बच्चे का शुरु से ही करें सही मार्गदर्शन

बच्चे का शुरु से ही करें सही मार्गदर्शन

बच्चों की देखभाल करना और समय-समय पर बच्चों को अपनी योग्यतानुसार कुछ न कुछ सिखाना हर मां के लिए सुखद अनुभव होता है। हर मां अपने बच्चे को नए रूप में नई हरकतें करते देख फूली नहीं समाती। कभी बच्चा कुछ गलत हरकत भी करता है तो वह उसे बच्चा समझ कर उसकी गलत हरकतें नजरअंदाज करती रहती है।
यदि बच्चों को गलत हरकत करते देखा जाए तो उस समय क्या सही है, क्या गलत है, उसका अहसास कराते रहें। चार छ: बार दोहराने से बच्चा समझ जाता है कि मुझे इन हरकतों को पुन: नहीं दोहराना चाहिए।
बच्चे को किस आयु में क्या सिखाएं, कुछ माताओं को इसका सही ज्ञान नहीं होता। आयु के अनुसार सिखाने पर बच्चा शीघ्र बात समझता है। बहुत कम उम्र में सिखाने पर बच्चे के मानसिक विकास पर अधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए आयु के अनुसार कुछ बातें बच्चा स्वयं सीखता है व कुछ बातों को बार-बार अभ्यास करवाकर सिखाना पड़ सकता है।
3 से 4 माह तक बच्चे को हाथ में उंगली पकड़वाना, हल्का झुनझुना पकडऩा, हर आधे घंटे पश्चात पेशाब करवाना आदि बातें मुख्य रूप से सिखाई जा सकती हैं। 5 माह के शिशु को सिरहाने या गद्दियों के सहारे सोफे के कोने पर थोड़ी देर बिठाना चाहिए। दिन में दो चार बार बिठाते रहने से छ: माह तक पहुंच कर वह बैठना सीख जायेगा। छ: सात माह के बच्चे को ‘टीदर’ और ग्लूकोस बिस्कुट हाथ में दे सकते हैं। यह ध्यान रखें, उसे कभी नुकीला प्लास्टिक का खिलौना मत दें।
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आठ माह तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे को फर्श या चटाई पर लिटा दें। वह आराम से पलटी ले सकता है। इससे उसके गिरने का भी डर नहीं रहता। यह ध्यान रखें कि उसके आसपास कोई वस्तु न हो। धीरे-धीरे उसे आगे बढऩे के लिए उकसायें। इस प्रकार वह घुटनों के बल चलना सीख जायेगा। ताली बजाना और ‘टाटा’ करना इसी आयु में सिखायें।
10-11 माह के बाद शिशु को मेज, चारपाई, पलंग के सहारे खड़ा होना सिखाएं। एक माह के अंदर वह स्वयं अपने सहारे पर खड़ा होने लगेगा। अब आप उसे शौच के लिए सुबह, शाम बैठायें और थोड़ी देर इंतजार करें। धीरे-धीरे वह पेशाब और शौच प्लास्टिक के पॉट में करना शुरु कर देगा। एक साल तक का बच्चा चलना शुरू कर देता है और कुछ शब्द भी उच्चारण करने लगता है। प्रतिदिन दिखने वाले लोगों के साथ पूरे आनंद से खेलने लगता है।
2 वर्ष तक के बच्चों को ‘टायलॅट सीट’ पर पकड़ कर बैठाना शुरू करें। दो तीन माह तक बच्चा स्वयं ‘टायलॅट सीट’ पर बैठना सीख जाता है। पेशाब वह स्वयं जाकर कर आता है पर शौच करते समय अभी भी उसे आपकी मदद की आवश्यकता होती है। इसी आयु में बच्चों के दांत नर्म ब्रश से स्वयं साफ करें। ढाई वर्ष की आयु तक बच्चा स्वयं अपने दांत साफ करने लगता है। 3 से 4 वर्ष वाले बच्चों को सफाई हेतु समझायें। खाने से पहले हाथ धोने हैं और बाद में हाथ धोकर कुल्ला करवाने का अभ्यास करायें। प्रतिदिन सुबह बच्चे को स्वयं नहलाएं।
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गर्मियों में शाम को उन्हें स्वयं नहाने का मौका दें जिससे बच्चा स्नान करना सीख जायेगा। नहाने के पश्चात उसे तौलिया दें और शरीर पोंछना व अंदरूनी वस्त्र पहनना सिखाएं। 4 से 5 वर्ष तक बच्चे स्वयं शरीर पर साबुन लगाकर नहाना सीख जाते हैं। धीरे-धीरे कंघी करना भी बतायें। इस आयु में बच्चा स्वयं खाना खा सकता है, अत: उसे खाना देकर उसके पास बैठ जाएं। जो काम गलत करता है, उसे प्यार से या डांट कर समझाएं। ‘नो’ का अर्थ उसे स्पष्ट करें। इस आयु तक आप बच्चे को ‘हैलो’, ‘थैंक्यू, ‘वेलकम’, ‘प्लीज’, ‘सॉरी’, एक्सक्यूज मी’ शब्दों का ज्ञान दे सकते हैं। इसके अलावा बच्चों को समझाएं कि वे बिजली के उपकरणों का प्रयोग न करें, न ही स्विच का ज्यादा प्रयोग करें। बच्चों को समझायें कि वे उंगली मुंह में न डालें। खिलौने, प्लास्टिक की वस्तुएं, पैंसिल, रबड़ आदि कुछ भी वस्तु मुंह में न डालें। गर्म और ठंडी वस्तुओं का अहसास होने पर उन्हें समझाएं कि किसी भी वस्तु को एकदम स्पर्श न करें।
मित्रों और रिश्तेदारों के बच्चों के साथ मिलकर खेलना सिखायें। अपने खिलौनों से दूसरे बच्चों के साथ खेलने की आदत डालें। वे अपने से छोटे बच्चों की पिटाई न करें, न दूसरे बच्चों से ईष्र्या करें, इन बातों को उन्हें समझाते रहें। घर आए मेहमान को नमस्ते अवश्य करें। जब दूसरों के मुख से बच्चों के गुणों की तारीफ सुनने को मिलती है तो मां फूली नहीं समाती। आप भी ऐसी मां बन सकती हैं।
– नीतू गुप्ता

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