बाल कथा: कुछ भी असंभव नहीं

बाल कथा: कुछ भी असंभव नहीं

नैपोलियन जब किसी काम को करने की ठान लेता था तो उसे पूर्णता तक पहुंचाने के लिये जी जान लड़ा देता था। कुछ करने के लिये मनुष्य के भीतर कार्य के प्रति उत्साह, साहस, धैर्य, विश्वास और कठिन परिश्रम करने की शक्ति की आवश्यकता होती है। ये सारी बातें नैपोलियन में विद्यमान थी।
वह अपनी वीरता और बुद्धिमानी के लिये आज भी संसार भर में प्रसिद्ध है। ‘असंभव’ शब्द से तो उसे बड़ी चिढ़ थी। उसका कहना था कि असंभव नाम का शब्द मूर्खों के शब्दकोश में ही पाया जाता है।
एक कहावत है कि हिम्मत वाले व्यक्ति की भगवान भी सहायता करता है। यह बात बिलकुल सही है। जब कोई निडर वीर कठिन से कठिन या असंभव कार्य को करने की ठान लेता है तो राह की विपत्तियां स्वत: ही मार्ग छोड़कर उसके कार्य को सुगम बना देती हैं।
एक बार नैपोलियन बहादुरी से युद्ध करते हुए आल्पस पर्वत के पास जा पहुंचा। पर्वत बहुत विशाल और ऊंचा था। पर्वत पर जाती पगडंडी संकरी और दुर्गम थी। उस पर चढऩा और पार करना एक टेढ़ी खीर थी। नैपोलियन अपनी सेना को लेकर पर्वत के उस पार जाना चाहता था परन्तु इसके लिये उसे उचित मार्ग नहीं मिल पा रहा था।
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उसी पर्वत की तलहटी में एक बुढिय़ा की झोपड़ी थी। वह वर्षों से वहां रह रही थी। नैपोलियन ने सोचा कि शायद बुढिय़ा उसे पर्वत के पार जाने का कोई सुगम मार्ग बता दें। वह बुढिय़ा के पास गया और उससे कहा-”मां, मैं अपनी सेना के साथ पर्वत के उस पार जाना चाहता हूं। आप तो एक लंबे समय से इस स्थान पर रह रही हैं। मुझे उस पार जाने के लिये कोई ऐसा सुगम मार्ग, जिसकी आपको जानकारी हो, कृपा करके मुझे बताइये?
नैपोलियन के मुंह से पर्वत के उस पार जाने की बात सुनकर बुढिय़ा को हंसी आ गई। वह बोली-‘बेटा! तेरी तरह कई नादान और सिरफिरे इस दुर्गम पहाड़ पर चढऩे के लिये आये थे लेकिन इसके असफल प्रयास में अपने जीवन की आहुति दे बैठे। अभी तक भी कोई उस तरफ़ नहीं जा पाया। इसलिये मेरी तुझे यही नेक सलाह है कि तू जिन पांव से यहां आया है, उन्हीं से चुपचाप वापस लौट जा। पर्वत पर चढऩे का इरादा तो तू अपने हृदय से निकाल दे।’
कोई और होता तो बुढिय़ा की बात सुनकर अपने इरादे से विचलित हो जाता लेकिन नैपोलियन तो अपने इरादे का पक्का था, इसलिये वह टस से मस नहीं हुआ। उसने अपने उत्साह और उम्मीद को कायम रखा और बुढिय़ा से कहा-‘धन्यवाद मां। आपकी सलाह से मेरा उत्साह कम नहीं हुआ है बल्कि और बढ़ गया है। अब मैं और भी अधिक सावधान, सतर्क और सुव्यवस्थित ढंग से पर्वत पर चढऩे की योजना बनाऊंगा और जल्दी ही अपने सैनिकों के साथ इस दुर्गम कहे जाने वाले पर्वत पर विजय प्राप्त करके ही रहूंगा।’
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बुढिय़ा ने अपने जीवन में आज तक ऐसे अटल और दृढ़ विश्वास वाला व्यक्ति नहीं देखा था। वह उसकी बात को सुनकर हैरान रह गई। उसने नैपोलियन को आशीर्वाद देते हुए कहा-‘बेटा, तुम्हारे जैसे अटूट विश्वास और हिम्मत वाला जवान मैंने पहली बार देखा है। निस्संदेह तुम वीर हो। वीर को कोई परास्त नहीं कर सकता। मेरा विश्वास है, तुम अपनी योजना में अवश्य ही सफल होगे। मेरा आशीष तुम्हारे साथ है।’
सचमुच, कुछ ही दिनों में नैपोलियन ने अपनी सूझबूझ भरी योजना से अपनी सेना के साथ उस पर्वत पर विजय प्राप्त कर ली।
सच है, मन में ठान लिया जाये तो कुछ भी असंभव नहीं है।
– परशुराम संबल

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