प्रेम की प्रतिमूर्ति ही तो थे सत्य साईं बाबा

प्रेम की प्रतिमूर्ति ही तो थे सत्य साईं बाबा

पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा इस नश्वर संसार से चले गए क्योंकि इस संसार में जो आया है, उसे एक न एक दिन जाना ही होता है। वो चले गए लेकिन उनके चले जाने के बाद न जाने कितनी आंखों से अश्रुओं का सैलाब थम ही नहीं रहा है। कारण स्पष्ट है। बाबा ने उनके दिलों में स्थान बनाया होगा। यूं ही कोई किसी के लिए आंसू नहीं बहाता।
यह कैसे संभव है कि कोई इतना अधिक काम करे और कोई विवाद उसके नाम के साथ न जुड़े? उनके चाहने वालों की पीड़ा ही नहीं, बाबा से जुड़े कुछ विवाद भी आज मीडिया की सुर्खियां बने हुए
हैं।
मीडिया में बाबा का जीवनवृत्त ही नहीं, बाबा से जुड़े विवाद भी प्रकाशित हो रहे हैं। बाबा का जन्म 13 नवंबर सन् 1926 को हुआ और 24 अप्रैल 2011 को उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग किया। अधिकांश लोगों ने लिखा है कि बाबा ने 86 वर्ष की उम्र में नश्वर शरीर छोड़ा। यदि उनकी आयु की सही गणना करें तो वो 84 वर्ष और कुछ महीने बैठती है जबकि अधिकांश लोग उनकी उम्र 86 वर्ष लिख रहे हैं। जब हम इतने स्थूल तथ्यों का सही आकलन नहीं कर सकते तो फिर सूक्ष्म मूल्यांकन कैसे करेंगे, यह बात गौर करने लायक है। पता नहीं क्यों हम दूसरों की कही-सुनी बातों पर अपनी मुहर लगाने में देर नहीं करते?
बाबा पर जो सबसे बड़ा आरोप है, वो है जादूगरी का। बाबा एक जादूगर की तरह हवा से चीज़ों को प्रकट कर लोगों को विस्मित कर देते थे। लोग उनसे सम्मोहित हो जाते थे। जादूगरी और सम्मोहन दोनों ही कलाएं हैं। सम्मोहन एक चिकित्सा पद्धति ही नहीं, ध्यान का भी अनिवार्य तत्व है। यदि बाबा इन कलाओं अथवा विद्याओं का प्रयोग करते थे तो यह अपराध तो नहीं हुआ। संभव है वे इन कलाओं अथवा विद्याओं के द्वारा लोगों से जुडऩा चाहते हों, उनका प्रेम पाना चाहते हों या उनसे प्रेम करना चाहते हों।
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बाबा ने कहा है कि जो तुम्हारी आलोचना करता है वह भी परोक्ष रूप से तुमसे जुडऩा ही चाहता है। कहीं हम सब भी तो उनसे जुडऩा नहीं चाहते? आलोचना या निंदा शायद नकारात्मक तरीक़ा हो किसी से जुडऩे का लेकिन सम्मोहन या जादूगरी तो नकारात्मक भी नहीं।
प्रेम करना और प्रेम पाना, यह मनुष्य का मूल स्वभाव है। कभी-कभी इसके लिए अति नाटकीयता भी कर बैठता है वह। दिखाना भी चाहता है कि मैं अधिक प्रेम करता हूं या कर सकता हूं। बहुत पहले एक बार मेरे मन में भी विचार आया था कि मैं जादू की छोटी-मोटी कुछ ट्रिक्स सीख लूं और लोगों को हैरान करूं। मैं हवा में से चॉकलेट्स और टॉफियां प्रकट कर बच्चों को दूं। इससे वे कितने ख़ुश होंगे और मुझे घेर लेंगे। मुझसे बार-बार चॉकलेट्स और टॉफियां प्रकट करने की जि़द करेंगे। कुछ दूसरी चीज़ों की फरमाइश भी कर सकते हैं। यह सोचकर ही अच्छा लगता था। ऐसा जादू सीखने और करने के पीछे किसी भी तरह की दुर्भावना नजऱ नहीं आती।
बाबा सबका प्यार पाना चाहते थे। सबको शिशुवत हैरान करके ख़ुश होना चाहते थे। अपनी प्रशंसा भी चाहते हों तो यह भी कोई अपराध तो नहीं। हम सब भी तो प्यार, प्रशंसा और सम्मान पाना चाहते हैं। प्यार से जो भाव उत्पन्न होता है वह प्यार करने वाले के प्रति समर्पण और देखभाल की भावना उत्पन्न करता है।
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बाबा ने जन कल्याण के लिए जो हज़ारों संस्थाएं खोलीं, क्या वे उसी प्यार का प्रतिदान नहीं? क्या इसके पीछे समर्पण और देखभाल का जज़्बा नहीं? प्यार, स्वास्थ्य और उपचार, इन सब के लिए सम्मोहन ज़रूरी है। सम्मोहन के अभाव में ये तीनों चीज़ें संभव ही नहीं।
जो सम्मोहित होना जानता है, वही प्यार का रसास्वादन कर सकता है, उसमें डूब सकता है। सम्मोहित होने वाला अथवा प्यार में डूबने वाला ही अच्छा स्वास्थ्य पा सकता है और रोग होने पर रोग से मुक्ति भी। किसी का उपचार करना हो, किसी का उद्धार करना हो अथवा किसी को रूपांतरित करना हो तो सम्मोहन ज़रूरी है। जो सम्मोहित नहीं हो सकता, वह इन सबसे वंचित रह जाता है। जो सम्मोहित नहीं कर सकता, उसे चिकित्सक भी अधूरा ही समझो।
सभी सम्मोहित होना जानते हैं केवल तीन तरह के लोगों को छोड़ कर और वो हैं मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति, अत्यधिक चतुर-चालाक व्यक्ति अथवा बुद्धिहीन व्यक्ति। बाबा पर आक्षेप लगाने का अर्थ कहीं यह तो नहीं कि हम उपरोक्त में से किसी एक श्रेणी में आते हों?
– सीताराम गुप्ता

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