बच्चों को तनाव परोस रही है स्कूली शिक्षा

बच्चों को तनाव परोस रही है स्कूली शिक्षा

बच्चों में बढ़ता तनाव उनकी एकाग्रता व निर्णय लेने की क्षमता को बहुत अधिक प्रभावित करता है जिसका प्रभाव उनकी पढ़ाई व स्वास्थ्य पर बुरा पड़ता है। जिन बच्चों की जिंदगी में स्थितियां बहुत तनावग्रस्त होती है, उनके स्वास्थ्य पर तो इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।
जो बच्चे शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं, तनावमुक्त होते हैं वही पढ़ाई में भी अच्छा परफॉर्म करते हैं। अधिकतर बच्चे अपने जीवन में थोड़ा बहुत तनाव महसूस करते हैं पर यह हल्का तनाव जब बढऩे लगता है तो बच्चे को कई स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बच्चे के व्यवहार पर भी इसका प्रभाव बुरा पड़ता है।
बच्चों पर बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा कारण है उन पर बढ़ता पढ़ाई का बोझ जिसके तले उनके मासूम कंधे दबते जा रहे हैं। सुबह बच्चे भारी बैग अपने कंधों पर लादे जल्दी-जल्दी स्कूल बस की ओर भागते नजर आते हैं। उनके चेहरों पर स्कूल जाने की खुशी की बजाय मजबूरी झलक रही होती है।
दोपहर को भी थके-बेहाल घिसटते कदमों से घर को बच्चे जब वापिस लौटते हैं तो खाना खाने के पश्चात् जहां उनके लिए आराम करना आवश्यक होता है वहीं टयूशन टीचर आ धमकते हैं या उनके टयूशन जाने का समय हो चुका होता है। उनका होमवर्क, स्कूल का होमवर्क करते-करते पूरा दिन कब व्यतीत हो जाता है इसका उन्हें भी पता नहीं चलता। शाम को कामकाजी अभिभावक उनसे उनके दिन भर के कार्य की रिपोर्ट मांगते हैं। बच्चों के पास खेलने तक का समय भी नहीं बचता।
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अधिकतर बच्चों का स्वयं का कहना है कि स्कूल में उन पर पढ़ाई का बहुत अधिक बोझ है। कम्प्यूटर, अंग्रेजी, हिन्दी, गणित, विज्ञान आदि विषय बढ़ते ही जा रहे हैं और इतने सारे विषयों का होमवर्क करते-करते वे थक जाते हैं। उधर अभिभावक उनसे अपेक्षा रखते हैं कि इस प्रतियोगिता भरे वातावरण में वे अपना एक अलग स्थान बनाएं, कक्षा में अधिक से अधिक अंक प्राप्त करें। उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना उनके लिए काफी कठिन होता है और इसका प्रभाव उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
बच्चे तो पढ़ाई के बढ़ते बोझ से परेशान हैं ही, अभिभावक भी बच्चे की पढ़ाई के खर्च के बोझ तले दबते जा रहे हैं। अधिक फीस व अतिरिक्त खर्चे तो वे झेलते ही हैं साथ ही बच्चे के स्कूल के होमवर्क तो कराते-कराते वे परेशान हो जाते हैं। बच्चा अपनी परेशानी लेकर उनके पास पहुंचता है और अपनी परेशानी उनको दे देता है। जो कार्य स्कूल अध्यापकों को कराना चाहिए, वो अभिभावक कराते हैं जिसके लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है। परेशान अभिभावक अपना गुस्सा अध्यापकों की बजाय बच्चों पर निकालते हैं।
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बच्चों को अच्छा माहौल देने के लिए सबसे आवश्यक है कि स्कूली शिक्षा को आसान बनाया जाए। उसे मनोरंजक व प्रेक्टिकल बनाया जाए। अध्यापक बच्चों पर ध्यान दें। उनमें अच्छी आदतों को डालने का प्रयास करें। उनके गलत कार्यो को सही करने का प्रयास करें। सिर्फ स्वयं को अपनी फीस लेने तक सीमित न करें। उनकी परेशानियों को दूर करने का प्रयत्न करें। बच्चे को उनके होमवर्क के अलावा
खेलने, आराम करने का समय मिलना चाहिए। बच्चे को अपने अभिभावकों से, अपने दोस्तों से बात करने का समय मिले जिससे उसका सही मानसिक व नैतिक विकास हो सके। बच्चे अपनी संस्कृति सभ्यता को जाने, एक दूसरे का सम्मान करना सीखें। थके, पढ़ाई के बोझ से दबे बच्चे इन महत्त्वपूर्ण बातों को सीखने में असमर्थ होते हैं। आज बच्चे एक दूसरे से आगे बढऩे के लिए मेहनत कम, गलत तरीकों का सहारा ज्यादा लेते हैं क्योंकि उनका मानसिक विकास सही नहीं हो पा रहा। तनावग्रस्त बच्चे नकारात्मक सोच रखते हैं और यह सोच उन्हें आत्महत्या की प्रवृत्ति की ओर तक खींच ले जाती है।
बच्चे हमारा भविष्य हैं और उस भविष्य को उज्जवल व सफल तभी बनाया जा सकता है जब उसका शारीरिक व मानसिक विकास सही हो और इस ओर ध्यान देना सभी का फर्ज है।
-सोनी मल्होत्रा

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