बन जाइये पति की जरूरत….फिर देखिये मजा….!

बन जाइये पति की जरूरत….फिर देखिये मजा….!

घर, परिवार, बच्चे व पति, इन सबमें महत्त्वपूर्ण है पति। पति के बिना न केवल घर, परिवार बच्चे ही बिखरते हैं वरन् स्वयं स्त्री भी टूट जाती है। सच पूछा जाये तो अस्तित्वहीन होकर रह जाती है।पति आपके वश में रहे, यह हर पत्नी चाहती है पर यदि किसी दूसरी स्त्री का पति उसके वश में होता है तो इसे वह पत्नी की गुलामी करना कहती है और पति को संज्ञा देती है- जोरू के गुलाम की जबकि मन से प्रत्येक पत्नी चाहती यही है कि उसका पति उसी के इशारे पर चले।सच पूछा जाये तो नारी जीवन की सार्थकता भी इसी में है व सुरक्षा भी इसी में है पर यह यूं ही तो संभव नहीं हो जाता? कोई किसी की गुलामी, कहना मानना, जोर जबरदस्ती से नहीं करता। हां, प्यार, ध्यान व लगाव से भले ही कर दें। पत्नी को चाहिये कि वह अपनी सेवा, कर्तव्यनिष्ठा व पति की चाहत को पहचान उसकी ऐसी अनिवार्यता बन जाये कि पति उसके बिना कुछ भी कर पाने में दिक्कत महसूस करे, पग पग पर उसे पत्नी की जरूरत पड़े। अपनी उपयोगिता साबित करके ही पति को वश में किया जा सकता है जो मजबूरी का काम नहीं है। प्रेम व निष्ठा के बल पर संभव होगा।पति का दिल यू ही नहीं जीत लिया जाता।
कम उम्र में ही दांत छोड़ रहे साथ
इसके लिये अपना तन-मन ही नहीं, अनेक बार अपनी चाहत, अपेक्षाएं भी पति पर वारनी पड़ती हैं। तब पति पत्नी के मन की सी कर पाते हैं। पहल पत्नी को ही करनी पड़ेगी। यह बात समझने की है कि पति को सिर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है, जोर-जबरदस्ती से नहीं। पति को जीत लेना ही जंग जीत लेना है व पति की जरूरत बन जाना ही जमाने भर की मान इज्जत पा लेना है।
क्या मिश्र के पिरामिड अभिशप्त हैं?
पति से बराबरी या होड़ नासमझ स्त्रियों की सोच है। यहां का तो रिवाज ही उल्टा है, ठीक जैसे इश्क का। जहां इश्क हो जाने पर छूटना असंभव होता है ठीक वैसे ही पति से हारने में ही जीत है व जीतने के चक्कर में हार ही हाथ लगती है। – मंजु चन्द्रमोहन

Share it
Top