बसपा के लिए चुनौती बनेगा गठबंधन?: सुधांशु द्विवेदी

बसपा के लिए चुनौती बनेगा गठबंधन?: सुधांशु द्विवेदी

बसपा प्रमुख मायावती उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर काफी आशान्वित और उत्साहित रही हैं तथा उनका यह उम्मीदभरा दृष्टिकोण स्वाभाविक भी था, क्यों कि कुछ सर्वेक्षणों द्वारा यह दावा किया जाता रहा है कि मायावती की पार्टी बसपा यूपी के विधानसभा चुनाव में बड़ी ताकत बनकर उभरेगी इसके अलावा प्रदेश विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी होने के कारण वैसे भी इस चुनाव के बाद यूपी की सत्ता में बसपा की दावेदारी मजबूत मानी जा रही थी। अब बदली हुई परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के बीच गठबंधन हो गया है तथा दोनों ही दलों के नेता यह दावा कर रहे हैं कि हमारा गठबंधन यूपी के विधानसभा चुनाव में निर्णायक जीत हासिल करेगा। दोनों दलों के नेताओं के इन दावों को इस बात से भी बल मिलता है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के परंपरागत मतदाताओं के अलावा इस गठबंधन की सफलता की कामना करने वाले अन्य लोग भी मतदान में उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए इस गठबंधन की जीत की राह को आसान बना सकते हैं। यूपी में सेकुलर वोट बैंक का बंटवारा रोकने की खास मंशा से अस्तित्व में आया यह गठबंधन अगर चुनाव में भी अपने रणनीतिक कौशल का सही ढंग से इस्तेमाल करने में सफल हो जाता है तो इससे मायावती की पार्टी बसपा के लिए कुछ मुश्किल की स्थिति हो सकती है। हालांकि मायावती भी अनुभवी राजनेता हैं तथा उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवार तय करते समय उनकी चुनावी जीत की काबिलियत पर ही पूरा ध्यान केन्द्रित किया है। इसके अलावा जातीय एवं सांप्रदायिक संतुल का भी मायावती के द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के चयन में खासा ध्यान रखा गया है।
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यूपी विधानसभा चुनाव में मायवती की पार्टी बसपा ने मुस्लिमों को सर्वाधित टिकट दिया है। इन सभी के बावजूद मायावती की असल चिंता का कारण मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की निर्विवाद, निर्विकार व विकासपरक छवि हो सकती है, जिसके बलबूते सपा और कांग्रेस का गठबंधन यूपी के विधानसभा चुनाव में बाजी जीतने का दावा कर रहा है। दावे मायावती के भी कमजोर नहीं हैं, क्यों कि मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भी उल्लेखनीय एवं उपलब्धियों से भरपूर रहा है। खासकर यूपी की कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने के मामले में तो मायावती के मुख्यमंत्रित्वकाल का उल्लेख तो प्रमुखता के साथ ही किया जाता है। अब बदली हुई परिस्थिति में जानकार ऐसा मान रहे हैं कि अखिलेश यादव की लोकप्रियता मायावती की अपेक्षा ज्यादा है। इसके अलावा शुचिता एवं प्रतिबद्धतापूर्ण राजनीतिक कार्यसंस्कृति के मामले में मायावती की अपेक्षा अखिलेश यादव को बेहतर माना जा रहा है। अभी कुछ दिन पूर्व ही बसपा के साथ-साथ मायावती के भाई के बैंक खाते में भारी भरकम धनराशि ट्रांसफर किये जाने का जो मामला उजागर हुआ है, वह चुनावी बेला में कहीं मायावती के लिये मुश्किलें न खड़ी कर दे, इस बात की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। फिर मायावती इस बात का भले ही दावा करें कि उनकी पार्टी को यह चुनावी चंदा जन सहयोग से मिला है लेकिन ऐसे दावों पर पूरी तरह से यकीन करना जागरूक मतदाताओं के लिये काफी मुश्किलभरा होगा क्यों कि मीडिया और सोशल मीडिया की सजगता एवं सक्रियता के इस दौर में जनमानस को सच्चाई का पता चलने में देर नहीं लगती तथा वही जनमानस लोकतंत्र के असली भाग्य विधाता हैं, जो लोकतंत्र के मतदान रूपी महायज्ञ में अपने वोटों की आहुति देकर राजनीतिक दलों एवं नेताओं के चुनावी भाग्य एवं भविष्य का निर्धारण करते हैं।
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 मायावती द्वारा पैसे लेकर टिकट बांटने की चर्चाएं भी सामने आती रहती हैं, हालाकि इन चर्चाओं की वास्तविकता क्या है, यह जांच-पड़ताल का विषय हो सकता है लेकिन किसी भी राजनीतिक दल या नेता के लिए किंचित खराब राजनीतिक माहौल भी उसकी चुनावी संभावनाओं को बड़ा आघात पहुंचा सकता है। मायावती के विपरीत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बारे में ऐसा बताया जाता है कि उनकी पार्टी हमेशा कर्मठ नेताओं व कार्यकर्ताओं को ही टिकट देती है तथा दावेदारों की चुनावी जीत का माद्दा ही उनकी काबिलियत का सबसे बड़ा आधार होता है। इस प्रकार सीएम फेस के तौर पर तो अखिलेश यादव, मायावती के लिए तो चुनौती हैं ही, साथ ही समाजवादी पार्टी एवं कांग्रेस का गठबंधन भी बसपा की राजनीतिक संभावनाओं के लिए काफी मुश्किल भरा हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस-सपा गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अखिलेश यादव के आकर्षण की बदौलत मायावती की पार्टी बसपा के कुछ परंपरागत मतदाता भी इस गठबंधन की ओर रुख कर सकते हैं। मायावती के राजनीतिक विरोधियों द्वारा लगातार इस बात का प्रचार किया जाता रहा है कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में उन्हीं की जाति-बिरादरी के लोगों के साथ सबसे अधिक छलावा हुआ है, जबकि वह मायावती की पार्टी के परंपरागत मतदाता हैं। वहीं अखिलेश यादव द्वारा लगातार यह दावा किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में यूपी का हुआ विकास ही इस विधानसभा चुनाव में उनके लिए मुख्य मुद्दा है। उनके चुनाव जीतने की स्थिति में विकास का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा है कि उत्तरप्रदेश के चहुंमुखी विकास की प्रक्रिया में उनकी सरकार ने कभी भी दलगत राजनीति या जात-पांत के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है। इस प्रकार अगर अखिलेश यादव को यूपी में सभी वर्गों के लोगों का विश्वास प्राप्त हो जाता है तो उनके चुनावी फतह की राह आसान हो जाएगी।

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