बाल जगत: तरह-तरह की चोरियां

बाल जगत: तरह-तरह की चोरियां

बड़े भाई ने एक दुकानदार से उधार ले लेकर कई बार खाया परंतु किसी दिन उधार चुकाने को पैसे न हुए। सिर्फ वादे होते गये, वादे टूटते गये। एक दिन दुकानदार के सब्र का बांध टूट गया। उस दिन बड़े के साथ छोटा भाई भी था। दुकानदार ने बड़े भाई को पकड़ लिया, ‘आज पैसे लिए बिना न छोड़ूंगा बच्चू, निकालो पैसे। बहुत हो गये बहाने।’
‘आज छोड़ दीजिए। कल-परसों में पैसे जरूर हो जाएंगे। आज तो जेब में फूटी कौड़ी नहीं है।’ बालक ने कहा तो दुकानदार और सख्त हुआ, ‘बहुत बार सुन चुका यह बातें, अब चुपचाप पैसे निकाल।’
छोटा भाई परेशान हो उठा। कहीं भीड़ एकत्र न हो जाए, खबर कहीं घर तक न पहुंच जाए। बोला, ‘सेठ मैं वादा करता हूं, परसों तक आपको आपके पैसे मिल जाएंगे।’
दुकानदार बोला,’ सोच ले फिर से, जो कह रहा है उसे पूरा कर भी पाएगा। तेरा भाई तो बड़े वादे कर चुका।’
छोटे भाई ने कहा,’ मेरा विश्वास करो सेठ, मैं अवश्य ही कल शाम तक आपके पैसों का इंतजाम कर लूंगा।’
दुकानदार ने कहा,’तू कह रहा है तो कल तक की मोहलत देता हूं। अगर मुझे पैसे परसों न मिले तो मैं तुम दोनों के बस्ते रख लूगा।’
दोनों भाई ईश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने रास्ते पर बढ़े। छोटा बोला,’शुक्र है आज तो बच गये। मैंने कह तो दिया कि परसों पैसे दे देंगे पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि पैसे का इंतजाम मैं कहां से करूं?’
बड़ा भाई बोला,’यही तो मैं भी सोच रहा हूं, मोहन। आखिर पैसे की व्यवस्था कैसे हो। पिता जी से मांगे तो पैसे तो मिलने से रहे, उल्टे डांट पड़ेगी।’
दोनों भाई घर गये। हाथ-मुंह धोया, खाया-पिया और फिर उसी विषय पर सोचने लगे। बड़े भाई के दिमाग में एक युक्ति सूझी। मां किसी काम में लगी तो उसने चुपके से मां का सोने का कड़ा बक्से से निकाल लिया। छोटे भाई को दिखाकर कहा, ‘मेरे दिमाग में एक विचार आया है। तुम बताओ कैसा रहेगा? इस कड़े में से सुनार से थोड़ा सा सोना निकलवा कर सुनार को बेच देते हैं। कर्ज भी चुक जाएगा और मां-पिता जी को पता भी नहीं चलेगा।’
छोटा भाई कोई हल सोच नहीं पाया था। उसे भी यही योजना ठीक लगी। वे सुनार के पास गये और थोड़ा सा सोना निकलवा कर सुनार को बेच दिया। जो पैसे मिले, दुकानदार का हिसाब चुकता कर दिया।
एक बड़ी बला टल गई पर छोटे भाई को अपराध बोध ने धर दबोचा। वह पूरी रात सो नहीं पाया। सुबह भाई से अपना दुखड़ा सुनाया। बड़े भाई ने सांत्वना दी, समझाया परंतु छोटे को पल भर चैन नहीं। वह लगातार खुद को धिक्कार रहा था कि उसने चोरी की है। उसे ईश्वर से डर लगता था। संस्कार ही ऐसे मिले थे कि चोरी करना या किसी के अपराध में साथ देना पाप है।
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वह सोच रहा था भले ही उसकी चोरी को किसी ने नहीं देखा, भले ही उसकी चोरी कभी न पकड़ी जाए परंतु ईश्वर तो सब देख रहा है। उसे क्या जवाब दूंगा और अगर चोरी का पता चल गया तो क्या होगा। उन दिन बालक का मन पढ़ाई लिखाई में भी नहीं लगा। अपने किये पर पछतावा बड़े भाई को भी था परंतु छोटा तो अपराध बोध से मरा जा रहा था। उसे लगा उसके शरीर में जान ही नहीं है।
स्कूल से घर लौटने पर भी हालत खराब थी। हारकर उसने पिताजी को सब बताने की ठान ली मगर पिता जी के सामने जाकर बताने की उसमें हिम्मत न थी। उसने पिता जी को संबोधित कर एक पत्र लिखा और उसमें सारा वृत्तांत लिख दिया। पिता जी के तकिए के नीचे पत्र रखकर उसे हल्कापन अनुभव हुआ। उसकी शक्ति वापस लौटने लगी। वह सजा भोगने के लिए खुद को तैयार करने लगा। उसने पत्र में फिर अपराध न करने की प्रतीज्ञा की थी।
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पत्र पढ़कर पिताजी ने उसे न मारा, न डांटा। भूल स्वीकारने और भविष्य में ऐसी गलती न करने की प्रतीज्ञा को पिताजी ने श्रेष्ठ मानवीय गुण कहा और सीने से लगाकर उसकी पीठ ठोंकी। यही बालक मोहन दास कर्मचंद गांधी था जो आगे चलकर महात्मा गांधी कहलाया। उसे बापू नाम भी मिला और राष्ट्र ने श्रेष्ठ मानवीय गुणों तथा सत्य और अहिंसा के सिद्धांत के कारण उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दी।
महात्मा गांधी ने चोरियों के विभिन्न प्रकार लिखे-‘हम सब थोड़ी बहुत चोरी करते हैं-जानबूझकर या अनजाने में। दूसरे की चीज को बिना उससे मांगे ले लेना भी चोरी है। कभी कभी मानव अपने परिवार से भी चोरी करता है जैसे बच्चों या पत्नी से छुपाकर कुछ खा लेना। राह में पड़ी चीज उठा लेना चोरी है। आप समझते हैं पड़ी चीज आपने चुराई नहीं, आपको मिली है लेकिन वास्तव में आप उसके स्वामी नहीं हो सकते। उसकी स्वामी सरकार है। छोटी-छोटी चोरियां जैसे किसी की कलम उठाकर लिख लेना, बिना मांगे कोई भी वस्तु इस्तेमाल कर लेना चोरी है। इसलिए चोरी से बचना चाहिए।
– ए.पी. भारती

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