‘पिकनिक नहीं जाऊंगा पापा’

‘पिकनिक नहीं जाऊंगा पापा’

अध्यापक महोदय छात्रों को उस समय भूगोल विषय पढ़ा रहे थे। तभी चपरासी ने हाथ में एक रजिस्टर लिये हुए प्रवेश किया। अध्यापक ने रजिस्टर में लिखी सूचना छात्रों को सुनाते हुए कहा-‘बच्चो। परसों स्कूल की ओर से एक बस पिकनिक के लिये मसूरी जायेगी। जो भी छात्र इच्छुक हों, वे अपना नाम विनय वर्मा जी के पास नोट करा दें। पिकनिक के खर्चे के रूप में छात्र दो सौ रूपये जमा कराने होंगे।
विवेक पिछली बार भी पिकनिक मनाने नहीं जा पाया था। उसने तय किया कि इस बार वह पिकनिक मनाने अवश्य जायेगा। उसने पास बैठे अपने सहपाठी मित्र से पूछा-सुहास तुम चलोगे न इस बार?
क्या तुम चलोगे ? सुहास ने पूछा
हां, हां, इस बार तो मैं अवश्य ही जाऊंगा-विवेक ने खुशी खुशी कहा।
ठीक है, मैं भी शाम को अपने पापा से पूछकर जाने का प्रोग्राम बनाऊंगा। सुहास ने कहा।
शाम को विवेक के पिता जी दफ्तर से लौटकर आये तो वह उनके लिये चाय बना कर ले गया। पिताजी जब चाय पी रहे थे, तभी विवेक बोला पापा, परसों हमारे स्कूल के कुछ छात्र मिलकर पिकनिक मनाने मसूरी जा रहे हैं। हर इच्छुक छात्र को दो सौ रूपये जमा कराने है। मैं भी पिकनिक पर जाऊंगा। आप मुझे दो सौ रूपये दे दीजिए।
पिता सुनकर कुछ देर सोचते रहे। फिर चाय का घूंट भरते हुए बड़े शांत स्वर में बोले-तुम इस बार न जाते तो बेटे अच्छा रहता। तुम तो देख ही रहे हो, तुम्हारी मां का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उनकी देखभाल के लिये भी घर में कोई अवश्य चाहिये। मुझे भी अपने अधिकारी के साथ एक दिन के लिये दौरे पर जाना है।
एक होनहार महिला पहली बार स्कुटी चलाकर..

नहीं पापा, इस बार मैं अवश्य जाऊंगा। मेरे सारे मित्र जा रहे हैं। मैं पिछली बार भी नहीं जा पाया था। दिन भर की ही तो बात है- विवेक ने जिद की।
पिता ने आगे कुछ नहीं कहा। प्याली रखते हुए बस इतना ही कहा- ठीक है, मैं तुम्हें दो सौ रूपये दे देता हूं। मैं राधा की मां पड़ोसन से बोल दूंगा कि एक दिन के लिये तुम्हारी मम्मी का ध्यान रखें।
पिता ने विवेक को दो सौ रूपये दे दिये। वह पिता से पिकनिक जाने की अनुमति पाकर बहुत खुश था।
अगले दिन विवेक खुशी खुशी दो सौ रूपये लेकर विद्यालय पहुंचा।
जब वह पैसे जमा कराने जा रहा था, तभी रास्ते में आते हुए उसे सुहास मिल गया। विवेक ने उससे पूछा सुहास, तुमने पिकनिक जाने के पैसा जमा करा दिये? मैं भी पैसे जमा कराने जा रहा हूं।
नहीं विवेक। मैं इस बार पिकनिक नहीं जा पाऊंगा, सुहास ने कहा।
‘क्यों? विवेक ने पूछा।
प्रेम को न बनाएं मजाक

सुहास ने बताया-हमारे पड़ोस में एक बुजुर्ग रहते हैं। अकेले हैं बेचारे। कल रात उनकी तबियत अचानक खराब हो गई।
मैंने पापा के साथ जाकर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया है। शाम को पापा के साथ उन्हें देखने जाना है। एक असहाय और वृद्ध की सेवा करना हमारा धर्म है। इसलिये मैं तो इस बार पिकनिक मनाने नहीं जा पाऊंगा।
सुहास की बात सुनकर विवेक को अपनी मम्मी की याद हो आई। वह कई दिनों से बीमार है। उनकी देखभाल करने और दवा समय पर देने के लिये भी तो कोई घर पर अवश्य होना चाहिए। फिर पिता जी का हाथ भी इन दिनों अधिक खर्चे के कारण तंग है। नाहक ही मैंने पिताजी को परेशान किया है। पिता के कहने को न मानने में उसे आत्मग्लानि हो रही थी।
अगले दिन विवेक स्कूल जाते समय पिता के पास आया और दो सौ रूपये लौटाते हुए बोला-पापा, इस बार मैं पिकनिक पर नहीं जाऊंगा।
क्यों क्या हुआ बेटे ? विवेक के पिता ने उत्सुक नेत्रों से पूछा।
पापा, पिकनिक से अधिक मम्मी की देखभाल जरूरी है। पिकनिक पर रहकर मेरा मन मम्मी की ओर लगा रहेगा।
पिकनिक पर तो मैं अगली बार भी जा सकता हूं। मैंने आपकी आज्ञा नहीं मानी, मुझे क्षमा कर दीजिये पापा। उसकी आंखों में आंसू तैर रहे थे।
पापा की आंखों भी छलछला आई, उन्होंने विवेक को गोद में भरकर कहा- बेटे तुम बहुत समझदार हो।
– परशुराम संबल

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