बढ़ती उम्र का अहसास भी जरूरी है

बढ़ती उम्र का अहसास भी जरूरी है

लोग किसी उम्रदराज व्यक्ति का जब मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं ‘चढ़ी जवानी बुड्ढ़े नूं’ या किसी उम्र दराज महिला को बनी ठनी देख ‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ कहकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं तो बेशक ये बातें इनडिसेंट होती हैं और किसी की निजता पर कुठाराघात करने जैसा ही है। उन्हें भी गाने का हक है ‘हम तो भई जैसे हैं, वैसे रहेंगे, अब कोई खुश हो या हो खफा’।
लेकिन यह एक कड़वा सच है कि बुढ़ापा एक बीमारी है जिसे धरती पर जन्म लेने वाले हर व्यक्ति, पशु, पेड़ पौधे सभी को झेलना पड़ता है। आनेवाली मौत की धीमी दस्तक है बुढ़ापा। इसे भले आप अनसुना करें लेकिन आवाज तो आती रहेगी।
बार-बार कहते रहने से कि अब हमारी वृद्धावस्था है, बूढ़े हो रहे हैं, पके आम की तरह कब टपक जाएं या पीले जर्द पत्ते हैं, कब झड़ जाएं, कोई फायदा नहीं। शायद ऐसा लोग अन्य लोगों की तसल्ली के लिए करते हों क्योंकि लोग यही सुनना पसंद करते हैं। कोई बूढ़ा आदमी उम्र को मात दे, यह किसी को भी सहन नहीं होता।
बहुओं की बात की जाए तो कोई भी बहू जवान सास को पसंद नहीं करेगी। मां जी उन्हें मां जी स्टाइल में ही चाहिए और अगर यंग हैं तो वे भी प्रतिद्वंद्वी नहीं चाहिए। अच्छा दिखने और अच्छा पहनने का एकाधिकार सिर्फ युवा पीढ़ी का ही नहीं है। एक उम्र होते-होते व्यक्ति आर्थिक रूप से अक्सर संपन्न ही होता है तो क्यों न वो पैसे को अपने पर खर्च करे, अपने अधूरे अरमान पूरे करें। उसमें बुरा कुछ नहीं। ‘लुक गुड फील गुड’ ये एक सच है।
याद रखने वाली बात यही है कि किसी भ्रम में न रहें। जो सच है उसे स्वीकार के चलें मगर साथ ही शरीर बूढ़ा होने लगे तो मन बूढ़ा न होने दें। मन को जवान रखेंगे, तभी खुश रह पायेंगे। जीवन का हर पल शिद्दत से जियें। उसी में जीने का मजा है। आपके अपने लिये यही उचित है लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं उसकी परवाह भी हमें है। बुजुर्ग औरों के सामने जवानों जैसे हाव भाव से बातें करेंगे तो निश्चित ही वे उपहास के पात्र बन जाएंगे।
अपनी उम्र का अहसास ही बुजुर्गो को सहनशील बनाता है, स्नेहिल बनाता है। अगर उम्र को पूरी तरह नकार कर के चलेंगे तो आप अपने ही परिवार वालों के लिए प्रतिद्वंद्वी जैसे हो सकते हैं जैसे लड़कों के लिये पिता और बहू बेटी के लिए सास, मां। इस तरह आपसी टकराव के अवसर बढ़ जाते हैं और बच्चे उन्हें कहनी अनकहनी कहकर दुखी करने लगते हैं। इस उम्र में ऐसा करते आपको शर्म आनी चाहिए। अब उम्र है ये सब करने की। इस तरह की बातें कह कह कर घर के युवा हर समय आपको उम्र का अहसास दिलाते हुए शर्मसार कर सकते हैं।
मोबाइल बजा रहा है खतरे की घंटी
किसी भी पढ़ी-लिखी स्त्री को पब्लिक में अपनी उम्र का लेखा-जोखा देना गाली जैसा ही लगता है। यह सच है कि उम्र ज्यादा कम बताने से मौत का दिन घट बढ़ नहीं जाता, लेकिन यहां इरादा अहम बात है। जैसा कि अक्सर सभी लड़कों का मनोविज्ञान होता है, उन्हें बीवी सुंदर टेलेंटेड चाहिए लेकिन मां बूढ़ी और एवरेज लुकिंग ही उनके लिए सुविधाजनक है।
उम्र का अहसास इसलिए भी जरूरी है कि जोश में कहीं आप वो सब न कर बैठें जो आपका शरीर नहीं झेल सकता। अब मिसेज तनेजा की ही बात लें। अपने समय में कॉलेज में वे साइकल रेस में हमेशा फस्र्ट आती थीं लेकिन साठ के बाद आर्थराइटिस से उनकी हड्डियां कमजोर हो गई थी। मां के यहां गई। खुली सड़क देख भतीजी की साइकल लेकर चल दीं। अर्से बाद साइकल अभी बैलेंस ही कर रही थी कि सामने भैंस आ गई। टकराई और पैर की हड्डी तुड़वा बैठीं।
मिस्टर अग्रवाल रिटायरमेंट के बाद भी एकदम चुस्त दुरूस्त युवा लगते थे। उनमें वही जोश, वही रवानगी थी लेकिन आईसाइट जरूर कमजोर होने लगी थी। चश्मा उन्हें सुहाता न था। उसे वे यदा कदा ही इस्तेमाल करते। बीवी ने लाख समझाया अब गाड़ी तेज चलाने की उम्र नहीं रही। रिफ्लैक्सेज़ में फर्क आ जाता है। उम्र का कुछ तो फर्क पड़ता ही है। ‘क्या हर समय बूढिय़ों जैसी बातें करती हो’ कहकर वे पत्नी को झाड़ लगा देते।
उस दिन भी शाम का समय था और आदतन अग्रवाल साहब तेज रफ्तार से गाड़ी चला रहे थे। मोड़ पर गाड़ी संभली नहीं और साइड में गिरकर उलट गई। चमत्कार ही हुआ कि मिस्टर अग्रवाल बाल-बाल बच गए। एक्सीडेंट से बचा जा सकता था अगर स्पीड कंट्रोल में होती और दृष्टि कमजोर न होती।
दुर्गंधयुक्त पसीने से बचें
यह तो निश्चित है कि बढ़ती उम्र के साथ ताकत बढ़ती नहीं बल्कि घटती ही है। हां, अनुभवों में जरूर बढ़ोत्तरी होती है। इस बात का सदा अहसास रहना चाहिए अपनी ही सुरक्षा की दृष्टि से। जवानों जैसी हरकतें बुढ़ापे में केवल उन्हें हास्यास्पद ही बनाती हैं।
जहां तक पहनने ओढऩे का सवाल है, उम्र इसमें खास आड़े नहंीं आती। राजस्थान में बुजुर्ग औरतें खूब जेवर भी पहनती हैं और चटक लाल पीले वस्त्र भी। वहां यही चलता है इसलिए अजीब नहीं लगता लेकिन यू.पी. में ज्यादातर बुजुर्ग औरतें हल्के रंग पहनती हैं।
जीवन के ढेर से उतार चढ़ाव उम्र का अहसास दिलाते रहते हैं। थोड़ी बहुत अध्यात्म में रूचि भी होने लगती है। कई औरतें तो धर्म के झूठे उथले स्वरूप को ही असल मानकर धार्मिक प्रपंचों में समय गुजारने लगती हैं। अगर इसमें किसी का नुक्सान न होता हो तो शायद यह हार्मलेस पासटाइम माना जा सकता है।
ये जरूर दो अंतर्विरोधी बातें लगेंगी कि बढ़ती उम्र का अहसास भी रहे और आप जीवन को भरपूर जिएं, दिल जवान रखें, सोच को बूढ़ा न होने दें लेकिन गहराई से सोचने पर ये एक ही सिक्के के दो पहलू नजर आयेंगे।
– उषा जैन शीरीं

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