बात समझ में आई

बात समझ में आई

स्कूल से लौटते हुए हिमांशु उदास था। उसने रास्ते भर अपने दोस्तों से बात भी नहीं की। घर पहुंचने पर उसने बस्ते को स्टडी टेबल पर रखकर जूते उतारे और पलंग पर जाकर लेट गया। मां ने भी इस बात को नोटिस किया कि कुछ तो है, जिसकी वजह से हिमांशु उदास है, वरना रोज स्कूल से आने के बाद वह पूरे घर को सिर पर उठा लेता था। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, `क्या हुआ? मेरा राजा बेटा उदास क्यों है?’ `कुछ नहीं मां, बस ऐसे ही।’ `ऐसे ही क्या? कुछ बात तो है, जो तुम इतना उदास हो।’ मां ने कहा।अब हिमांशु से रहा नहीं गया। उसने पलंग से उठते हुए कहा, `मां, आज मेरी क्लास टीचर ने मुझे बिना गलती के डांटा।’ `क्यों?’ मां ने पूछा। `पता नहीं’, हिमांशु बोला। `जरूर कुछ हुआ होगा।’ मां ने कहा। `कुछ खास नहीं मां, बस जब मेरी क्लास टीचर ने सबसे पूछा कि किस-किस ने एनसीसी ट्रेिंनग कैंप में अपना नाम लिखवाया है, तो मुझे छोड़कर पूरी क्लास ने हाथ खड़े कर दिए। मैडम को यह बुरा लगा और उन्होंने मुझे डांट दिया।’`उन्हें बुरा लगना भी चाहिए।’ मां ने कहा। `क्यों?’ हिमांशु ने पूछा। `बेटा, जितनी जरूरी पढ़ाई होती है, उतनी ही खेल और दूसरी चीजें भी होती हैं। लेकिन तुम्हें यह बात समझ ही नहीं आती।’ यह कहकर मां पलंग से उठ गर्इं और हिमांशु से कहा, `अच्छा अब उठ कर खाना खा लो।’आठवीं क्लास में पढ़ने वाला हिमांशु पढ़ाई में होशियार था। क्लास में फस्र्ट आता था। सभी टीचर्स उसे बेहद पसंद करते थे। पसंद तो उसके दोस्त भी उसे करते थे, लेकिन सब उसे `किताबी कीड़ा’ कहते थे। हिमांशु स्कूल की खेलकूद जैसी दूसरी गतिविधियों से तब तक दूर ही रहता था, जब तक टीचर का आदेश न हो। उसे लगता था कि इतने समय में तो वह पढ़ाई करके और भी ज्यादा नंबर ले आएगा।स्वूâल से आने के बाद भी वह सारा दिन घर पर ही रहता था। मां उसे बाहर जाकर खेलने के लिए कहतीं तो उसका जवाब होता, `मां अभी मैं पढ़ रहा हूं।’ मां और पिताजी उसकी इस आदत से परेशान थे। वे उसे अक्सर समझाते कि बेटा, पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ दूसरी चीजें, जैसे खेलकूद, सुबह खुली हवा में घूमना भी जरूरी है। इससे सेहत ठीक रहती है। लेकिन इन बातों का उस पर कोई असर नहीं होता था।एक दिन क्लास में टीचर ने बताया कि अगले सोमवार को सब बच्चे एक हफ्ते की छुट्टी पर शिमला जा रहे हैं। इस टूर पर सभी को जाना है, इसलिए किसी को छुट्टी नहीं मिलेगी। हिमांशु को छोड़कर सभी बच्चे खुश थे। उसे लग रहा था कि इससे उसका समय बरबाद होगा। घर आकर उसने मां को यह बात बताई, तो वह बहुत खुश हुर्इं कि चलो इस बहाने यह कुछ घूमेगा तो सही।पता ही नहीं चला कि हफ्ता किस तरह बीत गया। सोमवार का दिन भी आ गया। मां ने शिमला जाने के लिए हिमांशु की पूरी तैयारी कर दी थी। कपड़ों के अलावा कुछ खाने-पीने का सामान भी साथ रख दिया था। स्कूल पहुंचने पर हिमांशु ने देखा कि बस तैयार खड़ी थी। टीचर्स के कहने पर एक-एक करके सभी बच्चे बस में बैठ गए। थोड़ी देर में टीचर्स भी आ गए। बस शिमला के लिए चल दी।शिमला पहुंचकर बच्चों ने खूब मजा किया। सभी के ठहरने का इंतजाम एक गेस्ट हाउस में था, जो शहर से थोड़ी दूर एक बहुत ही खूबसूरत जगह पर था। मौज-मस्ती में पता ही नहीं चला कि किस तरह तीन दिन बीत गए। यहां आकर अब हिमांशु को भी अच्छा लगने लगा था। उसने इतनी हरियाली और खूबसरत पहाड़ियां आज तक नहीं देखी थीं। देखता भी कैसे, उसे तो पढ़ाई के अलावा सब चीजें बेकार लगती थीं। लेकिन यहां की खूबसूरती देखकर उसका मन बदलने लगा था।शाम को जब सब घूमकर गेस्ट हाउस लौट रहे थे तो अचानक बारिश शुरू हो गई। वे सब किसी तरह बचते-बचाते गेस्ट हाउस पहुंचे, लेकिन तब तक वे काफी भीग चुके थे। सभी ने अपने-अपने कमरों में जाकर कपड़े बदले और डिनर के लिए तैयार होकर डाइिंनग हॉल में पहुंच गए। खाना खाकर सब सो गए। सुबह उठने पर बच्चे यह देखकर चौंक गए कि बारिश तो अभी भी हो रही है। क्या बारिश पूरी रात होती रही! तभी उनके पास गेस्ट हाउस का रसोइया आया और कहने लगा, `यहां तो अकसर कई-कई दिनों तक लगातार बारिश होती है। चलो, जल्दी से हाथ-मुंह धोकर तैयार हो जाओ, नाश्ता भी तैयार है।’रसोइए की बात सुनकर सब बच्चे फ्रेश होने के लिए चले गए। नाश्ते की टेबल पर सभी टीचर्स और बच्चों को एक ही िंचता थी कि अगर बारिश नहीं रुकी तो वे घूमने कैसे जाएंगे, क्योंकि इतनी भारी बारिश में बच्चों के साथ कहीं बाहर नहीं जाया जा सकता। इस लगातार बारिश ने सभी के चेहरों पर उदासी ला दी थी। सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि घूमने-फिरने, खेलने-वूâदने में कोई दिलचस्पी न रखने वाला हिमांशु सबसे ज्यादा उदास था।तीन दिन लगातार बारिश होती रही। शनिवार शाम बारिश रुकी भी तो काफी देर हो चुकी थी। अगले दिन सुबह रविवार था, यानी उनकी वापसी का दिन। उस दिन सुबह आसमान में धूप खिली हुई थी। हिमांशु को ऐसा लगा कि यह धूप मुंह चिढ़ाकर कह रही हो, `बच्चू, तुम्हें तो यहां आने में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। फिर हरी-भरी वादियों में घूम न पाने के कारण क्यों उदास हो?’ हिमांशु चौंका। उसने देखा कि उसकी टीचर उसे बस में चढ़ने के लिए पुकार रही हैं। वह दौड़कर बस के पास गया। उसने टीचर की ओर देखा और कहा, `मैडम, क्या हम यहां दोबारा घूमने नहीं आ सकते?’उसके इस सवाल पर मैडम चौंक उठीं। उन्हें लगा, क्या यह वही हिमांशु है, जो कहीं भी घूमने-फिरने के नाम से कतराता है। अचानक इसमें यह बदलाव कैसे आ गया? उन्होंने उसकी ओर देखा और कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, `हां क्यों नहीं? लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम पहले वापस लौटें।’ यह कहकर मैडम मुस्कुरा दीं और हिमांशु भी।

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