बढ़ते प्रदूषण से जूझती ट्रैफिक पुलिस

बढ़ते प्रदूषण से जूझती ट्रैफिक पुलिस

सड़क दुर्घटनाओं के साथ-साथ वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की समस्या भी दिनों-दिन विकट होती जा रही है। वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं से फेफड़े प्रभावित हो रहे हैं।
आंखों में भी चुभन व जलन बढ़ रही है। दमा और सिरदर्द की भी तकलीफ बढ़ रही है। सबसे अधिक प्रभावित हो रही है हमारी ट्रैफिक पुलिस जिसे प्रतिदिन तपती धूप में आठ से दस घंटे सड़कों पर जहरीली गैस का सामना करना पड़ रहा है। चौराहों पर वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं से पुलिस जूझ रही है। अपनी 30 से 40 वर्ष की सेवा में जितना धुआं ट्रैफिक पुलिस के फेफड़ों में जाता है शायद ही किसी अन्य के फेफड़ों में जाता होगा। यही वजह है कि अस्थमा के साथ-साथ दिमागी बीमारियों से भी ट्रैफिक पुलिस बुरी तरह जूझ रही है।
देश के अधिकांश नगरों में स्थिति काफी विकट है। वायु प्रदूषण ने शहरी जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रखा है। वायु प्रदूषण की इस विकट समस्या की एक प्रमुख वजह है। वर्षो पुराने वाहनों का दयनीय स्थिति में भी सड़कों पर दौडऩा, दूषित और मिलावटी डीजल-पेट्रोल का इस्तेमाल, वाहन चालकों द्वारा मिट्टी तेल से वाहन दौड़ाना।
इंजिन के रखरखाव में भारी उपेक्षा भी वाहनों से निकलने वाले धुंए में कार्बन की मात्र बढ़ा देती है। वायु को प्रदूषित करने में सीसा एक प्रमुख तत्व है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सीसा व कैंसर में बड़ा गहरा संबंध है। वाहनों के रख-रखाव व सर्विसिंग का अपना महत्व है किंतु देखा यह गया है कि जब तक वाहन सड़क पर दौड़ते-दौड़ते अचानक स्वयं ही रूक नहीं जाता, उसे कोई भी सर्विसिंग सेन्टर तक नहीं ले जाना चाहता।
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वायु प्रदूषण के साथ-साथ ट्रैफिक पुलिस को ध्वनि प्रदूषण की भी दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। वाहनों के कर्कश ध्वनि वाले हार्न भी कानों में इस तरह चोट पहुंचाते हैं मानो कोई सिर पर हथौड़ा मार रहा हो। वाहनों की भी कर्कश आवाज दिनभर झेलते झेलते ट्रैफिक पुलिस वाले थक जाते हैं। वायु प्रदूषण तो रोका जा सकता है बशर्ते हम सभी पहले प्रदूषण के प्रभावों के प्रति अपने मन एवं मस्तिष्क को चिन्ताशील करें। चूंकि ट्रैफिक पुलिस को अपनी जिन्दगी का अधिकांश समय सड़कों पर ध्वनि और वायु प्रदूषण के बीच ही व्यतीत करना है, अत: उन्हें अपने चेहरे पर सुरक्षा प्रदान करने वाले मास्क लगाने की अनुमति दी जाए। उच्च क्वालिटी के मास्क उन्हें पुलिस विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जाएं।
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ट्रैफिक पुलिस की हालत ग्रीष्मकाल में तो देखते ही बनती है। दूषित हवा और तपती धूप के बीच आठ से दस घंटे की सेवा, वह भी खुले आसमान के नीचे डामर रोड पर, कोई आसान बात नहीं है।
उनकी तनावग्रस्त जिंदगी किसी का ध्यान आकर्षित नहीं करती। लोगों की सहानुभूति भी पुलिस के खाते में कम ही आती है। सरकारी नियमानुसार उनका हेल्थ चेकअप जरूर वर्ष में एक बार यातायात सप्ताह में होता है किंतु यह पर्याप्त नहीं है।
ट्रैफिक पुलिस के स्वास्थ्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ के प्रति हम सभी को चिंतन करना होगा। मानवीयता के नजरिये से यहां ध्वनि प्रदूषण एवं वायु प्रदूषण पर काबू लगाने का सामूहिक प्रयास जरूरी है। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह ट्रैफिक पुलिस के स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता बरतते हुए उपयोगी कार्रवाई करे।
– राजेन्द्र सिंह ‘राज’

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