‘पीके’ की निगाहें और ‘राशी’ का निशाना

‘पीके’ की निगाहें और ‘राशी’ का निशाना

RR Tiwariदेश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष 2०17 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव की तैयारी अमूमन सारी पार्टियों द्वारा कमोबेश अपने-अपने हिसाब से की जा रही है। बेशक, केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा और प्रदेश में सत्तासीन सपा द्वारा की जा रही चुनाव की तैयारियों की जितनी चर्चा नहीं है, उससे कई गुणा ज्यादा चर्चा सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी कांग्रेस की तैयारियों की है। वजह स्पष्ट है, आजादी के बाद से 27 वर्ष पहले तक राज्य में कांग्रेस का राज रहा। इसके बाद धीरे-धीरे कांग्रेस की दशा और दिशा बिगड़ती गई तथा वोटर भी नए-नए ठौर-ठिकानों पर टिकते चले गए। कह सकते हैं कि राष्ट्रीय हाईकमान हो अथवा प्रदेश अध्यक्ष, किसी ने भी अपने वोटरों को गोलबंद रखने के लिए कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया। इस बार हालात कुछ बदले नजर आ रहे हैं। इसका श्रेय चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पीके और राज बब्बर शीला दीक्षित की जोड़ी यानी ‘राशी’ को दिया जा रहा है। आजकल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं। बताते हैं कि प्राचीन यूरोप के चर्चित रचनाकार होमर की विश्व प्रसिद्ध कृति ओडिसी की शैली में कांग्रेसी नेता चुनाव के दौरान अभिनय करने का रिहर्सल कर रहे हैं। नेताओं के उस रिहर्सल पर जहां पीके की पैनी निगाहें हैं, वहीं चुनाव जीतने को राशी सटीक निशाना साधने की जुगत में है।
ओडिसी प्राचीन यूरोप के महान रचनाकार होमर की कथाकारिता का बेमिशाल नमूना है। ओडिसी में विश्व प्रसिद्ध ट्रॉय-युद्ध के महान योद्धा ओडिसियस की घर वापसी का वृत्तान्त है। खास बात यह है कि इस कृति की विशेषताओं की पुनरावृत्ति परवर्ती कथाकारों द्वारा नहीं की जा सकी। इसने सम्पूर्ण विश्व के कथा साहित्य को प्रभावित किया। इसका रचनाफलक व्यापक है, जिसमें मानवीय संबंध, क्रियाकलाप और समाज के सभी पक्षों का समावेश है। नित परिवर्तनशील विश्व के सुख-दुख और संघर्षों के चित्रण के माध्यम से ओडिसी में होमर ने जीवन और जगत के यथार्थ को उजागर करते हुए यह रेखांकित किया है कि साहस, उत्साह और जिज्ञासावृत्ति से ही मनुष्य सफलता के शिखर पर पहुँचता है। होमर के रचनाकौशल ने दृश्य-जगत की वास्तविकताओं को कुछ इस तरह सहेजा है कि जटिल संरचना के बावजूद ओडिसी का कथाप्रवाह पाठकों का औत्सुक्य बनाए रखता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण ई.पू. 850 के आसपास जन्मे होमर की कृति प्रेरणादायी है। खैर, हम चर्चा देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की कर रहे हैं, जिसके माध्यम से ही दिल्ली दरबार तक पहुंचा जाता है। अगले वर्ष 2०17 में यूपी में विधानसभा का चुनाव है, लेकिन कोई भी दल वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही इस चुनाव को लडऩा चाहता है। यद्यपि तैयारियां तो सभी दलों द्वारा की जा रही हैं, पर सर्वाधिक चर्चा में कांग्रेस ही है। बताते हैं कि कांग्रेस राज्य में पुनस्थापित होने की प्रक्रिया वहीं से शुरू कर रही है, जहां से 27 वर्ष पहले 1989 में यूपी की सत्ता के पायदान की आखिरी सीढिय़ां पार की थीं। कहा जा रहा है कि जिस तरह से नरेंद्र मोदी की सरकार में फेरबदल पर यूपी के चुनाव की छाया रही, उसी तरह राहुल की टीम पर भी यूपी चुनाव का असर दिख है। मुख्यमंत्री पद का दावेदार या प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाए जाने से नाराज जितिन प्रसाद को राष्ट्रीय कमेटी में लाने की संभावना है। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह को कांग्रेस मीडिया विभाग का प्रमुख बनाने की चर्चा थी, लेकिन अब कहा जा रहा है कि उन्हें यूपी के मीडिया विभाग का प्रभारी बनाया जाएगा। दलित नेता पीएल पुनिया का राष्ट्रीय एससी आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म होने वाला है। उन्हें भी पार्टी की राष्ट्रीय टीम में अहम जिम्मेदारी देने की चर्चा है। दो पूर्व केंद्रीय मंत्रियों सलमान खुर्शीद और आदित्य जैन भी राष्ट्रीय टीम में जा सकते हैं। यदि आरपीएन राष्ट्रीय टीम में नहीं आते हैं तो किसी और ओबीसी चेहरे को राष्ट्रीय टीम में प्रमुखता मिलेगी। इसके अलावा जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी के पीछे मुस्लिम संगठन आ गए हैं। दिल्ली के अशोका होटल में जमात नेता अरशद मदनी के ईद मिलन समारोह में राहुल गांधी को लेकर मुस्लिम नेताओं ने ऐसे केमेस्ट्री झलकाई कि उन्होने यूपी के चुनाव के लिए तुरंत मुस्लिम-ब्राह्मण फार्मूला अपनाया। हकीकत में मुस्लिम जमात का वह शो राहुल गांधी में जोश फूँकने के लिए था। ईद पहले मन चुकी थी, मगर राहुल गांधी विदेश में थे, सो उनके लौटने के बाद ईद मिलन हुआ। तमाम सेकुलर नेताओं को बुलाया गया। उन नेताओं का वह जमावड़ा था जिनकी दिली इच्छा यूपी में भाजपा को हराना है।
वैसे शीला दीक्षित की वजह से धारणा यह है कि कांग्रेस ब्राह्मण वोटो पर फोकस कर रही है। कांग्रेस ने जर्नादन द्विवेदी से शीला दीक्षित के नाम की घोषणा करवाई। कहा जा रहा है कि यूपी में जीत-हार का फ़ैसला ब्राह्मण ही करेंगे। ब्राह्मण यदि बसपा के साथ गया तो आम मुसलमान उसकी तरफ़ थोक में जाएगा। यदि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित को झोक कर ब्राह्मणों को अपनी छाँटी हुई सीटों पर रिझाया तो उन सीटों का मुसलमान कांग्रेस की ओर थोक में मुड़ सकता है। मतलब, बसपा का दलित और सपा के यादव कोर के साथ मुसलमान तब जाएगा जब एक और बड़ी मज़बूत जाति जुड़े। कांग्रेस में फिलहाल ब्राह्मण नहीं है लेकिन पुराना जुड़ाव और बैकग्राउंड तो है ही। इसीलिए पीके ने शीला दीक्षित को प्रोजेक्ट करने का फैसला कांग्रेस नेतृत्व से कराया। लगता है राहुल गांधी, प्रशांत किशोर मान रहे है कि हिंदू बनाम मुस्लिम की लोकसभा जैसी राजनीति विधानसभा में सिरे नहीं चढ़ेगी। ब्राह्मण-राजपूत की फारवर्ड जाति का अब भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस पर भरोसा बढ़ा है। जानकार बताते हैं कि 1989 में भी गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के साथ यूपी के प्रभारी थे और आज भी इसी हैसियत में हैं। तब यूपी में कांग्रेस का ब्राह्मण चेहरा रहे नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे और आज पार्टी के ब्राह्मण चेहरे के रूप में शीला दीक्षित यूपी में कांग्रेस की सीएम कैंडिडेट हैं। 27 साल पहले यूपी कांग्रेस की कमान सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के घोर प्रतिद्वंदी रहे बलराम सिंह यादव के हाथों में थी और आज राज बब्बर प्रदेश कांग्रेस के मुखिया हैं।
राज्य के राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार आशीष मिश्र बताते हैं कि 5 दिसंबर, 1989 को सत्ता गंवाने के 27 साल बाद 17 जुलाई, 2016 पहली बार यूपी की राजधानी लखनऊ कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के उस जुनून का गवाह बनी, जो सत्ता में वापसी की उम्मीद से पैदा हुआ था। नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और मुख्यमंत्री पद की दावेदार शीला दीक्षित के स्वागत के लिए लखनऊ के प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय से अमौसी हवाई अड्डे तक जाने वाला रास्ता होर्डिंग-बैनर से पटा हुआ था। ढोल-नगाड़े की थाप में बस एक ही नारा गूंज रहा था। ’27 साल यूपी बेहाल, अबकी बार शीला सरकार’। दफ्तर में कार्यकर्ताओं के सामने सजे मंच पर सभी बड़े नेता आपसी मनमुटाव भुलाकर एक साथ जमा थे। यूपी कांग्रेस में यही वह सकारात्मक बदलाव है, जिसका वादा चुनाव रणनीतिकार पीके ने 1 मार्च को दिल्ली में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक में किया था। इस दरम्यान प्रशांत किशोर और उनकी टीम ने हर जिले के कांग्रेसी नेताओं के साथ बैठक कर अपनी रिपोर्ट तैयार की। उसी आधार पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने चुनावी गोटियां बिठानी शुरू की। पहले गुलाम नबी आजाद को यूपी कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया। फिर फिल्म अभिनेता राज बब्बर प्रदेश अध्यक्ष बने। उसके बाद श्ट्रंप कार्ड के रूप में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीएम कैंडिडेट घोषित करने जैसे दांव ने विपक्षी पार्टियों में खलबली मचा दी।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व नेहरू.गांधी परिवार के नजदीकी रोहित शुक्ला कहते हैं कि गुजरात के ऊना वाली घटना हो या यूपी में भाजपा नेता दयाशंकर सिंह द्वारा मायावती के खिलाफ की गई गलतबयानी से सामाजिक ताना-बाना बिगाड़ा है। इसी तरह की कुछ बातें हैं जो देश के लिए भाजपा से कांग्रेस को बेहतर बताती है। कांग्रेस समाज के हर वर्ग की पार्टी रही है। आज़ादी की लड़ाई महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद के नेतृत्व में लड़ी गई थी और संविधान में जो बातें हैं, वो अधिकतर 1947 से पहले कांग्रेस के प्रस्ताव में आ चुकी थीं। बहरहाल, कांग्रेस पूरे जोश व जज्बे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है। निश्चित रूप से वह होमर की कृति ओडिसी पर अभिनय जैसी होगी।
राजीव रंजन तिवारी

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