प्रेम के नाम पर अश्लीलता का प्रदर्शन मानसिक विकृति..!

प्रेम के नाम पर अश्लीलता का प्रदर्शन मानसिक विकृति..!

 प्रेम जीवन का अनिवार्य तत्व है। इसके बिना जीवन व सृष्टि की शाश्वतता की कल्पना भी असंभव है लेकिन प्रेम के नाम पर अश्लीलता का भोंडा प्रदर्शन करना किसी भी तरह से उचित नहीं। हमारी संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ माने गए हैं। काम भी एक पुरुषार्थ है और प्रेम इसी का एक रूप या अवयव है। अर्थोपार्जन भी एक पुरुषार्थ है लेकिन उसकी एक आचार संहिता अथवा नियमावली या कुछ क़ायदे-कानून हैं।
एक प्रजातांत्रिक देश में क़ायदे-कानून को ध्यान में रखकर ही हम सेवा, व्यापार अथवा उद्योग द्वारा पैसा कमा सकते हैं अन्यथा वह कमाई ग़ैरकानूनी व अनैतिक मानी जाएगी और ग़ैरकानूनी कार्य के लिए दण्ड भी दिया जा सकता है। इसी प्रकार काम अथवा प्रेम या प्रेम-प्रदर्शन की भी समाज, संस्कृति या कानून द्वारा सीमाएँ निर्धारित हैं। वैसे भी भजन, भोजन व काम इनको एकांत में करना ही श्रेयस्कर माना गया है।
प्रश्न उठता है कि प्रेम-प्रदर्शन क्या है? प्रेम मानसिक अवधारणा है जबकि काम शारीरिक। प्रेम का प्रदर्शन तो हम कर सकते हैं लेकिन वह दिखलाई कहाँ पड़ता है? वह तो करने वाले की अनुभूति होती है लेकिन काम क्रीड़ा एक शारीरिक प्रक्रिया है जिसमें समय और स्थान की मर्यादा का पालन अनिवार्य है। जिसे हम प्रेम-प्रदर्शन कह देते हैं वह प्रेम-प्रदर्शन नहीं। वह काम-चेष्टाओं का प्रदर्शन है। काम-चेष्टाओं का प्रदर्शन प्रेम-प्रदर्शन नहीं। प्रेम दिखावे की वस्तु नहीं। यह आंतरिक अनुभूति है अत: अन्य भौतिक वस्तुओं की तरह प्रदर्शित की ही नहीं जा सकती।
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जिसे हम प्रेम-प्रदर्शन कहते हैं वह वास्तव में प्रेम नहीं, कामुकता का प्रदर्शन होता है। काम-चेष्टाएँ प्रदर्शन की नहीं, एकांत की क्रियाएँ होती हैं अत: उनका सार्वजनिक स्थलों पर ही नहीं, अन्य किसी के भी सामने प्रदर्शन करना अशालीन, अश्लील व अशोभनीय है। काम का दमन विध्वंसकारी हो सकता है अत: उसका परिष्कार अनिवार्य है। संयम द्वारा उसे रूपांतरित किया जाना चाहिए। देश-काल की मर्यादाओं के अनुसार ही कोई क्रिया कहीं प्रदर्शित की जा सकती है।
हम मल-मूत्र का त्याग तक सार्वजनिक स्थलों पर या खुले में नहीं करते और न ही ऐसा करना अच्छा माना जाता है फिर तथाकथित काम-चेष्टाओं का सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन कैसे ठीक माना जा सकता है? जहाँ तक काम-चेष्टाओं, अंग-प्रदर्शन व नग्नता के प्रदर्शन का प्रश्न है यह उच्छृंखलता के साथ-साथ एक मनोविकृति भी है। असंवैधानिक न होते हुए भी अनैतिक व अस्वाभाविक ज़रूर है। भोजन रसोईघर में बनता है, स्नान स्नानागार में किया जाता है तथा शौचादि के लिए शौचालय में ही जाते हैं तो बेडरूम की क्रियाएँ सार्वजनिक स्थलों पर करने का क्या औचित्य है?
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काम जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है लेकिन सार्वजनिक रूप से ही नहीं, गुप्त रूप से भी इसके व्यावहारिक प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था समाज व संस्कृति में नहीं है तो फिर काम का सार्वजनिक प्रदर्शन केसे स्वीकार्य हो सकता है? यदि समाज में काम के क्षेत्र में मर्यादा अपेक्षित नहीं तो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उसकी क्या प्रासंगिकता हो सकती है? ऐसे में उसका सभ्य और शिष्ट होना, अच्छे वस्त्र पहनना, साथ-सुथरा रहना अथवा शिष्ट भाषा का प्रयोग करना भी ज़रूरी नहीं रह जाता।
– सीताराम गुप्ता

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