बाल जगत: मैं पेड़ हूं

चन्द दिन पहले मेरे आस-पास घना जंगल था लेकिन आज मैं वीराने में खड़ा हूं। आहिस्ता आहिस्ता मेरे सभी साथी पेड़ आरी की भेंट चढ़ गये हैं और मैंने अपने साथी पेड़ों की मौत पर कोई मातम नहीं मनाया है।
जिसने सारा जीवन भले कार्यो में बिताया हो, किसी की खुशी के लिए मौत को गले लगाया हो, उसकी मौत पर आंसू बहाना तो उसका अपमान है।
परंतु दुख तो इस बात का है कि मेरे साथी पेड़ों का बलिदान मनुष्य को लाभ पहुंचाने के साथ-साथ संपूर्ण जीव जगत को हानि पहुंचा रहा है।
दुनियां भर में मनुष्य मेरे साथी पेड़ों का सफाया करने में जुटे हुये हैं। सर्वेक्षण के अनुसार दुनियां की लगभग छह करोड़ भूमि प्रतिवर्ष वन विहीन कर दी जाती है। अकेले भारत में ही सोलह लाख हेक्टेयर क्षेत्र के जंगल प्रतिवर्ष उजड़ रहे हैं। मेरे साथी पेड़ों का यह विनाश पर्यावरणीय प्रदूषण को जन्म दे रहा है।
मेरे हरे भागों में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा वातावरण की कार्बन डाइआक्साइड को आक्सीजन में विघटित करने की अद्वितीय क्षमता होती है। यह मुक्त आक्सीजन वायुमंडल के कार्बन डाइआक्साइड स्तर में संतुलन स्थापित करती है। मेरे साथी पेड़ों के कट जाने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया दर में काफी कमी आयी है। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संतुलन डगमगा रहा है।
कुछ अन्य कारणों से भी कार्बन डाइआक्साइड गैस की निरंतर वृद्धि हो रही है जिससे पर्यावरणीय प्रदूषण को बढ़ावा मिल रहा है। इसके लिए भी मनुष्य ही दोषी है।

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औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप आज उद्योगों तथा घरों में जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। इस समय मनुष्य प्रतिवर्ष चार अरब टन जीवाश्म ईंधन जलाते हैं। जीवाश्म ईधनों को जलाने से कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में मुक्त हो जाती है।
इसके अतिरिक्त मनुष्य ने आज ऐसे रसायन वातावरण में झोंक दिये हैं जिनसे जीवन रक्षक ओजोन की परत नष्ट होती जा रही है। परिणामस्वरूप सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर आकर कार्बन डाइआक्साइड को बढ़ावा दे रही हैं।
कार्बन डाइआक्साइड की अनियंत्रित वृद्धि के कारण हरित गृह प्रभाव बढ़ रहा है। संपूर्ण विश्व को हरित गृह प्रभाव का खतरा परेशान कर रहा है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि अधिक पेड़ लगाकर मनुष्य इसे रोक तो नहीं सकते मगर कम अवश्य कर सकते हैं।
लेकिन फिर भी मेरे साथी पेड़ों को काटकर अपनी आवश्यकता आपूर्ति में मग्न हैं। केवल अपने लाभ के लिए मनुष्य पर्यावरण का अंधाधुंध दुरूपयोग कर रहा है।
अगर मेरे साथी पेड़ों के साथ ऐसे ही हादसे होते रहे तो मनुष्य के लिए कई नई समस्यायें उत्पन्न होती जाएंगी।

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कुछ साल पहले डॉ. सुधांशु कुमार जैन ने कहा था, यदि पेड़ ऐसे ही लुप्त होते रहे तो शीघ्र ही पृथ्वी पर प्रलय जैसी दशा उत्पन्न हो जाएगी।' उस दिन यह सुनकर मेरा दिल दर्द से कराह उठा।
जिसकी सेवा में सारा जीवन लुटा दिया जाए, जिसकी समृद्धि के लिए मरकर भी साधनों का ढेर लगा दिया जाए, वही विनाश की ओर बढ़ रहा तो तो दर्द उमडऩा स्वाभाविक है।
जब नेहरू और डॉ. भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र की रूपरेखा पर विचार कर रहे थे तो नेहरू जी ने हिदायत दी थी एक पेड़ न कटने पाये।'
नेहरू जी पेड़ों को राष्ट्र की प्रगति का जीवित प्रतीक मानते थे। वे मेरी उपयोगिता से सुपरिचित थे।
लेकिन आज मनुष्य मेरी उपयोगिता भूलता जा रहा है। अपने स्वार्थ में खो कर बरबादी को निमंत्रण दे रहा है।
मेरे एक साथी पेड़ के कटने से कई तरह के कीट, पक्षी और पौधे आश्रयहीन हो जाते हैं। क्या अनेक जीवों को आश्रय देने वाले पेड़ को काटना उचित है?
मनुष्य भले ही औरों की परवाह ना करे मगर अपने बारे में तो सोचे। कहीं ऐसा न हो कि बाद में प्रायश्चित का भी मौका न मिले और मेरे दिल में दर्द का सागर हमेशा के लिए उफनता रहे।
-शालिनी

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