बदल गई है औरत…नयापन उसकी नई सोच की देन !

बदल गई है औरत…नयापन उसकी नई सोच की देन !

 वक्त बदला है तो महिलाएं भी बदली हैं। इस बदले माहौल में हर औरत ने अपने सपनों का नया इंद्रधनुष बनाना शुरू किया है जिसमें वह खुद को पत्नी, मां, बहन, सहेली और प्रेयसी जैसे परंपरागत रूपों में देखने के बावजूद कुछ नया महसूस कर रही है।
यह नयापन उसकी नई सोच की देन है, जो पिछले बीस सालों में उसके जीवन के हर पहलू से हो कर गुजरी है। अपनी जड़ों से जुड़ी परंपराओं को संजोए हुए सधे कदमों से चलती वह जिस तरह तेजी से आगे बढ़ी है, वह वाकई काबिले तारीफ है।
फैशन में अब वह अपना व्यक्तिगत स्टाइल ढूंढ़ती है, ऐसा स्टाइल जिसमें ठहराव हो और जो ज्यादा उत्तेजक न दिखे। वह वही पहनना पसंद करती है, जो उसके अंदरूनी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। उनके बनने-संवरने को आप ‘पावर ड्रेसिंग’ का खिताब दे सकते हैं जिसमें आत्मविश्वास का पुट ज्यादा होता है। ऐसा लगता है जैसे वह कह रही हो, ‘लीजिए, मैं अब आ गई हूं।’
ब्लाउज ब्यूटीफुल तो था ही पर इन सालों में बोल्ड भी बना है। नाक-कान छिदवा कर खुश होने वाली अब नाभि भी छिदवाने लगी है। खूबसूरत मेंहदी रचाने का शौक रखने के साथ वह आधुनिक टैटू से भी आकर्षित होती है। सलवार-सूट पहनने से कतराने वाली अब ट्रैक सूट पहन कर सुबह की सैर पर निकलने लगी है। ऐसे बदलाव उसकी बदली हुई सोच पर मोहर लगाते हैं।
कैलेंडर की कहानी

अब स्मार्टनेस का मतलब है वेस्टर्न पर ठेठ परंपरागत चूड़ा। यह फ्यूजन बताता है कि फैशन ट्रेंड चाहे कितने भी बन जाएं, परंपराओं पर इन्हें हावी होने में समय लगेगा। लापरवाह और कभी-कभी तो उच्छृंखल का खिताब मिल जाने के बावजूद नई लड़कियां फैशन ट्रेंड को अपनाने के लिए परंपराओं को अपने हाथों से फिसलने नहीं दे रही हैं। स्त्री ने खुद को फैशन की कठपुतली मानने से इंकार कर दिया है क्योंकि वह जानती है कि हर ट्रेंड तेजी के साथ बदल जाता है।
फास्ट फैशन फास्ट फूड जैसा ही होता है, इसीलिए पारंपरिक उत्सवों पर उसे साटिन सिल्क, शिफॉन और कांजीवरम में लिपटे आसानी से देखा जा सकता है। पूरे सुर में कभी वह बन्ना-बन्नी गाती है तो मौका पडऩे पर रॉक म्यूजिक पर भी थिरक लेती है। कभी लापरवाही से खिलखिलाती है, तो कभी गंभीरता की चुनरी ओढ़ कर सबको चौंका देती है। ज्वेलरी डिजाइन करने वाले हाथ अपने बच्चों की उंगली को भी उतनी ही मजबूती से थामते हैं जितनी मजबूती से मोबाइल। वह अपनी संस्कृति के साथ मन की गहराइयों से जुड़ी हुई है। आधुनिकता उसके जीवन का हिस्सा जरूर बनी है पर रीति-रिवाज आज भी उसके मन में बसते हैं।
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पिछले 20 सालों में उसका खुद में विश्वास बहुत बढ़ा है। वह हर सफलता को एक सफर की तरह लेती है, उसे अपनी मंजिल नहीं मानती। उसका यह नजरिया बताता है कि वह अभी और आगे जाना चाहती है। अपनी सफलताओं का फॉर्मूला उसने खुद गढ़ा है।
कड़ी मेहनत और हुनर ने उसे सिखाया है कि वह कैसे सफल होगी। जीवन में वह जो ठान ले, उसे कर दिखाती है। अब वह दिल के बजाय दिमाग से सोचने लगी है और मन से मेहनत करती है। कोई उसके फैसले पर एतराज करे, यह उसे पसंद नहीं।
जीवन को ले कर उसकी सोच स्पष्ट हुई है। वह उन्हीं रिश्तों को सहेजती है जो उसके जीवन को नए अर्थ देते हैं। वह तटस्थ है लेकिन फिर भी परिस्थितियों को समझने और उससे जूझने में सफल है। वह पति रूपी पुरूष के आगे पत्ते की तरह कांपने को तैयार नहीं। वह ऐसे पुरूष से आकर्षित नहीं होती जो उसकी स्वतंत्र, सुलझी सोच से खार खाता हो। वह जोरू का गुलाम नहीं चाहती लेकिन उसे गुजरे जमाने का पुरूष भी नहीं चाहिए। ‘फ्लाइंग किस’ शब्द से शरमा जाने वाली अब पति व स्कूल बस में चढ़ते बच्चे को चुम्मा उछालने में जरा भी देर नहीं लगाती।-खुंजरि देवांगन

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