बढ़ रही महिलाओं के साथ बलात्कार की प्रवृत्ति

बढ़ रही महिलाओं के साथ बलात्कार की प्रवृत्ति

समाचार-पत्रों में महिलाओं के साथ दहेज उत्पीडऩ की घटनायें तो पढऩे को मिलती ही हैं साथ ही बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनायें भी विस्तृत रूप में पढऩे को मिलती हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि किशोर एवं युवा महिलाओं का कहीं भी घर से अकेला निकलना सुरक्षित नहीं है।
बलात्कार का अर्थ:- बलात्कार का अर्थ मात्र यह नहीं होता कि वासनात्मक दृष्टि से पुरूष द्वारा महिला के साथ किया बलपूर्वक विषयी कार्य। वैसे तो बलात्कार का शाब्दिक अर्थ होता है बलपूर्वक कर्म करना। उर्दू में इसे जिना विल जब्र कहते हैं। इसका अर्थ होता है कि किसी महिला के साथ बलपूर्वक आक्र ामक ढंग से विषयी व्यवहार करना।
यह कर्म किसी से भी हो सकता है। व्यवहारिक रूप में यदि बलात्कार का अर्थ लिया जाये तो एक बहू के साथ सास, ससुर जेठ, जेठानी, देवर, ननद, कोई भी दुर्व्यवहार और अत्याचार करे तो वह बलात्कार ही है पर इसे प्राय: यौन शोषण से ही जोड़ा जाता है।
कारण व दोष:-स्कूल, कालेजों, सिनेमा, क्लबों, होटलों, शादी-ब्याह के कार्यक्र मों में और राह चलते किशोरियों एवं युवा महिलाओं, छात्रओं के साथ छेड़छाड़, सीटी बजाना, फब्तियां कसना आम बात हो गई है। प्रथम दृष्तया इसके लिए दोषी हैं आजकल की किशोरियां, युवा महिलायें व माता-पिता क्योंकि आजकल फैशन-परस्ती का जमाना है और फैशन के आगोश में ये किशोरियां एवं युवा महिलायें जब अधनंगे लिबास पहनकर व भड़कीले बनाव-श्रंृगार करके घर से बाहर निकलेंगी और कोई मनचला यदि सीटी बजा दे या फब्तियां कस देता है तो इन्हें बुरा क्यों लगता है?
माता-पिता इसलिए दोषी हैं कि वे अपनी बेटियों पर इस तरह के भड़कीले पहनावे, भड़कीले बनाव-श्रृंगार पर अंकुश नहीं लगा सकते। जरूरत से ज्यादा बनाव-श्रृंगार यदि इसी उद्देश्य से किया गया है कि मैं सबसे अच्छी लगू, पुरूषों की आंखों में और उन्हें आकर्षित कर उत्तेजित करूंगी तो आखिर गलती किसकी है? महिला के रूप श्रृंगार से महिला तो प्रभावित नहीं होगी। स्वाभाविक है कि अधिक बनाव-श्रृंगार पुरूष को ही आकर्षित करेगा भले ही सज्जनतावश वह कोई बेहूदीगी न करे।
बनाव-श्रृंगार गरिमापूर्ण हो:-प्रत्येक नारी सुंदर व आकर्षक दिखना चाहती है क्योंकि बनना- संवरना उसका प्राकृतिक स्वभाव है। एक बात अवश्य देखने में आई है कि जिन महिलाओं का बनाव श्रृंगार, पहनावा, चाल-ढाल सादे एवं घरेलू ढंग का होता है उन पर कोई व्यक्ति बुरी नजर नहीं डालता। नारी का बनाव-श्रृंगार बहुत अहमियत रखता है कि वह सामने वाले व्यक्ति पर किस प्रकार का प्रभाव छोड़ती है।
कुछ वर्गों के लोग छेड़छाड़ भले ही पसंद करते हों लेकिन हमारा तात्पर्य महिला-जगत के उस वर्ग से है जो छेड़छाड़ व बलात्कार को कदापि पसंद नहीं करती। ऐसी महिलाओं को चाहिए कि वे अपना बनाव-श्रृंगार, पहनावा सौम्य व गरिमायुक्त रखें। आजकल की तरह फैशन-परस्ती वाला न हो।
बचाव एवं उपाय:- बलात्कार एक जघन्य कार्य है। यह कार्य चाहे घर में हो या घर से बाहर, ईश्वर न करे कि कि किसी महिला के सामने ऐसी परिस्थिति आये पर यदि इस प्रकार का संकट आ ही जाये तो महिलाओं को सूझ-बूझ व धैर्य से काम लेना चाहिए ताकि अपनी सुरक्षा करने में सफल हो सकें। यदि कुछ बन सके तो कामोत्तेजित पुरूष के गुप्तांग पर अपनी लात का भरपूर प्रहार कर दें क्योंकि पुरूष उत्तेजित गुप्तांग पर सीधी चोट सहन नहीं कर सकता या अपनी हथेली की दोनों उंगलियां सामने वाले की आंखों में सीधी चोट करते हुए घुसेड़ दें। तब भी कुछ हद तक काम बन सकता है और इस प्रकार अपनी सुरक्षा खुद कर सकती हैं परंतु यह उपाय तभी सूझ सकते हैं जब मस्तिष्क पूरे होशो-हवाश में हो।
कोई ठोस संगठन नहीं:- एक कमी अवश्य महसूस होती है कि हमारे देश में व्यापक जनाधार वाला कोई ठोस महिला संगठन नहीं है जो दहेज उत्पीडऩ, बलात्कार, छेड़छाड़ व अन्य नारी समस्याओं के प्रति कोई व्यापक आंदोलन खड़ा कर सके और सरकार को समस्यायें सुनने के लिए बाध्य कर सके।
हमारे देश में जो भी महिला संगठन कार्य कर रहे हैं, वे महिलावादी सोच के शिकार हैं। अभी तक नारी समस्याओं को लेकर जितने भी आंदोलन किये गये वे प्रदर्शन, गोष्ठियों और ज्ञापन तक ही सीमित रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला आंदोलनों का संचालन स्वतंत्र रूप से हो, किसी राजनीतिक पार्टी का सहारा न लिया जाये। राजनीतिक पार्टियों का सहारा लेने पर महिला संगठनों को वह मजबूती नहीं मिल पाती जो उन्हें मिलनी चाहिए।
– विनय कुमार गुप्ता ‘विनय’

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