फेफड़ों की सफाई का प्राकृतिक उपाय है खांसी

फेफड़ों की सफाई का प्राकृतिक उपाय है खांसी

खांसी एक ऐसी बीमारी है जो मौसम में अचानक आए परिवर्तन के कारण लोगों को अपना शिकार बनाती है। बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग सभी इसका शिकार होते हैं। मौसम में अचानक हुए परिवर्तन के कारण होने वाली खांसी आम बात है लेकिन श्वास नली, स्वर यंत्र और फेफड़ों की क्रिया में गड़बड़ी के कारण होने वाली खांसी जो साल भर बनी रहे, तो यह ठीक नहीं है। ऐसी खांसी से छुटकारा पाने के लिए डाक्टर से उपचार जरूरी होता है।
लक्षण:- खांसी शुरू होने से पहले गले में खिच-खिच तथा खाते-पीते समय गले में चुभन सी होती है। आवाज भारी तथा गले में खराश होती है। रोगी को हल्का बुखार आ सकता है। घबराहट होती है और रोगी सुस्त और कमजोर हो जाता है। किसी काम को करने में रोगी का जी नहीं लगता।
ज्यादा खांसने से रोगी की छाती में दर्द होने लगता है। लगातार खांसी आने से कई बार रोगी को उल्टी आ जाती है। खांसी के साथ बलगम आ सकता है। रोगी की सांस फूलने लगती है।
कारण:- लगातार खांसी आने की क्रिया को कुकुर खांसी कहा जाता है जो होमोफाइल्स परटूसिस नामक जीवाणु के कारण पैदा होती है। रोग के जीवाणु रोगी के नाक के नीचे से निकलने वाले बलगम, लार, थूक और खांसी के अंत में मुंह से निकलने वाले चिकने बलगम में रहते हैं। रोगी के साथ रहने या उसके बलगम वगैरह सफाई ठीक से नहीं करने से रोग के जीवाणु ‘ड्राप्लेट इंफेक्शन- के रूप में स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रविष्ट होकर उसे रोगी बना देते हैं। रोगी के रक्त में श्वेत रक्तकणों की संख्या बढ़ जाती है। उसके पेशाब में यूरिक एसिड की मात्र बढ़ जाती है। पुराने दमा, जुकाम, तपेदिक, निमोनिया, छोटी चेचक, आंत के कीड़े और गठिया के कारण भी लगातार खांसी आ सकती है।
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वास्तव में खांसी कोई रोग नहीं है बल्कि यह फेफड़ों की गंदगी को निकालने का एक प्राकृतिक उपाय है। जब फेफड़ों में बलगम भर जाती है और स्वत: नहीं निकलती तो प्रकृति खांसी द्वारा उसे निकाल करके फेफड़े की सफाई का प्रयास करती है। दूषित वातावरण में मौजूद धुंआ, हवा, पानी और धूलकण भी श्वास नली में प्रवेश करके खांसी पैदा करते हैं। अधिक ठंडे, खुश्क, चटपटे एवं मसालेदार खाद्य पदार्थों के साथ-साथ ज्यादा डिब्बाबंद पेय पदार्थ सेवन करने से भी खांसी पैदा होती है। नियमित नशा करने से भी खांसी हो सकती है।
बचाव:- दूषित वातावरण, वाहनों से निकलने वाले धुएं एवं कारखानों से निकलने वाली रसायनिक गैसों से बचना चाहिए। कामगारों को फेस मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए। धूम्रपान व नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। गले के संक्रमण से बचने के लिए व्यस्त सड़कों पर नाक व मुंह को रूमाल से ढक लेना चाहिए। बदलते मौसम में बच्चों पर ज्यादा ध्यान दें। उन्हें पर्याप्त, कपड़े पहनाएं। रोगी को खांसते समय रूमाल से मुंह ढक लेना चाहिए। इससे दूसरा व्यक्ति रोग का शिकार नहीं होगा। खांसी का शिकार होते ही चिकित्सक से मिलकर परामर्श लेना चाहिए।
घरेलू उपचार:- निम्न नुस्खों का सेवन करें:-
– गर्म पानी में नमक डालकर गरारे करें। इससे गले के संक्रमण में लाभ मिलेगा। दिन में 2-3 बार भाप लेना भी हितकर होता है।
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– मुलहठी का चूर्ण 2 कप पानी में उबालें तथा उसमें चुटकी भर नमक मिला कर सुबह-शाम पिएं। इससे फेफड़े में जमा हुआ बलगम निकलकर बाहर आएगा और फेफड़ा साफ होगा। ज्यादा गला खराब होने पर मुलहठी का टुकड़ा चूसें।
– सम भाग अदरक रस तथा शहद में चुटकी भर काला नमक मिलाकर सुबह, दोपहर और रात को खाने के आधा घंटा बाद लगातार एक सप्ताह तक लेने से लाभ मिलेगा।
– लवंगादि वटी 2-2 गोली दिन में 3 बार रोगी को चूसने को दें। आराम मिलेगा।
– दाल चीनी- 10 ग्राम, छोटी इलायची 20 ग्राम, पीपल-40 ग्राम, वंशलोचन-80 ग्राम, और मिश्री 170 ग्राम-सभी द्रव्यों को कूट पीस छानकर रख लें। सितोपलादिचूर्ण नामक यह योग खांसी की एक श्रेष्ठ औषधि है।इसे 1/2 – 1/2 चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम किसी भी उम्र वाले को दिया जा सकता है। बच्चों को बड़ों से आधी मात्रा दें।
रोगी साफ हवादार कमरे में रहें। बलगम थूकने के लिए किसी प्लास्टिक चिल्मची में पानी डालकर रख दें। उसे पौष्टिक एवं सुपाच्य आहार दें। दूध, मीठे फल, फलों का ताजा जूस दिया जा सकता है। सब्जियों का सूप और उबला अंडा दिया जा सकता है। खट्टा दही, चावल, राजमां, उड़द की दाल अचार-चटनी वगैरह रोगी को न खिलाएं। रोगी को गर्म पानी से नहलाएं। बच्चों को मौसम की नमी से बचाएं।
-राजा तालुकदार

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