बाल कथा: शंख का मंदिर

बाल कथा: शंख का मंदिर

शंख का भी मंदिर देवभूमि भारत में है, यह सुन कर लोग चकित रह जाते हैं। इस मंदिर की प्रतिष्ठा एक महान वैज्ञानिक ने की। प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री सर जगदीश चंद्र बसु के मकान में मनोरम मंदिर था ‘बसु विज्ञान मंदिर’। इस मंदिर के विशाल उद्यान में महकते फूलों के पौधों और लता कुंजों के बीच छोटा सा एक मंदिर और भी बना था।
इस छोटे मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं थी बल्कि मूर्ति के स्थान पर एक बड़ा शंख स्थापित किया हुआ था। नित्यप्रति देवी-देवताओं की तरह उसकी पूजा होती थी। शंख की पूजा के बाद उसे बजाया भी जाता था। इससे पूरा मकान शंख-ध्वनि से गूंज उठता था।
एक बार संस्कृत के विद्वान आचार्य कपिलदेव शर्मा, बसु महाशय से मिलने उनके घर गए। जगदीश चंद्र बसु ने उनका स्वागत किया। बगीचे में टहलते हुए वह उनसे बातें करते रहे। तभी कपिलदेव जी का ध्यान शंख पर गया, जो मंदिर में देवमूर्ति की तरह रखा गया था।
उन्होंने जगदीश चंद्र बसु से पूछ लिया, ‘क्यों भाई, इस छोटे मंदिर में देव मूर्ति की तरह शंख क्यों रखा हुआ है। क्या यह भी कोई देवता है?’
मुस्कुराकर बसु महाशय ने कहा, ‘हां, पंडित जी। हमने यह मंदिर शंख के लिए ही बनवाया है। नित्य उसकी पूजा भी हम करते हैं।’
‘आप भी अजीब हैं। ऐसा क्यों किया?’ कपिलदेव ने पूछा।
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इस पर जगदीश चंद्र बसु ने बहुत ही श्रद्धापूर्वक शंख को नमस्कार किया। फिर कहा, ‘पंडित जी, हमारे यहां शंख के महत्त्व पर शास्त्रों में खूब चर्चा है। समुद्र के भीतर से प्राप्त होने के कारण उसे लक्ष्मी का भाई भी कहा गया है पर मेरा ध्यान इस प्रसिद्ध कहावत पर गया शंख बाजै, राक्षस भाजै।’ इसी पर विचार कर, मैंने इसे देव मंदिर में पूजा के लिए रखा है।’
सुन कर कपिलदेव जी ने हैरान हो कर कहा, ‘पर आप तो वैज्ञानिक ठहरे।’
जगदीश चंद्र बसु ने कहा, ‘मनुष्य के लिए सबसे उत्तम और मूल्यवान है प्राण। शंख राक्षसी वातावरण को दूर करता है। अत: देवताओं की तरह पूजनीय है।’
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‘कमाल का विचार आया हमारे वैज्ञानिक मित्र को।’ कपिलदेव जी मुस्कुरा कर बोले।
तभी बसु बाबू बोले, ‘पंडित जी, मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु तो होते हैं रोगों के कीटाणु। प्राणों की रक्षा के लिए इन अनगिनत राक्षसों को मारा जाना आवश्यक है। ऐसे कुछ कीटाणु किसी अन्य उपाय से नहीं, केवल शंख की ध्वनि से ही मरते हैं। इसलिए घरों में, मंदिरों में सुबह-शाम शंख ध्वनि अवश्य करनी चाहिए। पुराने जमाने में युद्ध जीतने वाला दल शंख बजाता था। इस तरह वातावरण को शुद्ध रखने के लिए शंख का अपना महत्त्व है।’
सुन कर कपिलदेव जी मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले, ‘अब समझ में आया, इस अनुपम मंदिर का रहस्य।’
– नरेंद्र देवांगन

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