बाल कहानी: सैमी ने उडऩा सीखा

बाल कहानी: सैमी ने उडऩा सीखा

नन्हीं सैमी चिडिय़ा को अपना घोंसला बहुत पसंद था। वह आरामदायक और बढिय़ा था। वह उडऩा सीखना ही नहीं चाहती थी क्योंकि यदि वह उडऩा सीख जाती तो उसे अपना घोंसला छोड़कर जाना पड़ता। उसने सोचा कि मैं तो दिनभर घोंसले में ही रहूंगी। आखिर मैं अभी नन्हीं-सी ही तो हूं।
सैमी के मम्मी-पापा सोच में पड़ गए थे कि वे उसका क्या करें ? उनका कोई भी बच्चा सैमी जितना आलसी नहीं था। चूंकि वह उडऩे की कोशिश ही नहीं करती थी, सो उसके मम्मी-पापा को सुबह-दोपहर-शाम उसके लिए खाना लाना पड़ता था। यह काफी मुश्किल काम था और वे थक जाते थे। ‘आखिर हम सैमी का क्या करें?’ उसकी मम्मी बोली। ‘हमें उसे घोंसले से बाहर धकेल देना चाहिए’, उसके पापा बोले, ‘फिर तो उसे उडऩा सीखना ही पड़ेगा।’
लेकिन उसकी मम्मी ने ऐसा करने से मना कर दिया। उन्हें लगा कि ऐसा करने से सैमी को चोट लग सकती है। दूसरी चिडिय़ाओं को एक बढिय़ा तरकीब सूझी। उन्होंने सैमी की मम्मी को बताया कि क्या करना चाहिए। ‘एक टोकरी बनाओ और उस पर कुछ रस्सी बांध दो। सैमी समेत अपना घोंसला उस टोकरी में रख दो। फिर रस्सी के सिरे अपनी चोंच में लेकर टोकरी समेत उड़ो,’ उन्होंने कहा। कितनी बढिय़ा तरकीब थी। सैमी के पापा को तरकीब कोई खास अच्छी नहीं लगी क्योंकि वे जानते थे कि इसमें काफी मेहनत करनी पड़ेगी लेकिन मम्मी ने फटाफट टोकरी बना दी, रस्सी ला दी और मम्मी-पापा दोनों टोकरी में सैमी को लेकर उड़ पड़े। सैमी ने कोशिश की कि वह नीचे न देखे और जब वे शाम को घर पहुंचे तो उसे बहुत खुशी हुई।
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हर रात पापा का गुस्सा बढ़ता जाता क्योंकि सैमी काफी बड़ी और भारी होती जा रही थी और उसे लेकर उडऩा बहुत मुश्किल होता जा रहा था। ‘सैमी, तुम्हें उडऩे की कोशिश करनी ही चाहिए। तुम कोशिश क्यों नहीं करती?’ सुबह-सुबह मम्मी बोली। ‘मैं उडऩा चाहती हूं मम्मी। कभी-कभी मैं सपना देखती हूं कि मैं खूब ऊंचे बादलों में उड़ रही हूं और मुझे बिलकुल भी डर नहीं लगता लेकिन जब मैं जागती हूं और घोंसले के बाहर देखती हूं तो मुझे फिर से डर लगने लगता है,’ सैमी ने दुखी होकर कहा।
‘सैमी, जब भी कोई चिडिय़ा पहली बार उडऩे की कोशिश करती है तो उसे उतना ही डर लगता है जितना तुम्हें लग रहा है। तमाम दूसरी चिडिय़ाओं को देखो। उन्हें भी बहादुर बनना पड़ा था। वैसे भी तुम अपनी पूरी जिंदगी घोंसले में तो नहीं गुजार सकती। अभी भले ही यह आसान लगे लेकिन कुछ समय बाद तुम बोर हो जाओगी,’ मम्मी ने समझाया।
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सैमी सोच में पड़ गई। उसे अब भी अपना घोंसला बहुत पसंद था लेकिन वह चाहती थी कि मम्मी-पापा की मदद के बगैर उड़ सके। उसने अचानक फैसला कर लिया, ‘मैं उडूंगी। मुझे देखो, मम्मी।’ घोंसले से बाहर निकलते हुए गर्व से कहा। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और पेड़ की डाल से कूद पड़ी और वह उडऩे लगी।
‘सैमी को देखो, वह उड़ सकती है,’ मम्मी चीख पड़ीं। पापा देखने आए कि क्या वाकई सैमी उड़ रही है। उन्हें बहुत गर्व हुआ और उन्होंने राहत की सांस ली। अब चूंकि सैमी उड़ सकती थी, उसे बाहर जाकर अपना खुद का घोंसला बनाने का समय आ गया था। उसे घर से जाते देख उसकी मम्मी को बहुत दुख हुआ। ‘मिलने के लिए आते रहना और अपना ख्याल रखना,’ उसके पापा बोले। ‘मेरी फिक्र मत करना। अब मैं उड़ सकती हूं। मैं किसी भी चीज के लिए तैयार हूं,’ सैमी बोली।
-नरेंद्र देवांगन

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