बाढ़ की रोकथाम के लिए उपाय

बाढ़ की रोकथाम के लिए उपाय

पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में एक अनोखा दृश्य सामने आ रहा है। देश के एक क्षेत्र में बाढ़ है तो दूसरे क्षेत्र में सूखा। आखिर इसका क्या कारण है? बाढ़ काफी जटिल प्रश्न है। बाढ़ का मुख्य कारण वनों का विनाश है। हिमालय की पहाडिय़ों में वनों को तथा पेड़-पौधों को पिछले कुछ वर्षों में बड़ी बेरहमी से काटा गया है। पहाड़ी पर खड़ा प्रत्येक वृक्ष हमारे देश का संतरी है। वन हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हम उनके साथ गहराई से जुड़े हैं। चीन को देखें और फिर हिंदुस्तान की धरती पर लौटें। ‘दुखों की नदी’ कही जाने वाली ह्वांग्हो आज उनकी खेती का प्रमुख साधन बन गई है। बाढ़ की विनाश लीला से जिस प्रकार हम त्रस्त हैं, चीन में भी लोग कभी उसी प्रकार त्रस्त थे लेकिन उन लोगों ने बड़ी संख्या में पेड़ लगाए। इसी कारण आज इन्हें बाढ़ से मुक्ति मिली। प्रोफेसर आर.एम.अम्बष्ट का ‘भूमि संरक्षण व पानी सोखने की क्षमता’ पर कार्य सराहनीय है।
सूर्य की गर्मी के कारण समुद्री जल वाष्पीकरण से तथा पेड़-पौधों से पारश्वसन (ट्रांसपीरेशन) से वाष्प के रूप में पानी ऊपर जाता है तथा वहां ठंडा हो कर पुन: वर्षा की बूंदों के रूप में नीचे धरती पर आ जाता है। अगर वातावरण में धूल के कण अधिक हैं तो नीचे गिरने वाली बूंदें और भी ज्यादा सघन व तेज हो जाती हैं जिससे भारी वर्षा होती है। इस तरह जमीन का भूक्षरण बढ़ता है तथा यह जल मिट्टी को पहाड़ों से बहा कर मैदान में ला कर छोड़ देता है जिससे हमारे बांध आदि के रिजरवायर्स व नदियां आदि मिट्टी से भर जाती हैं। फलत: पानी बांध व नदियों से बाहर आने लगता है। फिर धूल के कण जिन्होंने इनको जन्म दिया, उसे कैसे रोका जा सकता है? इसका एक ही उत्तर है, पृथ्वी पर वनस्पति का खोल चढ़ा कर।
वनस्पति न केवल इस भारी वर्षा को ही रोकती है अपितु भूमि की पानी सोखने की क्षमता को भी बढ़ाती है। वनस्पतियों से पत्ती, जड़, तनों आदि के भूमि में ही सडऩे-गलने से ह्युमस बन जाती है जो बहुत अधिक पानी सोख सकती है। आप कहेंगे कि ह्युमस तो मुलायम होती है। यह सही है मगर वनस्पतियों की जड़ें इस सबको साथ में बांधे रहती हैं जिससे वे कटाव को रोकती है तथा छोटी वनस्पतियां अपने तने व पत्तियों के भूमि के ऊपर के भाग द्वारा जल के बहाव के लिए अवरोध बन जाती है और कटाव रूक जाता है। यह सब जानते हुए भी हमने वनों को पिछले कुछ समय में समाप्त करके अपने देश के लिए अपने आप समस्या बना ली।
नेल्सन ने एक बार कहा था, ‘जब मैं किसी ऐसे वृक्ष को देखता हूं जो खूब फला, फूला और अपनी लंबी-लंबी शाखाओं से सुशोभित होता है और जब यह निर्दयी हाथों से काट दिया जाता है तो मुझे बहुत दुख होता है। हमारे लोगों में इन सबको रोकने की भावना होनी चाहिए और अगर वे एक वृक्ष को काटते हैं तो पहले दो वृक्ष लगाएं।’
आज हमारे यहां पशुओं के द्वारा एक बड़े भूभाग को नष्ट कर दिया जाता है। पशु चर कर वनस्पति को नष्ट कर देते हैं जिससे वह ठीक प्रकार से नहीं पनप पाती और उसकी जड़ें गहराई तक नहीं पहुंच पाती जिससे भूमि अच्छी तरह बंधती नहीं और कटाव रूकता नहीं। पशु न केवल चर कर बल्कि पैरों से भी वनस्पति को कुचल कर नष्ट करते हैं। चरागाहों का उचित नियंत्रण न होना भी बाढ़ के कारणों में से एक है। हमारी आबादी का बहुत बड़ा भाग अज्ञानता के कारण बाढ़ के उपायों की जानकारी के अभाव के साथ गरीबी से भी त्रस्त है। यह भी वनों के दोहन का एक प्रमुख कारण है क्योंकि आर्थिक परेशानियों का सामना करने के लिए किसान अपने वृक्ष कटवा कर बेच देते हैं।
हम जब फुटबाल में हवा भरते हैं और भरते ही जाते हैं तो एक सीमा के बाद वह फट जाता है। दोष फुटबाल का नहीं, पंप का नहीं, दोष उन हाथों का है जिसने फुटबाल के अंदर उसकी क्षमता से भी अधिक हवा डाल दी। ठीक यही कारण यहां भी है। केवल मैदान में वर्षा होने से कभी बाढ़ नहीं आया करती। बाढ़ आती है पर्वतों, पहाडिय़ों से। वहां पर पानी की उचित रोकथाम की कमी के कारण पानी नीचे बहता है तथा अपने साथ रेत-मिट्टी आदि बहा लाता है। अत: सर्वप्रथम पहाड़ से आने वाले पानी को पहाड़ पर ही रोकना होगा।
वनों को पुन: लगाया जाए तथा हरी-भरी वनस्पतियों का भूमि पर खोल सा चढ़ा दिया जाए। वृक्ष की ऐसी प्रजातियों को ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाए जिनकी जड़ें गहरी हों तथा जो कटाव को ज्यादा रोक सके। मैदानों में भी पेड़ लगाए जाएं। रेल की पटरियों के दोनों ओर सड़कों के किनारों पर, नहर, नदियों आदि के किनारों पर तथा खाली पड़ी जमीन में भी पेड़ लगा दिए जाएं। खास ध्यान हमें पहाड़ों की वेजिटेशन पर देना है। इस योजना पर सरकार को एक लंबा बिल पास कर देना चाहिए।
चरागाहों में ज्यादा समय तक पशु न चराए जाएं तथा पहाड़ी लोगों की जातियों को अलग-अलग बसाया जाए। उनको सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं क्योंकि अलग-अलग रहने से वे एक स्थान पर पशुओं को भी नहीं रख सकेंगे तथा वनस्पति को भी कम हानि होगी। कंटूर फार्मिंग विधि पर्वतों पर इस्तेमाल की जानी चाहिए। इसमें पानी का बहाव रूकेगा तथा जमीन का कटाव कम होगा। इसमें पर्वत के ढलान के समकोण पर हल से जोता जाता है तथा कुंड बना दिए जाते हैं। इन कुंडों मे वनस्पति लगा कर पानी के सीधे बहाव को रोका जा सकता है। इस प्रकार घना कटाव नहीं होगा तथा पानी धीरे-धीरे नीचे बह जाएगा।
स्ट्रिप प्लांटिंग विधि भी पहाडिय़ों पर विशेष लाभकारी होती है। इसमें पर्वत के ढलान के समकोण पर पंक्तियों में बहुवर्षीय पौधेे लगा दिए जाते हैं तथा उनके बीच में एक वर्षीय शाक आदि लगा दिए जाते हैं जिससे वेजिटेशन का जाल सा बन जाता है। इस प्रकार बहता हुआ पानी रूकेगा तथा कटाव नहीं हो पाएगा। टैरेसिंग’ विधि पहाडिय़ों पर जहां कम ऊंचे पहाड़ हों, सफल हो सकती है। इसमें खेतों को समकोण बना कर सीढ़ी के समान रखा जाता है। इससे कटाव कम होता है तथा पानी एक सीढ़ी से दूसरी पर होता हुआ धीरेे-धीरे नीचे आ जाता है। पहाड़ों पर विभिन्न प्रकार की फसलें एक ही साथ, एक ही खेत में बो कर भी कटाव की समस्या से बचा जा सकता है, जैसे कपास, अरहर, ज्वार, बाजरा आदि फसलों को एक साथ बो कर कटाव से बचा जा सकता है। इनकी जड़ें अकटा होती हैं। अत: मिट्टी को एक साथ बांधे रहती हैं और खेत की पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है।
वनस्पति को तेज हवा से बचाने के लिए बीच-बीच में ऊंचे-ऊंचे पेड़ भी लगाए जाने चाहिए जिससे छोटे पेड़ क्षतिग्रस्त होने से बच जाएं। पहाड़ों पर यह विधि बहुत लाभदायक सिद्ध होती है। मैदानों में भी इसे इस्तेमाल किया गया है, जैसे राजस्थान का रेगिस्तान, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों की तरफ बढ़ता चला आ रहा है। इससे बचने के लिए पेड़ लगाना जरूरी है जिससे रेत पेड़ों से टकरा कर वहीं रूक जाएगी। आगे नहीं बढ़ेगी।
– नरेंद्र देवांगन

Share it
Share it
Share it
Top