पुराने डीजल वाहन बढ़ाएंगे पर्यावरण का दर्द

पुराने डीजल वाहन बढ़ाएंगे पर्यावरण का दर्द

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम.बी. लोकुर और दीपक गुप्ता की बेंच ने 29 मार्च को एक फैसले में कहा था कि पूरे भारत में 1 अप्रैल 2017 से बीएस-3 तकनीक पर आधारित कोई भी वाहन न तो बेचा जाएगा और न ही उसका रजिस्ट्रेशन होगा ताकि प्रदूषण की मार झेलते समाज को कुछ राहत मिले। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह उम्मीद जगी थी कि शायद अब कुछ बदलाव आ जाए पर अगले ही दिन सारे भ्रम दूर हो गए।
वाहन बनाने वाली कंपनियों ने भारतीयों की दुखती रग पर हाथ रख दिया और वह है मुफ्त का माल। सब जगह बोर्ड लग गए, लो जी लो नवरात्र में भारी छूट। अगले दिन हर बड़ा अखबार छूट की खबरों से भरा पड़ा था। फिर क्या होना था, शोरूम पर बड़ी कतारें देखने को मिलीं। ऐसा लग रहा था कि आज आधे भारत को वाहन खरीदना याद आ गया। दो दिनों के भीतर लाखों की संख्या में वाहन बिके।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले कंपनियों के स्टाक में बीएस-3 पर आधारित वाहनों की संख्या लगभग 9 लाख थी। सोसायटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स के मुताबिक इन वाहनों की कुल कीमत करीब 12 हजार करोड़ रुपये है। जाहिर है भारत में कंपनियां लोगों की जान की कीमत पर भी नुकसान नहीं उठाना चाहती थी, इसलिए कंपनियों ने 31 मार्च की डेडलाइन खत्म होने से पहले इन वाहनों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। इसके लिए इन कपंनियों ने ग्राहकों को भारी डिस्काउंट का लालच दिया। आखिर छूट का सवाल था और प्रदूषण, उसका क्या? जवाब एक ही था-अरे भाई थोड़ा और बढ़ जाएगा तो क्या? जिन बेचारे लोगों के लिए सरकार जागी, यह फैसला आया, वे तो खुद मरने को तैयार बैठे हैं। क्यों नहीं भाई, मुफ्त का जहर मिलेगा तो भी हम स्टाक कर लेंगे।
बीएस-3 तकनीक पर आधारित वाहनों को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना जाता है लेकिन आज देश भर के लोगों ने भारी डिस्काउंट के लालच में लाखों जहरीले वाहन खरीद लिए हैं यानी कंपनियों के इस अनैतिक डिस्काउंट के चक्कर में लोगों ने वो वाहन खुशी-खुशी खरीद लिए जो मानकों से ज्यादा प्रदूषण फैलाएंगे और आने वाले समय में भारत में लाखों लोगों की जान ले लेंगे।
बीएस का मतलब होता है भारत स्टेज। यह इमीशन का एक मानक है। जिससे तय होता है कि कोई वाहन कितना प्रदूषण फैलाता है। अभी तक भारत में दिल्ली-एनसीआर के अलावा सिर्फ 13 शहर ऐसे हैं जहां बीएस-4 से नीचे के मानकों पर आधारित वाहन बेचना गैरकानूनी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 1 अप्रैल से देश के किसी भी शहर में बीएस 3 वाहनों की बिक्री बंद हो जाएगी। भारत में इमीशन के लिए भारत स्टेज मानकों की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी और तब से लेकर अब तक बीएस-1, बीएस-2, बीएस-3 और बीएस- 4 मानकों पर आधारित वाहन बाजार में आ चुके हैं। भारत स्टेज इमीशन यूरोपियन रेगुलेशंस पर आधारित है।
हमारे देश में वायु प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान डीजल वाहन ईंधन का है। यह भी कहा जाता है कि हमारे यहां बिकने वाला डीजल अंतरराष्ट्रीय मानकों से तीन सौ गुना घटिया है। ऊपर से सितम यह है कि भारत में डीजल ईंधन की खपत पेट्रोल के मुकाबले कहीं ज्यादा है क्योंकि डीजल के दाम पेट्रोल के मुकाबले काफी कम रहते हैं, इसलिए लोग डीजल वाहनों की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं। अगर हम वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाना चाहते हैं तो हमें ज्यादा वायु प्रदूषण कारक डीजल के प्रयोग को हतोत्साहित करना होगा और इसके लिए आवश्यक होगा कि डीजल के बाजार भाव को पेट्रोल के बाजार भाव से ज्यादा रखा जाए ताकि लोग पेट्रोल वाहनों की ओर आकर्षित हों जो कम वायु प्रदूषण करते
हैं।
वर्तमान में अमेरिका और यूरोप के देशों में जो नए वाहन बेचे जा रहे हैं वो यूरो 6 तकनीक पर आधारित हैं यानी भारत से दो कदम आगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि यूरोप में इमीशन के मानक के तौर पर यूरो 6 की शुरुआत वर्ष 2014 में ही हो गई थी जबकि भारत में बीएस-6 वाहनों के लिए डेडलाइन वर्ष 2020 रखी गई है यानी जब तक भारत बीएस-6 तक पहुंचेगा तब तक यूरोप में ऐसे वाहन आने लगेंगे जो नाम मात्र का प्रदूषण फैलाते हैं। भारत में बीएस 6 से पहले बीएस-5 मानक लाए जाने की तैयारी थी लेकिन बढ़ते प्रदूषण के देखते हुए बीएस-4 के बाद भारत में सीधे बीएस-6 लाने की तैयारी है। पश्चिमी आटोमोबाइल कम्पनियां हमेशा ही अपनी पुरानी तकनीक कुछ साल के लिए भारत में खपा देती हैं। फोक्स वैगन कम्पनी ने स्वीकार किया था कि अमरीका में बेची गई हजारों गाडिय़ों में एक विशेष साफ्टवेयर लगाया ताकि वह टेस्ट के समय कम जहरीली गैसों का उत्सर्जन करे। दुनिया की सबसे बड़ी कार बनाने वाली कम्पनी अमरीका में ऐसा कर सकती है तो भारत में तो भगवान ही मालिक है। 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी दुनिया के सबसे प्रदूषित 1,600 शहरों की सूची में दिल्ली पहले पायदान पर था। पहले 20 शहरों में भारत के अन्य 12 शहर शामिल थे। प्रदूषण की इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने जनवरी 2016 में घोषणा की थी कि भारत में बिकने वाले वाले सभी वाहनों को 1 अप्रैल 2017 तक उत्सर्जन संबंधी उच्च मानकों को पूरा करना होगा यानी यह नहीं कहा जा सकता कि आटो मोबाइल निर्माताओं को पर्याप्त समय नहीं मिला।
सवाल यह भी है कि जब मोटर वाहन निर्माता कंपनियों को मालूम था कि एक अप्रैल 2017 से प्रदूषण नियंत्रण का नया प्रतिमान बीएस-4 (भारत स्टैंडर्ड-4) अमल में आ जाएगा तो वे भारत स्टैंडर्ड-3 वाली गाडिय़ों का उत्पादन क्यों करती रहीं? जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया तो बीएस-3 वाहन बेचनेवाली कंपनियों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि वे अपने डीलरों से संपर्क करके बीएस -3 वाहनों को वापस बुला कर उनमें बीएस-4 के इंजन लगाकर वापस बाजार में उतारती लेकिन उन्होंने ऐसा न करते हुए मामूली फायदे के लिए पर्यावरण और कोर्ट के फैसले की अवमानना की है जो सभी के लिए नुकसानदायक साबित होगा वहीं बीएस-3 वाहन खरीद कर भारत के लोगों ने यह बता दिया कि वो पर्यावरण को साफ करने की जिम्मेदारी कभी नहीं उठाना चाहते।
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भारत के लोगों को पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं हैं। उनके लिए पांच, दस या बीस हजार रुपये बचाना ज्यादा जरूरी है। प्रदूषण फैले या ना फैले, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। हंमारे देश के लोगों को लगता है कि पर्यावरण की रक्षा करना सिर्फ सरकार और सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है। वाहनों के डिस्काउंट के साथ वाहन बेचने पर लोगों ने भी पर्यावरण पर ध्यान न देते हुए सिर्फ बीएस -3 गाडिय़ां खरीदने पर ही ध्यान दिया। अब जो गाडिय़ां बिक चुकी है वे करीब पंद्रह वर्षो तक देश में प्रदूषण फैलाएंगी।
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पैसा कमाने के लिए कंपनियों ने और डिस्काउंट के चक्कर में बीएस-3 गाडिय़ां खरीदकर हमने बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब भी समय है कि लोग प्रदूषण से मुक्ति के लिए सरकारी नीतियां लागू करने में सहयोग करें। हर बार मुद्दा उठने पर बाद में उसे भुला न दिया जाए। हमें ऐसी जीवन शैली विकसित करनी चाहिए ताकि आने वाली पीढिय़ां स्वस्थ रह सकें। केवल प्रदूषण फैलाने वाली गाडिय़ों की बिक्री रोक देने से ही समस्या का हल नहीं होगा बल्कि देश के हर नागरिक को धरती पर हरियाली को बचाने के प्रयास करने होंगे।– आशीष वशिष्ठ

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