बाल कथा: मन का चोर

बाल कथा: मन का चोर

रात को फिसी लोमड़ी ने देखा कि अब सब अपने-अपने घरों में सो गए हैं। तब वह चीकू खरगोश के खेत में सब्जियां चुरा कर लाने को तैयार हो गई। उसने थैला उठाया और सोचा, आज वह अपने बेटे मोनी को भी साथ ले जाए तो कुछ ज्यादा ही सब्जियां ले आएगी। उसने मोनी के लिए दूसरा छोटा थैला भी ले लिया। मोनी छोटा था पर था खूब होशियार और समझदार। छोटे-छोटे काम तो वह चुटकी बजाते ही निबटा देता था। इसीलिए फिसी खुश थी कि इस छोटे थैले को तो सब्जियों से भर कर मोनी आराम से ले आएगा। फिसी बोली, ‘मोनी बेटा, आ…..तुझे मेरे साथ चलना है।’ मोनी ने कुछ नहीं पूछा और उसके साथ चल पड़ा। दोनों चीकू के खेत के पास पहुंच गए। तब फिसी ने कहा, ‘बेटा, तुम यहीं खड़े हो कर निगाह रखना। कोई इधर आता दिखाई दे तो मुझे बता देना। मैं अभी सब्जियों का थैला भर कर ले आती हूं।’ ‘ठीक है मां।’ कह कर मोनी वहीं खड़ा हो कर चारों तरफ निगाह रखने लगा। फिसी खेत में घुस कर फटाफट सब्जियां तोड़ कर थैला भरने लगी। अभी वह एक ही थैला भर पाई थी कि मोनी की बात सुनी, ‘मां ……कोई आ रहा है।’ फिसी ने गर्दन उठा कर चारों तरफ देखा। किसी को न देख उसने कहा, ‘तुम आराम से खड़े रहो, कोई नहीं आ रहा है।’ ‘मां, मुझे तो लग रहा है, वह धीरे-धीरे मेरे पास आ रहा है।’ मोनी ने डरते हुए कहा।
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फिसी उसके पास जा कर बोली, ‘किधर से…….कौन आ रहा है, बेटा?’ मोनी ने घबरा कर कहा, ‘तुम नहीं देख रहीं, मेरे पास डर और कमजोरी आ गई है।’ ‘घबरा मत बेटा, हिम्मत रख।’ फिसी ने कहा। ‘मन में साहस तो तब आए न, जब कोई अच्छा काम करें।’
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मोनी ने उदास स्वर में कहा। फिसी को मोनी की बात समझ में आ गई। चुपचाप उसने थैला खाली कर दिया और लौटते हुए मोनी से बोली, ‘बेटा, जिसे मैं आज तक नहीं देख पाई, उसे एक ही दिन में तुमने देख लिया और मुझे भी दिखा दिया।’
– नरेंद्र देवांगन 

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