बाल कथा अहिंसा का जादू

बाल कथा अहिंसा का जादू

दो भाई थे। एक आठ साल का तो दूसरा दस साल का। बच्चे ही तो थे लेकिन लडऩे-झगडऩे में उस्ताद। दिन में न जाने कितनी बार मार-पिटाई करते। घर वाले भी दुखी थे। एक दिन उनके दादाजी ने छोटे भाई को समझाया कि बड़े भाई से लड़ते नहीं। उसकी बात मानते हैं। यदि वह कुछ कहता है तो तेरी भलाई के लिए ही कहता है। बड़ा भाई मारे तो भी उस पर हाथ नहीं उठाते।
बड़े भाई को भी समझाया कि छोटों को मारते नहीं अपितु उसकी मदद करते हैं, उसको प्यार करते हैं लेकिन बड़े को तो अपने बड़प्पन पर कुछ ज़्यादा ही नशा था। अगले ही दिन फिर किसी बात को लेकर बड़े भाई ने छोटे भाई की धुनाई कर दी।
लेकिन यह क्या कि छोटा चुपचाप पिटता रहा और रोता रहा। उसने बड़े भाई पर हाथ नहीं उठाया। शायद दादाजी की बात उसे प्रभावित कर गई थी लेकिन एक तो मार की पीड़ा और ऊपर से बदला न ले पाने की विवशता वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। बड़ा भाई भी यह सब देखकर हैरान था। जब छोटा काफी देर तक रोता रहा तो बड़े भाई ने उसके पास जाकर कहा कि रो मत।
बच्चा संवेदनशील हो तो?
छोटे ने निरीह भाव से बड़े भाई की आँखों में झाँका और फिर और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। यह सब देखकर बड़े भाई की आँखों से भी अश्रुधारा प्रवहमान होने लगी। वह भी छोटे भाई की तरह ही ज़ोर-ज़ोर से राने लगा और उससे लिपट कर बोला ‘भाई चुप हो जा। मैं तुझे फिर कभी नहीं मारूँगा।
प्रत्येक सफल स्त्री के पीछे कोई पुरूष होता है
आँसुओं ने दोनों के दिलों का मैल धो दिया लेकिन इसके मूल में जो अस्त्र था वह था अहिंसा का अस्त्र। यदि सचमुच हिंसा को समाप्त करना है अथवा किसी का रूपांतरण करना है तो अहिंसा से बढ़कर हथियार नहीं। बुद्ध और महावीर से लेकर महात्मा गाँधी तक सब इस अहिंसा-रूपी अस्त्र का सफल प्रयोग कर चुके हैं। जिसने भी अहिंसा-रूपी इस अस्त्र का अपने जीवन में एक बार प्रयोग कर लिया, उसके जीवन की दिशा ही बदल गई। क्या आप अपने जीवन में एक बार भी इस अस्त्र का प्रयोग नहीं करना चाहेंगे?
– सीताराम गुप्ता

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