बड़े बे-आबरू होकर…बेटे से माननी पड़ी हार : वीरेंद्र सिंह परिहार

बड़े बे-आबरू होकर…बेटे से माननी पड़ी हार : वीरेंद्र सिंह परिहार

उत्तरप्रदेश के पारिवारिक सत्ता संघर्ष में आखिरकार मुलायम को हार माननी पड़ी और अपने पुत्र उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समक्ष आत्म-समर्पण करना पड़ा। चुनाव आयोग द्वारा 17 जनवरी को सपा का चुनाव चिह्न साइकिल अखिलेश यादव को दिए जाने के एक दिन पूर्व जो मुलायम मुसलमानों को अखिलेश के खिलाफ भड़का रहे थे और यहां तक कह रहे थे कि वह स्वतः अखिलेश के विरूद्ध चुनाव लड़ने जाएंगे, वहीं मुलायम साइकिल चुनाव-चिन्ह अखिलेश को मिलते ही त्राहिमाम की स्थिति में आ गए और ”भागते भूत की लंगोटी भली” की तर्ज पर उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव की उम्मीदवारी हेतु 45 लोगों की एक लिस्ट अखिलेश को सौंप दी। अब देखने की बात यह है कि अखिलेश अपने पिता पर रहमों-करम कर उनके कितने लोगों को टिकट देते हैं? लेकिन मुलायम बनाम अखिलेश एपिसोड से इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि जो मुलायम पहलवानी के दांव में इतने उस्ताद थे कि राजनीति के अखाडे में अच्छे-अच्छे पहलवानों को मात दे चुके थे, वह अपने पुत्र से ही चारोंखाने चित्त हो गए। गौर करने की बात है कि जब मुलायम वर्ष 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनावों के बाद अखिलेश को उत्तरप्रदेश की बादशाहत सौंप चुके थे। तब आखिर ऐसी कौन सी स्थितयां आन पड़ीं कि मुलायम को अपने ही बेटे से दो-दो हॉथ करने को बाध्य होना पड़ा। थोड़ा गहराई में जाने से यह भी पता चलता है कि यह लड़ाई मुलायम बनाम अखिलेश कम शिवपाल बनाम अखिलेश ज्यादा थी। बड़ा सवाल यह कि आखिर ऐसी कौन सी स्थिति आन पड़ी की मुलायम पुत्र की जगह भाई के साथ खड़े हो गए।
अपने गुट की उपेक्षा के चलते सपा के विभीषण हो सकते हैं शिवपाल..!
जानकार लोगों का कहना है कि शिवपाल तो बहाना थे, वस्तुतः मुलायम अपनी दूसरी पत्नी साधना के पुत्र के हितों के लिए लड़ रहे थे। क्योंकि जब मुलायम सिंह के समाजवादी पार्टी की पूरी राजनीतिक संस्कृति परिवारवाद से आच्छादित हो गई हो तो दूसरी पत्नी के बेटे की महत्वाकांक्षा हिलोरे लेनी क्यों नहीं शुरू करेंगी? अमूमन यह भी सच है कि दूसरी पत्नी की औलादें ज्यादा प्रिय होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि शिवपाल सिंह ने साधना के नाम पर कई फर्जी कम्पनियां बनवाकर अरबों का ब्यारा-न्यारा करा दिया था। इसीलिए इस सत्ता-संघर्ष में साधना और उनके बेटे, शिवपाल के साथ थे। ऐसी स्थिति में मुलायम का अखिलेश के साथ खड़े होना समझ में आ सकता है। बड़ी बात यह कि धरती-पुत्र कहे जाने बाले मुलायम को इस सत्ता-संघर्ष में लम्बे समय तक जमीनी हकीकत क्यों समझ में नहीं आई कि उनके नीचे से धरती खिसक चुकी है। वस्तुतः इस लड़ाई की शुरूआत तब हुई जब मुलायम सिंह ने अखिलेश को उत्तरप्रदेश समाजवादी पार्टी के अघ्यक्ष पद से हटाकर भाई शिवपाल सिंह यादव को बैठा दिया। इसके बाद जो शह-मात का खेल चला वह लोगों के जेहन में अब भी ताजा होगा। बड़ी बात यह कि समाजवादी पार्टी मूलतः मुलायम सिंह की बनाई और विस्तारित की गई थी और अधिकांश लोगों को पद-प्रतिष्ठा मुलायम सिंह द्वारा ही दी गई थी। फिर ऐसी कौन सी वजह आन पड़ी कि समाजवादी पार्टी के विधायकों-सांसदों समेत पार्टी पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता करीब-करीब 90 प्रतिशत अखिलेश के साथ हो गए। अखिलेश सत्ता में थे इसलिए विधायकों का बहुमत तो समझ में आ सकता है, पर संगठन का भी अखिलेश के साथ चले जाना अलग बात है। सच्चाई यह है कि इस दौरान जो जनमत सर्वे आए उसमें जनमत का रूझान मुलायम की तुलना में अखिलेश के पक्ष में दिखा। राजनीतिक वर्ग के लिए हवा किधर बह रही है यह महत्वपूर्ण होता है। यह सब देखते हुए मुलायम पता नहीं कैसे हारी बाजी लड़ते रहे? शायद उन्हें भरोसा था कि उनके यादव-मुस्लिम गठजोड़ की राजनीति कहीं-न-कहीं इस लड़ाई में पलड़ा उनकी ओर झुकायेगी। पर शायद उन्हें पता नहीं कि अब जाति और सम्प्रदाय की राजनीति के दिन बहुत कुछ लद चुके हैं। मुलायम ने इस हकीकत को समझा, पर बहुत देर से।
शिवपाल पर मुलायम हुईं माया, बोलीं गुजारिश करने पर देखेंगे..!
फलतः वह अखिलेश के साथ इस शर्त पर समझौता करने को तैयार हुए कि सिर्फ उन्हें समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वीकार कर लिया जाए तो वह अखिलेश को मुख्यमंत्री उम्मीदवार से लेकर टिकट बंटबारे का भी अधिकार सौंपने को तैयार हैं, पर अखिलेश को यह प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं हुआ। दूसरे अखिलेश बखूबी जानते थे कि मुलायम लड़ाई हार चुके हैं, ऐसी स्थिति में अखिलेश भला मुलायम को क्यों भाव देते? अब जब मुलायम आत्मसमर्पण कर चुके हैं तो अखिलेश कहते हैं कि उनके पिता-पुत्र के संबंध को कोई भी कमजोर नहीं कर सकता? अखिलेश की यह बातें चेहरा बचाने का प्रयास है क्योंकि उन्हें यह पता है कि मुलायम के चलते यानी परिवारवाद के चलते ही आज वह इस मुकाम में हैं और जिस तरह से उन्होंने मुलायम को बेदखल कर राजनीतिक विरासत पर कब्जा जमाया, वह कमोवेश मुगलिया सल्तनत को याद दिलाता है। वैसे मुलायम सिंह ने जिस तरह अपने पारिवारिक कुनबे को राजनीति में स्थापित किया, उसकी मिसाल इस देश में क्या किसी भी लोकतांत्रिक देश में शायद ही मिले। कुल मिलाकर समाजवाद के मुलम्मे में उन्‍होंने परिवारवाद का जो खेल खेला- उसकी मिशाल दुर्लभ है। सिर्फ इतना ही नहीं, यादव-मुस्लिम गठजोड़ के नाम पर उन्होंने जातीयता और साम्प्रदायिकता को ही अपनी राजनीति की धुरी बनाया। परिवारवाद की इस लड़ाई में बियावान में जाने वाले मुलायम अकेले उदाहरण नहीं हैं। इसके पहले नब्बे के दशक में आंध्रप्रदेश के अभिनेता मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव का भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ था। जब उनके दामाद चन्द्रबाबू नायडू ने उन्हे मुख्यमंत्री पद से बेदखल कर सत्ता हथिया ली थी। देखने की बात यह है कि अखिलेश जब विजेता बनकर उभरे हैं तो आने वाले विधानसभा चुनाव में वह कितना मजबूत होकर उभरते हैं? इससे समाजवादी पार्टी का मुस्लिम वोट-बैंक मायावती की तरफ जाना अब शायद संभव नहीं होगा। लेकिन ”लाख टके की बात” यह कि नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री मोदी की जो आंधी चल रही है, क्या उसे वह रोक पायेंगे? कहा जाता है- ”बड़े बे-आबरू होकर हम तेरे कूचे से निकले” पर मुलायम सिंह के लिए यही कहना उपयुक्त होगा कि, ”बड़े बे-आबरू होकर हम अपने कूचे से निकले।”

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