बेगाने शहर में जुड़ते नये रिश्ते

बेगाने शहर में जुड़ते नये रिश्ते

एक उम्र के बाद घर से बाहर निकलना ही पड़ता है, पढ़ाई, करियर या तरक्की को मद्देनजर रखकर। बेगाने शहर में रहते-रहते धीरे-धीरे वो शहर ही अपना सा बन जाता है।
हर शहर का अपना मिजाज होता है। बावजूद इसके वो अपनी शरण में आये हर बाशिंदे को अपनी फैली हुई बांहों में समेट लेता है। उसे रोजी रोटी तो मिलती ही है, नये रिश्ते भी जुड़ जाते हैं अपनत्व लिए। ये रिश्ते घर का सा माहौल महसूस कराते हैं। सुख दुख में काम आते हैं। सपोर्ट सिस्टम बनकर जीवन सरल ही नहीं बनाते
बल्कि एक बड़ी ताकत की तरह साथ देते हैं।
बड़े शहर उदासीनता व बेरूख़ी के लिये ज्यादा जाने जाते हैं। यहां आदमी भीड़ में भी अकेलेपन का शिकार होता है। ‘हर तरफ, हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी’ शायर काफी हद तक सच कहता है लेकिन ये भी एक सच है कि यह आधा सच है। बड़े शहरों में दोस्त भी खूब बन जाते हैं। लाइकमाइंडेड पर्सन ढूंढने के लिए यहां चॉइस है। यहां भी मित्रता है और संबंध पनपते हैं। रिश्ते प्रेम के मजबूत धागों से जुड़ते हैं।
रश्मि देवेंद्र मध्यप्रदेश के एक छोटे शहर सागर से जब दिल्ली आए, वे काफी परेशान थे। अनजाना शहर, अनजाने लोग। दिल्ली के बारे में बहुत कुछ नेगेटिव बातें सुन रखी थीं। यहां दिखावा बहुत है। बस पैसे वालों की ही इज्जत है। कोई किसी का नहीं, सब अपने में रहते हैं। यहां लाइफ बहुत फास्ट और बिज़ी है इत्यादि इत्यादि।
लेकिन कुछ ही अरसे में देेवेंद्र के हंसमुख मिलनसार नेचर के कारण उनके बहुत से फेमिली फ्रैंड्स बन गए। ये लोग अक्सर वीक एंड पर मिलकर आउटिंग पर जाते हैं या एक दूसरे के घर पूल डिनर करते साथ-साथ बढिय़ा वक्त बिताते हैं।
टंकी के गर्म पानी के लिए दुआ …

वीरेंद्र राजस्थान के एक छोटे शहर ब्यावर से दिल्ली आया था। मां बाप का उसे अकेले भेजने के लिए थोड़ी चिंता होना स्वाभाविक था। एम.एम.सी करते हुए वीरेंद्र शुरू शुरू के काफी होमसिक फील करता था लेकिन वो जहां पी.जी.बनकर रह रहा था, वहां रहनेवाले बुजुर्ग दंपति से उसे इतना स्नेह और अपनापन मिला कि वो उस घर में एक सदस्य की तरह बन गया।
औरंगाबाद से जॉब के लिए अकेले दिल्ली रहने वाली कृति बताती है कि शुरू-शुरू में उसे नई जगह में काफी घबराहट महसूस होती थी, न रास्तों का पता था, न कोई जान पहचान। जहां कमरा मिला था, वहां से वर्कप्लेस 10 किलोमीटर दूर था। बसों के बारे में भी ठीक से जानकारी न थी। कई बार ऑटो से जाना पड़ा जो बहुत महंगा पड़ता था फिर दिल्ली में आटो पकडऩा भी हमारे शहर जैसा आसान न था कि आपने खाली ऑटो देखकर हाथ दिया और ऑटो रूक गया। एक महीना ऐसे ही गुजर गया। इस बीच कुछ अच्छे दोस्त बनने लगे थे। उनसे ही पता लगा कि मैं बेकार ही परेशान हो रही थी क्योंकि जिस जगह मेरा ऑफिस था, वहां से तो हर दूसरी तीसरी बस गुजरती है। इस तरह ऑफिस जाना अब समस्या नहीं रहा। दोस्ती भी जैसे तैसे प्रगाढ़ होती रही, रिश्ते जुड़ते चले गए। मोह, बंधन कसते गए।
उम्र के अहसास को बदलकर ही मिलता है चिर यौवन

वैशाली जो एक होटल में रिसेप्शनिस्ट है, बताती है कि अचानक तबियत खराब होने पर उसकी रूममेट ने उसकी एक सगी बहन की तरह देखभाल की। मां पापा बैंगलोर में थे। वे फ्लाइट से आना चाहते थे लेकिन मैंने ही उन्हें गरिमा की देखभाल के बारे में बताते हुए आने से मना कर दिया। पापा हार्ट पेशंट थे और मां को आर्थराइटिस की प्राब्लम, वे बेकार परेशान होते।
हम लाख बुरे वक्त की आलोचना करें, इसका नेगेटिव पहलू देखें लेकिन बेगाने शहर में जुड़ते ये मानवीय संवेदनात्मक, प्यार की ऊष्मा से लबरेज रिश्ते इस बात का अहसास जगाते हैं कि मानवता अभी खत्म नहीं हुई है। ये रिश्ते सांस लेते धड़कते जीवंत हैं। इन्हें चाहिए प्यार की ऑक्सीजन। ये रिश्ते उम्र भर के लिए होते हैं। एक शायर ने कहा
है। वो मेरे घर नहीं आता मैं, उसके घर नहीं जाता, मगर इन बातों से ताल्लुक मर नहीं जाता आगे की जिंदगी में आना जाना भले ना हो पाये लेकिन ताल्लुक कभी नहीं मरता।
– उषा जैन शीरीं

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