बिगडैल बच्चे है ..तो सुधरेंगे तो प्यार से ही…जानिये क्या है कारण…?

बिगडैल बच्चे है ..तो सुधरेंगे तो प्यार से ही…जानिये क्या है कारण…?

1जिन घरों में माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं, उन घरों के बच्चे कुछ ज्यादा ही शरारती होते हैं। ऐसे घरों में परिवार की समुचित देखभाल के बजाए पैसे को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है। जाहिर है, ऐसे बच्चे की ज्यादा अनदेखी हो जाती है। मां बाप के प्यार से महरूम यह बच्चे धीरे-धीरे इतने बिगडैल हो जाते हैं कि इन्हें काबू में रखना मुश्किल हो जाता हैं।
ऐसे बच्चे बहुत जिद्दी होते हैं। घर तो घर, स्कूल में भी लडते झगडते रहते हैं। घर की चीजों को इधर-उधर फेंकते रहते हैं। पहले जमाने की बात और थी जब बच्चों को डांट-डपट कर अंकुश में रखा जाता था। ज्यादा शरारती बच्चों की पिटाई भी हो जाती थी मगर फिर भी बच्चा न माना तो उसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जाता था लेकिन अब ऐसा संभव नहीं है।
बच्चों को डांटने मारने पर वे अदालत भी जा सकते हैं इसलिए नये जमाने के नौकरीपेशा मां-बाप की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए मनोवैज्ञानिकों ने बिग$डैल बच्चों के लिए दवाएं तैयार की हैं। डॉक्टर इस समस्या को अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिस्आर्डर एडीएचडी यानी प्यार की कमी से उपजा अनियमित व्यवहार बताते हैं। कहना न होगा कि पश्चिमी देशों में विकास की उपभोक्तावादी अवधारणा ने मां बाप और बच्चों के बीच पैसे को ला ख$डा किया है। नतीजतन इन देशों में बच्चों में एडीएचडी का असर साफ देखा जा सकता है। पिछले एक दशक में अकेले आस्टे्रलिया में एडीएचडी को ठीक करने के लिए दवाओं के प्रयोग में एक हजार गुना की बढोत्तरी हुई है लेकिन अब यहां के डॉक्टर मां-बाप के इस  व्यवहार पर सवाल खडे कर रहे हैं। उनका कहना है कि मां बाप अपनी खुशी के लिए बच्चों को खतरनाक किस्म की दवा की आदत डाल रहे हैं। भविष्य में इसके भयंकर नतीजे सामने आयेंगे।
सिडनी के कई अस्पतालों में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के पद पर काम कर चुके डॉ. माइकल ग्लिक्समैन बताते हैं कि एडीएचडी को ठीक करने के लिए दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल में जोखिम है। इसकी बजाय अगर मां-बाप अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी को समझते हुए उन्हें
 पर्याप्त समय दें तो इसका चुटकियों में हल मिल सकता है। वे चेतावनी देते हैं कि पश्चिमी समाजों में ऐसे बच्चों की संख्या बहुत तेजी से बढ रही है जिनका व्यवहार मां-बाप या टीचर की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता।
ग्लिक्समैन के अनुसार यहां के मां-बाप बिगडैल बच्चों को झटपट ठीक करना चाहते हैं। डॉक्टर भी उनको इस काम में मदद कर रहे हैं लेकिन डॉक्टरों को मां-बाप के दबाव में नहीं आना चाहिए। यही सही है कि कुछ बच्चों को रिटालिन जैसी दवा देना जरूरी है लेकिन आपत्ति इस बात पर है कि मां-बाप डॉक्टरों पर दबाव डालकर अपने बच्चों को यह दवा खिला रहे हैं ताकि वे आजादी से अपनी दुनिया का मजा ले सकें। भावनात्मक रूप से  बिगडैल बच्चों पर काफी शोध कर चुके ग्लिक्समैन ने कहा कि दरअसल,ऐसे बच्चों की समस्या उनके दिमाग में होती है। यह एक जटिल समस्या है जिसको इतनी आसानी हल नहीं किया जा सकता है लेकिन आजकल के मां बाप को कौन समझाये। क्या भारत के माता पिता इससे कुछ सबक लेंगे।
–  कु. चंद्रिका

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