पानी जितना पियें, उतना ही अच्छा

पानी जितना पियें, उतना ही अच्छा

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर पंचतत्व हैं जिनसे हमारा शरीर बना है। हमारे जीवन में जल के महत्व से सभी परिचित हैं। जल की संरचना में दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन का योगदान होता है। छह प्रकार के रसों, मधुर, कटु, अम्ल, लवण, कषाय तथा तिक्त के स्वाद का अनुभव हम जल के कारण ही कर पाते हैं। थकावट, सुस्ती, बेहोशी, नींद और कोष्ठ बद्धता को दूर करने मेें जल की भूमिका किसी से भी छिपी नहीं है। स्नान करने पर यह शरीर को निर्मल और तरोताजा बनाता है। यह शरीर के भीतर-बाहर के सभी दोषों को दूर कर देता है। हाइड्रोपैथी अर्थात पानी से उपचार में सोच समझ कर पानी का इस प्रकार प्रयोग किया जाता है कि विभिन्न शरीर के भागों जैसे अमाशय छोटी आंत, बड़ी आंत, मूत्राशय, मलाशय आदि में जमे दोषों को शरीर से निकाल देता है। कोष्ठ बद्धता (कब्ज) जो अनेक रोगों की जननी है, के निराकरण के लिए जल-चिकित्सा सबसे अच्छा उपाय है। संसार की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद में भी जल की महत्ता का वर्णन किया गया है। इसमें जल को औषधि तथा समस्त रोगों का नाशक कहा गया है।हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल है। जल का सबसे प्रमुख कार्य हमारे शरीर को कठोर बनाना है। हर एक बदलते मौसम के अनुरूप शरीर को ढालने के लिए जल के गुणों का विभिन्न प्रकार से लाभ उठाया जा सकता है। नंगे पैर फर्श पर या गीली ओस पर सैर करने से हमारे मस्तिष्क और आंखों में विशेष तरावट पहुंचती है और शरीर को अभूतपूर्व शांति का अहसास होता है। नंगे पैरों गीले पत्थरों पर चलने से शरीर में उपस्थित अनावश्यक गर्मी खत्म हो जाती है। जिन लोगों को पैरों के तलुओं में ‘बर्निंग सैन्सैशन’ की शिकायत हो उनके लिए यह सबसे अच्छा उपाय है। पित्तजनित रोगों के निदान के लिए शीतल जल में चलना लाभकारी हो सकता है। ठंडे जल से हाथ मुंह धोने तथा बर्फबारी के तुरंत बाद बर्फ पर चलने से शरीर को चैतन्य की प्राप्ति होती है, उसमें चुस्ती आ जाती है। इसी प्रकार घुटनों, सिर और गर्दन पर शीतल जल का धारापात भी स्वास्थ्यवर्धन का अचूक साधन है। क्योंकि जल का सबसे बड़ा गुण यही है कि यह संपर्क में आते ही शीघ्रता से उसकी उष्णता सोख लेता है। नंगे पैर चलने का धारापात की अवधि का निर्णय आप स्वयं ही कर सकते हैं।
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स्वस्थ शरीर के लिए भोजन और व्यायाम के साथ-साथ स्नान को भी महत्वपूर्ण माना गया है। दैनिक स्नान का महत्व इसी बात से स्पष्ट है कि भारतीय धर्मग्रन्थों में स्नान को नित्य कर्तव्य माना गया है। गर्मियों में प्रात: व सायं दो बार स्नान करना चाहिए। शीतकाल में एक बार स्नान करना अति-आवश्यक है। जो व्यक्ति शीतकाल में प्रतिदिन नहीं नहाते उन्हें कई रोग आ घेरते हैं। साथ ही उनका स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है। जिस प्रकार पेशाब के द्वारा शरीर से क्लोराइडस तथा नमक आदि निकल जाते हैं, उसी प्रकार शरीर के भीतर के दूषित अम्ल तथा अन्य अपशिष्ट द्रव्य हमारी त्वचा पर बने रोमकूपों से पसीने के रास्ते निकल जाते हैं। प्रतिदिन शरीर को जल से धोया जाना चाहिए अन्यथा पसीने के साथ निकले पदार्थों से रोमकूप बंद हो जाएंगे, इससे पसीना निकलने का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा जिससे शरीर के भीतर के विषैले पदार्थ रक्त में मिल जाएंगे और अनेक प्रकार के रोग आ घेरेंगे।जल की कितनी मात्रा का उपयोग किया जाए यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके शरीर की प्रकृति वैâसी है ठंडी अथवा गर्म। इसके अतिरिक्त आदत, उम्र, समय तथा शारीरिक स्वास्थ्य का स्तर भी प्रयोग किए जाने वाले जल की मात्रा को प्रभावित करता है। गर्मियों में ताजे, ठंडे, निर्मल जल का प्रयोग करना चाहिए जबकि सर्दियों में या शीत ऋतु में सहन करने योग्य गर्म जल का प्रयोग किया जाना चाहिए। जल का दूसरा मुख्य उपयोग है जलपान। रक्त जो हमारे शरीर के अंग के पोषण के लिए उत्तरदायी है, जल के सहयोग के बिना कार्य नहीं कर सकता। भोजन पचाने तथा शरीर द्वारा उसका अवशोषण कराने का काम भी जल के बिना संभव नहीं है। शरीर से समस्त विषैले तत्वों को शरीर से बाहर धकेलने का काम भी जल के द्वारा ही किया जाता है। हमारे फेफड़ों से बाहर निकाली गई सांस के रूप में, मलाशय से मल के रूप में तथा मूत्रेन्द्रिय से मूत्र के रूप में पानी ही बाहर निकलता है। जल ही शरीर के सभी अंगों के विषैले तत्व ढोकर बाहर निकालता है। फेफड़ों, त्वचा, आंतें, अमाशय, गुर्दे तथा हृदय अपना-अपना काम करने के लिए जल की शक्ति पर ही निर्भर रहते हैं।
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जल केवल अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से निकालने का ही कार्य नहीं करता अपितु यह एक अनिवार्य जीवन तत्व भी है। इसके बिना जीवित नहीं रह सकते। शरीर में जल की अत्यधिक कमी से डिहाइड्रेशन हो सकता है और रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए उल्टी या दस्त के जरिए शरीर से अत्यधिक जल निकलने की स्थिति में तुरंत जल की आपूर्ति बढ़ाई जानी चाहिए। भोजन करने से पहले कभी पानी नहीं पीना चाहिए परंतु यदि प्यास ज्यादा हो तो एक-दो घूंट पानी पिया जा सकता है। परंतु अधिक पानी पीने से जठराग्नि (पेट की भूख) शांत हो जाती है। आरोग्य के नियम के अनुसार भोजन के दौरान अधिक पानी पीने या बिल्कुल पानी न पीने से भोजन नहीं पचता। अपनी भूख और हाजमे को तेज करने के लिए खाने के साथ बार-बार घूंट-घूंट पानी पीना चाहिए परंतु ध्यान रहे अधिक पानी नहीं पीना चाहिए। प्यास की अनदेखी करना उचित नहीं होता। इससे अनेक बीमारियां हो सकती हैं। बुखार होने की स्थिति में भी रोगी को प्यास लगने पर पानी अवश्य देना चाहिए। यह बात आधारहीन है कि बुखार में पानी पीने से नुकसान होता है। जुकाम में भी पानी जरूर पीना चाहिए। पथरी, मोटापा, पीलिया, वायु रोग तथा कब्ज में प्रतिदिन दस-बारह लीटर जरूर पानी पीना चाहिए। उपवास में भी पानी जरूर पीना चाहिए अन्यथा उपवास सफल नहीं होता।यों तो जितनी प्यास लगे उतना पानी पीना चाहिए परंतु एक बार में आधा लीटर से ज्यादा पानी नहीं पीना चाहिए। ज्यादा पानी पीने से अफारा और पेट-दर्द हो जाता है। भोजन करते समय पेट का केवल आधा भाग ही भोजन से भरना चाहिए। एक भाग पानी से भरना चाहिए तथा एक भाग वायु संचरण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। कुछ लोग प्यास लगने पर पानी के अतिरिक्त अन्य पेय पदार्थ पीकर प्यास बुझाना पसंद करते हैं। यह प्रकृति के विरुद्ध है। पहले-पहल ऐसे लोग कब्ज के शिकार होते हैं और बाद में विविध रोग उन्हें घेर लेते हैं। पर्याप्त मात्रा में ताजा जल का सेवन करने से पाचन संस्थान सही कार्य करता है, इससे रक्त संचार भी मंद नहीं पड़ता। चेहरे पर स्वाभाविक चमक भी जल के कारण ही होती है। ताजा जल ही हमारा जीवन है इस बात को समझते हुए हमें उचित मात्रा में स्वच्छ तथा ताजा जल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

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