बच्चों के भविष्य निर्माण में है.. माताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका

बच्चों के भविष्य निर्माण में है.. माताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका

family आज यह बात प्राय: हम सभी जानते हैं कि बच्चे के जन्म से लेकर उसके बड़े होने तक या हम कह सकते हैं कि उसकी किशोरावस्था तक, माताओं को विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत होती है।
अक्सर ग्रामीण स्तर पर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि माताएं ज्यादातर कम पढ़ी लिखी हैं या अनपढ़ हैं, इस कारण इनको जानकारी कम है। आज जरूरत है इनको इस बारे में जागरूक करने की। आइये यहां पर पर हम आपको कुछ आवश्यक सुझाव इस विषय पर देने जा रहे हैं कि कैसे अपने बच्चों को अच्छी देखभाल और अच्छे संस्कार प्रदान करें? आज हमारे देश में ‘छत्रपति शिवाजी’ जैसे बहादुर एवं निडर वीरों की कमी होती जा रही है। इनके बचपन के बारे में आपने आपको पुस्तकों में पढ़ा होगा कि छोटी सी उम्र में भी ये शेरनी का दूध निकाल अपनी मां के पास लाये थे। आजकल के बच्चों में इतना साहस न होने के पीछे मुख्य कारण यह है कि आज के समय में जब बच्चे होते हैं तो मां उनसे कहती है चुप हो जा बेटा नहीं तो अभी शेर जायेगा और तुझको पकड़ ले जायेगा। चाहे दिन हो या रात बच्चे के रोने से लेकर उसको रात में बिस्तर पर सुलाने तक किसी भी प्रकार से उसकी डराने-धमकाने की प्रक्रि या ही अपनाती हैं। इस कारण उसके मन में डर बचपन से ही जन्म ले लेता है। आगे चलकर ये बच्चे प्राय: डरपोक एवं कायर किस्म के हो जाते हैं। ऐसी प्रक्रि या माताओं को नहीं अपनानी चाहिए।
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दूसरी बात यह है कि आजकल बच्चे अक्सर अपने बड़े बुजुर्गों को अपशब्द बोल जाते हैं या फिर उनका नाम लेकर संबोधित करते हैं। इस पर अगर मां-बाप बच्चे के साथ होते हैं तो वे उसको समझाने एवं गलत, सही का ज्ञान देने की बजाय उसकी बात पर हंसते हैं किंतु आप ऐसा न करें और अपने बच्चे को प्यार एवं दुलार से समझायें कि ये आपके चाचा लगते हैं या ये आपके दादाजी, नाना-नानी लगते हैं। इनको इस तरह बुलायें, नाम से मत पुकारें। ऐसा न समझाने वाले मां-बाप के अंदर अपने से बड़ों का आदर करने के गुण नहीं होते, इसलिए वे बच्चे की बात पर हंसते हैं। आजकल बच्चे जब प्राथमिक विद्यालय में पहली कक्षा में पढऩे को जाते हैं तो विद्यालय में सब बातें बच्चों को बताई जानी चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व सन् 1990 के आस-पास शिक्षा-विभाग द्वारा प्रदत्त नैतिक शिक्षा का एक अनिवार्य विषय प्राथमिक विद्यालयों में हुआ करता था जो आज के समय में नहीं है। उस पाठ्यक्र म में अपने बड़ों का आदर करना अपने मां-बाप का, सुबह उठकर चरण-स्पर्श करके आर्शीवाद लेना आदि बातें बच्चों को बताई जाती थी। आज उस पाठ्यक्रम को फिर से चलाने की जरूरत है।
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अगर हम अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के विषय पर बात करें तो मुख्य रूप से एक बड़ी समस्या, जो हमारे रास्ते में आती है, वो यह है कि ज्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते और यदि आपने उन्हें डांटकर किसी तरह स्कूल भेज दिया तो वे अपने अध्यापक को बिना बताये छुट्टी लेकर खेतों में या बाग-बगीचों, पार्क वगैरह में बैठकर अपना समय व्यतीत करते हैं।
इन बच्चों को यह नहीं मालूम रहता कि ऐसा करके वे अपने जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसा कुछ बच्चे तभी करते हैं, जब इनको स्कूल में होमवर्क दिया जाता है, वे पूरा नहीं करते और दूसरे दिन कक्षा में अध्यापक के द्वारा डांट या मार खानी पड़ती है। इस डर की वजह से वे स्कूल छोडऩा चाहते हैं। माताओं का यह कर्तव्य होता है कि जिस विषय में आपका बेटा या बेटी पढऩे में कमजोर हैं, उस विषय को आप घर पर पढ़ायें। अगर आप शिक्षित नहीं हैं, आपके पति अगर पढ़े लिखे हैं तो उनकी मदद लें। यदि दोनों अशिक्षित हैं तो कोई ट्यूशन वगैरह लगवायें और अपने बच्चे के कक्षाध्यापक या फिर प्रधानाध्यापक को भी बतायें कि आपका बच्चा क्यों स्कूल से दूर भागता है? अपने बच्चों द्वारा पूछे गये सवालों का उचित जवाब दें। उनके प्रश्नों को टालने की कोशिश न करें क्योंकि बच्चों में अपने प्रश्नों का उत्तर जानने की जिज्ञासा प्रबल होती है और उचित जवाब न मिलने पर उनमें जिद की भावना जन्म ले लेती है। आपका बच्चा अपने पथ से भटक सकता है। अंत में हम सभी माताओं से अनुरोध करते हैं कि अपने बच्चों में नैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं देश की सेवा एवं उसकी रक्षा करने का संस्कार, अपने बच्चों को प्रदान करें।
– मूलचंद विश्वकर्माआप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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