बाल कथा: दया करो

बाल कथा: दया करो

राजघराने का एक बालक उद्यान में बैठा था। प्राकृतिक दृश्य निहारना उसे अच्छा लगता था। अकस्मात् उसकी नजर आकाश की तरफ गई। उसे एक हंस दिखाई दिया। ‘अहा, कितना प्यारा हंस है।’ उस के मुंह से निकला। वह एकटक उड़ते हुए हंस को देखने लगा।
‘ऐसा मनोहारी दृश्य महलों के बंद कक्षों में कहां देखने को मिलता है,’ बालक ने अपने मन में सोचा लेकिन उसी क्षण एक तीर तेजी से आया और हंस के मुलायम पंखदार शरीर में घुस गया।
खुले नभ से उड़ता हुआ हंस घायल हो गया और फडफ़ड़ाते हुए जमीन पर गिरने लगा। बालक का हृदय दुख से चीत्कार उठा, ‘यहां कौन निर्दयी आ गया।’ वह हंस उद्यान में ही आ गिरा। बालक ने दौड़ कर उसे उठा लिया और अपनी गोद में उसे शरण दी।
हंस केवल घायल हुआ था। उसके प्राण नहीं निकले थे। बालक ने हंस को लगा तीर निकालते हुए कहा, ‘डर मत, मैं तुझे स्वस्थ करूंगा।’
हंस को पानी आदि पिलाकर उसकी मरहमपट्टी करने जा ही रहा था कि एक और बालक वहां आ गया और तीखे स्वर में बोला, ‘इसे कहां ले जा रहा है, यह मेरा शिकार है।’ पहले बालक ने पीछे मुड़ कर देखा। वह शिकारी और कोई नहीं, उसका चचेरा भाई था।
‘तो तूने इस पर हमला किया था। बालक ने कहा।
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‘हां, अब बातों में समय मत खराब कर। इसे मेरे हवाले कर।’ दूसरे बालक ने कहा।
‘नहीं, यह अब मेरी शरण में है, मैं इसका इलाज करूंगा ताकि यह फिर से उडऩे लगे।’ पहले बालक ने कहा।
इस पर चचेरा भाई अपना आपा खो बैठा, गुस्से में कांपता हुआ बोला, ‘मूर्ख मत बनो, हम शाही घराने से हैं। शिकार करना हमारा अधिकार है। सेवा करना हमें शोभा नहीं देता।’
ताकि आंखों की ज्योति रहे बरकरार
 
‘तुम्हारी सोच गलत है। शाही होने का अर्थ यह नहीं कि हम निर्दोष जीवों का कत्ल करें बल्कि हमें तो उनकी रक्षा करनी चाहिए।’ बालक का उत्तर था। ‘मेरा शिकार लौटा दो वर्ना मुझसे बुरा न होगा।’ उसका चचेरा भाई उसे डराने धमकाने लगा और अपशब्द बोलने लगा पर उस बालक पर इन सब बातों का कोई असर न हुआ। वह हंस को अपने साथ ले गया और उसकी दवा-दारू करने लगा। चचेरा भाई पैर पटकता हुआ वहां से चला गया।
पहला बालक मुस्कुराते हुए अपने काम में लगा रहा। इस बालक का नाम था सिद्धार्थ जो बाद में महात्मा बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
– हरदेव कृष्ण वर्मा

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