पूरी तरह उपेक्षित है देश को ‘भारत’ नाम देने वाला आश्रम

पूरी तरह उपेक्षित है देश को ‘भारत’ नाम देने वाला आश्रम

Untitled-1 copyकोटद्वार! जी हां कोटद्वार शहर से मात्र 7-8 किलोमीटर की दूरी पर मालिनी नदी के किनारे स्थित कभी देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का ध्यानाकर्षण कराने योग्य मनोरम रहा आश्रम आज अपने अस्तित्व को बचा पाने में पूरी तरह नाकाम हो रहा है। उत्तराखण्ड राज्य का गठन होने के बाद इस आश्रम के जीर्णोद्धार की आशा परवान चढ़ने की उम्मीद थी, इस दिशा में उत्तराखण्ड राज्य में बनी प्रथम सरकार ने इसके जीर्णोद्धार की घोषणा भी की थी, लेकिन उक्त घोषणा केवल दो सरकारी गेस्ट हाऊस बनाने तक ही सीमित रही। सरकार और सरकारी अफसरों की उदासीनता का आलम यह है कि ये गेस्ट हाऊस आज कुछ मनचलों और अवांछित लोगां का तफरीह स्थल मात्रा बन कर रह गये हैं। आश्चर्य की बात है कि बहुत से कोटद्वार वासी यहां की इतिहास प्रसिद्ध महान थाती से अपरिचित हैं।
इससे बडी विडम्बना क्या होगी कि सरकारी स्तर पर तो इस स्थान को विकसित करने का कोई प्रयास किया ही नहीं गया, बल्कि यहां स्थानीय निवासी विश्व प्रख्यात् पर्यावरणविद् डा.अनिल जोशी द्वारा आश्रम की प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए किये जा रहे प्रयासों को भी अवैध् खनन के हथियार से नाकाम कर दिया था। इसके बावजूद अल्प प्रयास के दौरान खुदाई में मिली सामग्री वहां प्राचीन काल में किसी भव्य आश्रम के होने का संकेत मिले थे, जो आज भी वहां एक कमरे में बंद हैं। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक चंद्रगुप्त की भूमिका में यहां स्थित प्राचीन शिवमन्दिर स्थित शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख को कुटिल लिपि में लिखे गए देश के श्रेष्ठतम शिलालेखों में शीर्ष माना जाता है। शिलालेख में इस स्थान को प्राचीनतम धार्मिक तीर्थस्थल उल्लेखित करने के साथ ही लिखा हुआ है कि यह प्राचीनतम कण्व आश्रम है।
आश्रम के निकटस्थ मवाकोट निवासी नन्दकिशोर कोटनाला द्वारा बताई दंत कथा भी इतिहास के पन्नों पर अंकित शकुन्तला-दुष्यंत की कहानी को पुष्ट करती है। कहानी के अनुसार अजमेर के निकट पुष्कर में एक बार विश्वामित्र घोर तपस्या में लीन थे। विश्वामित्र को कठिन तपस्या करते देख देवराज इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा और उन्होंने चिन्तित होकर मेनका नाम की अप्सरा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिये भेजा। कठिन प्रयासों के बाद मेनका अपने कुत्सित प्रयासों में सफल भी हो गयी। परिणामस्वरूप विश्वामित्र का तपस्या से मन उचट गया और वे मेनका के मोहजाल में फंसकर संयास से गृहस्थ की ओर मुड़ने लगे, इसी बीच मेनका-विश्वामित्र के मिलन से एक कन्या का जन्म हुआ। एक दिन मेनका देवराज इन्द्र के आदेश से अपनी बच्ची को कोटद्वार स्थित मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्व रिषि के आश्रम में छोड़कर अचानक स्वर्ग को लौट गयी। कण्व ऋषि के आश्रम में उस अबोध् कन्या बाद में जिसका नाम शकुन्तला पड़ा का पालन-पोषण होने लगा।
एक बार राजा दुष्यंत वन में आखेट के लिए गये। जिस वन में वो आखेट खेलने गये थे उसी घने वन में एक महान ऋषि कण्व का भी आश्रम था। राजा दुष्यंत ऋषि कण्व के दर्शन करने के लिए उनके आश्रम में पहुच गये। जब उन्होंने आश्रम में ऋषि को आवाज लगायी तो एक सुंदर कन्या आश्रम से आयी और उसने बताया कि ऋषि तो तीर्थ यात्रा पर गये हुए है। परिचय पूछने पर कन्या अपना नाम ऋषि पुत्री शकुंतला बताया। राजा आश्चर्य हुआ कि ऋषि कण्व तो ब्रह्मचारी है, तो शकुंतला ने बताया कि मेरे माता पिता तो मेनका-विश्वामित्र है, जो मेरे जन्म होते ही जंगल में छोड़ गये थे, शकुन्त नाम के पक्षी द्वारा मेरी रक्षा करने के कारण मेरा नाम शकुंतला है और पालन-पोषण के कारण कण्व ऋषि ही मेरे पिता हैं। हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत उस कन्या पर मोहित होकर सुधबुध खो बैठे और उन्होंने शकुन्तला से एक मन्दिर में आनन-फानन में गंधर्व विवाह रचा लिया। कुछ दिन शकुन्तला के बिना बिताने के बाद दुष्यंत शकुन्तला को बतौर निशानी एक अंगूठी देकर अपने राज्य में लौट आये और राजकाज में व्यस्त हो गये।
कहते हैं दुष्यंत के विचारों में गुम शकुन्तला से एक बार वहां पधरे दुर्वासा मुनि की अनदेखी हो गयी, जिससे क्रोधित मुनि ने शकुन्तला को श्राप दिया कि जिसके ध्यान में तू मुझे भूल गयी, उसी तरह वह भी तूझे भूल जायेगा। शनै-शनै शकुन्तला के गर्भ में दुष्यंत का शिशु बडा होने लगा, जिससे चिन्तित कण्व ऋषि शकुन्तला को लेकर दुष्यंत के दरबार में पहुंचे, लेकिन श्राप के प्रभाव से राजा ने शकुन्तला को पहचानने से इंकार कर दिया और शकुन्तला दुष्यंत द्वारा दी गयी अंगुठी भी गुम हो जाने के कारण समय पर प्रस्तुत नहीं कर सकी। उपेक्षा और बेइज्जती को घूंट पीकर कण्व ऋषि शकुन्तला को लेकर आश्रम लौट आये, जहां कुछ समय बाद उसने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। वह बालक जो बाद में चलकर भरत के नाम से विख्यात् हुआ, ‘कालान्तर में जिसके नाम पर आर्यवृत देश का नाम भारत पड़ा’ बचपन से होनहार निर्भिक प्रवृत्ति का था।
किवदंती है कि उक्त अंगूठी मालिनी नदी में नहाते समय शकुन्तला की अंगुली से निकलकर पानी में गिर गयी थी, जिसे एक मछली ने निगल लिया था। वही मछली एक दिन मछुआरे के जाल में फंस गयी, जब मछुआरे ने मछली का पेट चीरा तो उसके पेट से वह अंगुठी निकली। अंगुठी पर शाही निशान होने के कारण वह अंगुठी राजा तक पहुंच गयी, जिसे देखकर राजा को सारी भूली हुई बातें याद आने लगी और राजा परेशान रहने लगा। महाराज ने तुरंत शकुंतला की खोज करने के लिए सैनिको को भेजा लेकिन कही पता नही चला। कालांतर में इंद्रदेव के निमन्त्रण पर देवासुर युद्ध के लिए राजा दुष्यंत इंद्र नगरी अमरावती गये। वहां से वापस लौटते समय राजा दुष्यंत ने वन में अनायास ही देखा कि एक निहत्था बालक वन में शेर के बच्चे का मुंह खोलकर उसके दांत गिन रहा है और वहीं पास खडी उसकी मां शेरनी गुर्रा रही है। बालक की निर्भिकता और बहादुरी देख राजा विस्मित और प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके और बालक के पास जाकर उसका परिचय जानना चाहा। राजा ने दुलारवश जैसे ही उस बालक को गोद में उठाया, तो उस बालक के भुजा में बंधा काला डोरा टूट गया जिसमें उसके पिता की निशानी थी।
इसके बाद मनुहार करके राजा दुष्यंत भारत को राजमहल ले आये। भरत कालांतर बेहद प्रतापी और बुद्धिमान राजा के रूप में प्रख्यात् हुए और बाद में उनके नाम पर आर्यवृत देश का नाम भारत पड़ गया।
हवलेश कुमार पटेल

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