बच्चों को शराब की कुसंस्कृति से बचाएं

बच्चों को शराब की कुसंस्कृति से बचाएं

अभी हाल की बात है। तिरूवनंत विनोबा निकेतन में आयोजित एक सार्वजनिक सम्मेलन में भाग लेने में वहां पहुंच गया था। कई स्थानीय स्वैच्छिक संगठनों के कार्यकर्ता आए हुए थे। सम्मेलन के आरंभ होने में अभी थोड़ा समय था।
डेल.व्यू नामक संस्था के संस्थापक निदेशक श्री क्रिस्तुदास मेरे समीप बैठे हुए थे। अपनी संख्या की गतिविधियों के संबंध में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा – ‘हमारे यहां डीअडिक्शन ट्रीटमेन्ट भी चलता है। आज सुबह से करीब साठ केस आए हुए हैं, साठ व्यक्ति ट्रीटमेन्ट पाने और साठ व्यक्ति उनके साथ।’
‘ये जो डीअडिक्शन ट्रीटमेन्ट के लिए आते हैं वे किस आयुवर्ग के हैं?’ कौतूहलवश मैंने पूछा।
‘आज जो आए हुए हैं उनमें अधिकांश पच्चीस तीस वर्ष के बीच के हैं। सबसे छोटे की आयु चौदह साल की है।’
‘चौदह साल की? इतनी छोटी आयु में शराब की लत पड़ जाती है।’ मैने आश्चर्य और चिन्ता भरे स्वर में पूछा।
श्री किस्तुदास ने कहा – ‘आजकल यह साधारण घटना बन चुकी है। दस दस बरस के बच्चे भी शराब पीते पाए जाते हैं।’
गांधी ग्राम विश्वविद्यालय मदुरै के पूर्व कुलपति एवं प्रमुख गांधीवादी विचारक डा. एन. राधाकृष्णन जी यह संवाद सुनते हुए हमारे समीप ही बैठे हुए थे। उन्होंने कहा ‘बच्चों को दोष क्यों दें? आजकल घर में बैठे बैठे बच्चों के सामने शराब पीना फैशन सा बन गया है। पहले यह कुछ विशेष मजहब के लोग ही ऐसा करते थे। अब तो प्राय: सभी मजहबों के धनी परिवारों में यह प्रथा प्रचलित हो रही है। फ्रिज में दो तीन बोतल कीमती शराब रखे रहना स्टेट्स सिंबल माना जाने लगा है। कुछ कुछ परिवारों में पुरूषों के साथ महिलाएं भी शराब का स्वाद लेने लगी हैं। मां-बाप के इस व्यवहार का प्रभाव बच्चों पर पड़े बिना नहीं रह सकता।’
सर्वोदय संघ के जिला अध्यक्ष श्री जी सदानन्दन यह संवाद सुनते हुए हमारे पास बैठे थे। वे शराबबंदी अभियान से भी जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि सरकार ही इस के लिए दोषी है। सरकार यदि शराब के उत्पादन और बिक्री पर रोग लगा देती तो समस्या ही खत्म हो जाती।
‘अभी देखिए, यहां करीब पचीस लोग बैठे हुए हैं। जिस प्रकार एक महिला हमारे लिए चाय ला रही है उसी प्रकार वह यदि हमें शराब परोस दे तो क्या हममें से कोई पिएगा?’ मैंने पूछा।
नहीं, सदानन्दन ने कहा। क्यों?सेब का छिलका 6 गुणा तक अधिक लाभकारी‘क्योंकि छुटपन में ही हमारे मन में ऐसे संस्कार डाले गए हैं।’
तो यही सबसे प्रमुख बात है। यदि हमारे अभी बच्चों में ऐसे संस्कार डाले जा सकें जिनसे वे शराब से घृणा करने लगें तो फिर सरकार चाहे शराब की बिक्री घटाए, बढ़ाए, या बंद करे, हमारा कुछ बनने-बिगडऩे वाला नहीं। यदि खरीदनेवाला नहीं रहे तो बेचेंगे कैसे?
डा. एन. राधाकृष्णन ने सहमति प्रकट करते हुए अपने बेटे का उदाहरण दिया और कहा ‘मेरा बेटा अजित वायु सेवा में फ्लाइट लेफ्टिनेंट है। उसका एक मित्र कहता है – ‘अजित के प्रभाव से मैं भी अब शराब छोड़ चुका हूं। हमारे अफसर ने भी शराब की मात्रा कम करनी शुरू की है। यही नहीं, उसके प्रभाव से हमारी भोजन शैली में भी परिवर्तन आ रहा है। हम शाकाहार की ओर मुड़ रहे हैं।’
अब समस्या यह है कि बच्चों में शराब-विरोधी मनोवृत्ति के बीज बोने का दायित्व कौन उठाए? क्या अध्यापकों पर यह दायित्व छोड़ कर मां-बाप निश्चिंत रहें? अध्यापक मुख्यत: यही चाहते हैं कि परीक्षा की दृष्टि से तैयार कराएं। उन्हें तो पाठ्यक्रम समय पर पूरा करने की चिन्ता लगी रहती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में ऐसे पाठ विरले ही स्थान पाते हैं जो बच्चों के मन में शराब के प्रति घृणा उत्पन्न करने में समर्थ हों।
बच्चे यदि शराबी हो जाएं तो किस को सब से ज्यादा तकलीफ होती है? अध्यापकों को या मां-बाप को? निश्चित रूप से मां-बाप को ही ज्यादा तकलीफ होगी यद्यपि पूरा समाज भी सामान्यत: हर शराबी की हरकतों से उत्पीडि़त रहता है।
मां-बाप शराब से परहेज रखें और छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से पड़ोस के व्यक्तियों के उदाहरण के माध्यम से अपने बच्चों को समझा दें कि शराब पीने वालों का कैसा अपमान होता है, उनके स्वास्थ्य की कैसी क्षति होती है, उनकी आर्थिक दशा कैसे बिगड़ती है और उन के परिवार में कैसे अशान्ति बनी रहती है।
स्वैच्छिक संस्थाएं इस दिशा में महत्ती भूमिका अदा कर सकती हैं व समय समय पर अध्यापकों के लिए और अभिभावकों के लिए अनौपचारिक चर्चा-गोष्ठियां आयोजित करें जिन में ऐसे उपायों पर विचार किया जा सके जिन से बच्चों को शराब से विमुख बनाए रखा सके।
इन चर्चाओं में स्थानीय अस्पतालों के डाक्टरों से भी सहयोग लिया जा सकता है।
दृश्य-श्रव्य साधनों के सहारा यह समझा सकता है कि शराब शरीर के किन किन अंगों को क्षति पहुंचाती जाती है।
– के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

Share it
Share it
Share it
Top