बढ़ता जा रहा है सस्ता वैभव प्रदर्शन..!

बढ़ता जा रहा है सस्ता वैभव प्रदर्शन..!

पहले गलत धंधों से काला धन जमा करना, फिर उसका अनैतिक प्रदर्शन, आखिर इससे आप औरों को क्या जताकर प्रभावित करना चाहते हैं?
देखा जाए तो लोग प्रभावित भी होते हैं और खूब होते हैं। ये सब एक थैली के चट्टे बट्टे होते हैं, सिर्फ एक भाषा समझने बोलने वाले। यह भाषा है-धन की भाषा। मजे की बात यह है कि जब इनसे भी मोटी आसामी अपने बेटे के लिये इनसे मोटे दहेज की मांग करती है तो ये दहेज, लेन देन दिखावे जैसी बातों का विरोध करते नजर आते हैं।
वैभव प्रदर्शन के यूं तो कई मौके होते हैं। ‘लट अस सेलीब्रेट’ की तर्ज पर आजकल तो छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी पार्टियां आयोजित की जाती हैं। दूर दराज के शहरों से थोक में फूल मंगवाये जाते हैं। नामी केटरर्स को ठेका दिया जाता है। सजावट के तो कहने ही क्या, नये-नये तरीके खोज लिये जाते हैं पैसे की बर्बादी के।
शादी के निमंत्रण कार्ड के साथ मिठाई के डिब्बों का चलन इस समारोह में तो अब रीति ही बन गया है। तरह तरह की सुंदर पैकिंग में फल व मिठाइयों के डिब्बे यूं बांटे जाते हैं जैसे पैसे की बरसात हो रही हो। बर्थ डे या विवाह वर्षगांठ पार्टी में जाओ तो मेजबान आपको रिटर्न गिफ्ट देंगे। आखिर जब फेंकने को पैसा हो तो क्यों न उसका सदुपयोग (या दुरूपयोग) किया जाए। ये सब बातें लालच को बढ़ावा देती हैं, और कुछ नहीं।
आज वैभव प्रदर्शन का सबसे अहम जरिया है विवाह समारोह। एक पारिवारिक, सामाजिक समारोह, जिसमें हर्षोल्लास का समां होता था, रिश्तों की मिठास और अपनापन देखने को मिला करता था, कई खुशनुमा रीतिरिवाज, रस्मों आदि से पूर्ण-छोटे विधि विधान जिनमें कुछ खास खर्च नहीं होता था, इस समारोह को पूर्ण करते थे लेकिन आज क्या हो गया है इसका स्वरूप? मनोरंजक व मेल मिलाप बढ़ाने वाली छोटी-छोटी रस्मों को तो दकियानूसी, पुरातनपंथी ओल्ड फैशन्ड बातें कह कर नकार दिया गया है और आधुनिकता के नाम पर बेवकूफी भरी बातों का सिलसिला चल पड़ा है। अब रिश्तेदारों से ज्यादा अहम् हैं कांटेक्ट्स, वे लोग जो आपके किसी काम आयें, जिनसे आपका फायदा हो, सोसायटी में आपकी सो कॉल्ड इज्जत जिनके आने से बढ़े। हॉल में चारों तरफ लगे क्लोज सरकिट टीवी, वीडियो फिल्में, रंगीन फोटो, जिनके एलबम भी अटैचीनुमा होते जा रहे हैं जिन्हें आसानी से उठाना भी मुश्किल, एक ही ड्रेस, एक ही पोज में बीसों फोटो। फोटो पर बेइंतिहा पैसों का खर्च।
‘तलाक’ एक लफ्ज या ब्रह्मास्त्र

खाने में इतनी वैरायटी कि गिनना मुश्किल। जूस, चाट, कॉफी, दूध, लोग सभी कुछ टेस्ट करना चाहते हैं फिर चाहे उच्च रक्तचाप के मरीज हों या मधुमेह के या फिर दिल के जिनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है, कारण गलत फूड हैबिट्स। भारी गरिष्ठ खाना, तरह-तरह की हाई केलोरीज वाली मिठाइयां जो आधी खायी, आधी फेंकी जाती हैं। काकटेल और मांसाहारी भोजन भी अब आम होते जा रहे हैं।
अब आती है दहेज और लेन देन की बात। यहां पर भी जरूरत की चीजों से ज्यादा अहमियत वैभव प्रदर्शन को दी जाती है। लड़के वाले भी पीछे नहीं रहते। दुल्हन के ही नहीं, नजदीकी रिश्तेदारों के लाखों के जोड़े बनते हैं। बेहिसाब सोने के जेवर, डायंमड सेट और भी न जाने कितनी तरह की ज्वेलरी दुल्हन को चढ़ाई जाती है। यह सब उस देश में जहां भूख की मार अपने जायों को बेचने पर मजबूर कर देती है। यहां इंसान ही जानवर से बदतर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। तन पर कपड़ा नहीं, पेट में दाना नहीं। गरीब अपाहिज घिसटते लोग भीख मांगते, दुत्कार सहते, जिल्लत भरी नारकीय जिंदगी जीते हैं।
जिस पर ऊंची-ऊंची बातें और तेवर यह कि उनसे कमतर हैसियत वाले लोग तो इंसान ही नहीं हैं। उन पर हिकारत भरी नजर डालकर अपने को पाक साफ समझने की भयंकर भूल करने वाले दरअसल कितने नादान हैं या शायद यह उनके लिए बहुत हल्का शब्द है। दरअसल ये बहुत बड़े पाप के भागीदार हैं। एक तरह के चोर डकैत ही हैं ये लोग क्योंकि वो धन जिसका ये प्रदर्शन कर रहे हैं, उनका नहीं है। उस पर उन गरीबों का भी बराबर हक है।
अपने हृदय को दें सुरक्षा, ताकि चलता रहे आपका जीवन

यह मानसिकता, लाइफस्टाइल व व्यवस्था चंद रोज में नहीं बदले जा सकते। पुराने वक्तों में भी राजे महाराजे यही सब करते थे, आज का धनाढ्य वर्ग भी यही कर रहा है।
शिक्षा के प्रचार के कारण लोगों में जागृति आई है। निस्संदेह ऐसी मानसिकता वाले लोग भी हैं जो सादगी में विश्वास रखते हैं लेकिन उनकी गिनती नगण्य है। पैसा न होने पर सादगी की बात करना एक बात है, पैसा होने पर भी सादगी को महत्त्व देना दूसरी बात है। पहली बात मजबूरी के कारण हो सकती है। यहां नीयत का पता नहीं चलता। दूसरी बात में सच्चाई है बशर्तें बात कंजूसी की न हो।
भुला दें यह बात कि पैसे से आदमी बड़ा होता है। हाई फाई सोसायटी की पैसे में लोटने वाली औरतों से वे मेहनतकश औरतें जो खुद अपनी रोजी रोटी कमाती हैं कमतर नहीं, भले ही वे अशिक्षित गंवार कहलाती हैं। वैभव किसी को अच्छा नहीं बना देता बल्कि अपने साथ अनेक दुर्गुण लिए होता है, इसलिए अपने हाथी घोड़ों का रौब छांटकर किसी को प्रभावित करने की हिमाकत न करें। ताज्जुब तो तब होता है जब बुद्धिजीवी भी इससे बच नहीं पाते। अपने हमसायों, साथियों को नीचा दिखाने का प्रयास उनमें हीनभावना भरने का अक्षम्य अपराध आपको अनैतिकता के गर्त में ढकेल रहा है, यह न भूलें।
वैभव प्रदर्शन शान नहीं, शर्म की बात है, इसलिए क्योंकि आपके अन्य कई साथी गरीबी के कारण जिस हाल में हैं, उसका आपको लेशमात्र भी अहसास तक नहीं है। कम से कम अपनी बेहूदगी का ढिंढोरा न पीटें। अपरोक्ष रूप से उन्हें अपराध के लिए न उकसाएं।
– उषा जैन ‘शीरीं’ 

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