बच्चा गोद लेने से हिचकें नहीं..!

बच्चा गोद लेने से हिचकें नहीं..!

लोक-परलोक, पाप-पुण्य, जप-तप-व्रत आदि धार्मिक कृत्यों में आस्था रखने वाले इस देश की स्त्रियों में मातृत्व सुख प्राप्त करना दांपत्य जीवन का पवित्र लक्ष्य माना जाता है। तभी तो महाभारत काल में जिन स्त्रियों के पति नपुंसक होते थे, उन्हें नियोग प्रथा के द्वारा संतान प्राप्त कर पितृऋण से मुक्त होने की पूर्ण आजादी थी। वंशावली को आगे बढ़ाने के लिए संतान की कामना भारतीय समाज में प्रबल रही है।उपर्युक्त अपेक्षाओं के कारण ही निसंतान स्त्रियों को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। हमारे यहां बांझ गाय एवं बांझ स्त्री को व्यर्थ एवं अनुपयोगी समझा जाता है। जिस प्रकार से अनुपयोगी घास-फूस को उखाड़कर फेंक देने की प्रवृत्ति किसानों में पायी जाती है ठीक उसी प्रकार से हमारे भारतीय समाज में बांझ स्त्रियों का परित्याग कर देने की दुष्प्रवृत्ति देखी जाती है।निस्संतान स्त्रियों को प्रताडि़त करने का प्रचलन कुछ अधिक जोर पकड़ता जा रहा है। मारना-पीटना, कठोर परिश्रम करवाने से लेकर घर से निर्वासित कर देना आम बात है। प्रताडऩा एवं उपेक्षा की परिणति कभी-कभी तलाक और आत्महत्या के रूप में देखने को मिलता है। ऐसी स्त्रियों के साथ प्रेम एवं सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए।यद्यपि आमजनों में यह सामान्य धारणा है कि संतान सुख प्राप्त होना या नहीं होना ईश्वर की कृपा है तथापि इसे शत प्रतिशत सच नहीं माना जा सकता।
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ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं जबकि स्त्री या पुरूष किसी एक में दोष रहने पर संतान सुख प्राप्त नहीं कर पाये हैं। ऐसे दोष समय पर उचित उपचार के द्वारा दूर किये जा सकते हैं। सौभाग्य से चिकित्साशास्त्र के नवीनतम अनुसंधानों के तहत आईवीएफ या अन्य वैज्ञानिक विधियों से मातृत्व सुख प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त निस्संतान दंपति किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर अपने सूने संसार को सुखमय बना सकते हैं।
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एक अनाथ बच्चे के जीवन को संवारने का पुण्य भी उन्हें मिलेगा। इसकी क्या गारंटी है कि अपना बच्चा बड़ा होकर वह सब सुख प्रदान करेगा जो प्रत्येक माता-पिता को अपने संतान से अपेक्षा रहती है। कभी-कभी अपनी संतान भी बिगड़कर दुख का कारण बन जाती है। ऐसे हालात में संभव है एक अनाथ बच्चा ही बुढ़ापे का संबल और सुख का कारण बन जाय। – अजय कुमार यादव

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