यूशन प्रत्येक विद्यार्थी की मजबूरी बन चुका है परन्तु यह मार्ग बच्चों की सहायता के बजाय उनकी समस्याओं को बढ़ावा ही देता है क्योंकि अधिकतर ट्यूशन के कर्ताधर्ताओं का मुख्य उद्देश्य केवल धन कमाना ही होता है। यदि वे इस वर्ग की समस्याओं को सुलझाने में मदद करते हैं तब तो इसे फायदेमंद माना जाना चाहिए अन्यथा नहीं।
गणित जैसे विषय से डर अनेक विद्यार्थियों के मन में होता है। इस विषय को जितना अधिक समझा जाए, उतने ही अच्छे अंक प्राप्त किये जा सकते हैं। हिसाब जैसे विषय में जितना अधिक महत्त्व अभ्यास को दिया जाए, उतना ही इसके डर से बचा जा सकता है। इसी प्रकार भौतिकी जैसे विषय में भी समझ बूझ कर ही अच्छे अंक पाए जा सकते हैं।
ये विषय केवल दसवीं या बारहवीं में ही नहीं अपितु कम्पीटीशन की तैयारी में भी महत्त्वपूर्ण होते हैं, इसीलिए इन परीक्षाओं की तैयारी को केवल उसी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।
अपनी कमजोरियों को अपने से बेहतर कौन परख सकता है? इसीलिए खुद को पहचानें, अपनी गलतियों से सीखें और उन्हें सुधारें। सफलता अवश्य ही प्राप्त होगी और तब यह परीक्षा का भूत भी गायब हो जाएगा।
– वीना शर्मा

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