पानी के लिए हाहाकार: जिम्मेदार कौन

पानी के लिए हाहाकार: जिम्मेदार कौन

waterजिस बात की आशंका थी, वही हो रहा है। हमने अपने बुजुर्गों के निर्देश, हिदायत या सलाह की अवहेलना की जिसकी हमें अब सजा भुगतनी पड़ रही है। यह उसी का नतीजा है कि प्राकृतिक संपदा से भरपूर देश आज पानी की एक-एक बंूद को तरस रहा है। पानी के लिए हाहाकार मचा है।
पानी पाने के लिए कई हत्याएं और मौतें हो चुकी हैं। प्यासे लोगों तक टे्रनों से पानी पहुंचाया जा रहा है। पानी पर पुलिस के पहरे लग रहे हैं। कहीं-कहीं कफ्र्यू जैसे हालात हैं। पुलिस की देखरेख में पानी बांटा जा रहा है। लातूर और बुंदेलखंड ही नहीं बल्कि शहरों की भी हालात कम खराब नहीं है।
लातूर और बुंदेलखंड में तो पशुओं तक को पानी नसीब नहीं हो पा रहा। आगे आने वाले समय में क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। इससे भी ज्यादा हास्यास्पद और हैरानी की बात यह है कि इस मानवीय मुसीबत पर राजनीति हो रही है। समस्या का हल कोई नहीं खोजना चाहता, हर राजनीतिक दल एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपना राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं।
यह हालात क्यों पैदा हुए, यह समझना होगा लेकिन इसके साथ ही हमें अतीत की तरफ भी देखना होगा। आज जिस देश में पानी का इतना भीषण संकट दिखाई दे रहा है, यह वही देश है जिसमें पानी को सबसे सस्ता माना था। किसी भी बात पर ताना मार दिया जाता था कि क्या पानी भी मोल मिलता है। इसी देश में पानी को बहाने की भी बात कही जाती थी। मिसाल दी जाती थी कि पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है या बहाया गया। आज उसी देश में पीने के पानी के लाले पड़ रहे हैं तो जाहिर है बहाने को कहां होगा?
कभी इस देश में पानी की कितनी बहुतायत थी, इसका पता हमें पीछे मुड़कर देखने पर चलता है। आज से पचास-पचपन साल पहले बरसात के मौसम में एक-एक महीना लगातार बारिश होती थी। यह बारिश कभी हल्की, कभी तेज, कभी मूसलाधार तो कभी फुहार के रूप में पड़ती रहती रहती थी। कहने का आशय यह है कि सूरज की रोशनी नसीब नहीं होती थी। तब लोग चार महीने के लिए घर में खाने-पीने का सामान सुरक्षित रख लिया करते थे। तब घर से निकलना आसान नहीं होता था लेकिन सभी काम उसी बारिश में किए भी जाते थे।
बारिश में ताल, तलैयां, पोखर, तालाब, नदी, नहर सब उफनते नजर आते थे। गांवों की हालत यह होती थी कि गलियां और गलियारे सब लबालब भरे हुए होते थे। घरों से निकलने के लिए भी जगह नहीं होती थी। यहां यह बताने का आशय यह है कि उस समय आज के शहरों की तरह जगह-जगह कंकरीट के जंगल नहीं थे सो पानी सीधे समुद्र में नहीं जाता था। बारिश का 9० फीसद से अधिक पानी हमारे पास ही रहता था जिससे जल स्तर ऊंचा बना रहता था।
तालाबों का पानी गांव के लोगों और पशुओं के लिए साल भर चलता रहता था। खेतों के आसपास, ऊसर जंगल में पोखरों का पानी धीरे-धीरे जमीन में घुसता रहता था। इससे भूमि का जल का स्तर इतना था कि थोड़ी खुदाई करने पर ही पानी निकल आता था। आज यहां भी कुएं सूख गए हैं। तालाब सिकुड़ गए हैं जिनमें पानी ही नहीं है और पोखर तो खत्म ही हो गए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद से साठ हजार तालाब गायब हो चुके हैं यानी जल स्रोत लगातार कम हो रहे हैं क्योंकि बारिश के पानी को हम संभाल नहीं पा रहे हैं।
आज अगर कोई किसी से पानी मांगता है तो उसे लगता है कि पता नहीं कितनी बड़ी चीज मांग ली है। कुछ लोग तो बाकायदा उसे दुकान की तरफ भेज देते हैं। कहते हैं हमारे घर आज पानी नहीं आया। एक समय वह था जब कोई किसी के दरवाजे पर जाकर पानी मांग लेता था तो उस घर का आदमी या औरत खुद को धन्य समझते थे। तीन-तीन बार लोटे को राख से मांझकर पानी पिलाते थे। कभी-कभी साथ में मटठा और गुड़ भी दे देते थे। उस देश में अब एक घंूट पानी भी मोल मिल रहा है।
फिर ऐसा क्या हुआ कि आज देश पानी की इतनी बड़ी किल्लत से जूझ रहा है। स्वार्थ, लालच, भ्रष्ट्र्राचार और सुविधाभोगी जीवन ने हमारे सामने यह विकराल समस्या खड़ी कर दी है। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, जंगलों की कटाई, शहरों का अंधानुकरण और ऊंच नींच की खाई ने हमें ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां हमारे सामने समस्या से निपटने के न तो बहुत साधन हैं और न ही इच्छा शक्ति।
बढ़ती आबादी भी इसकी एक समस्या में शामिल है। हमें वे दिन भी याद हैं जब शहरी लोग ग्रामीणों के सामने हिकारत और उन्हें ललचाने वाले शब्दों से संबोधित करते थे। वे बताते थे कि शहरों में किस कदर सुविधा है। वहां कुृओं से पानी नहीं खींचना पड़ता। हमारे नलों में पानी अपने आप आ जाता है। वह तालाबों, पोखरों, नदी, नालों को सम्मान की नजर से नहीं देखते थे। वे इसे गंवारों के संसाधन बताया करते थे।
नतीजा यह निकला कि ग्रामीणों ने भी शहरी जीवन शैली को अपनाना शुरू कर दिया। वहां भी कंकरीट के जंगल खड़े हो गए हैं। दबंग लगातार तालाब, कुओं, पोखर की जमीन पर कब्जा करते,उसपर निर्माण करते रहे, उन पर कालोनियां काटते रहे लेकिन सरकार यह सब तमाशा देखती रही। आज हमें याद आ रहा है कि जल ही जीवन है जबकि साढ़े चार सौ साल पहले कवि रहीम ने पानी का महत्त्व पहले ही बता दिया था कहा ‘रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून। इस्लाम में तो पानी को बहुत ही किफायत के साथ खर्च करने की हिदायत दी गई है।
एक बड़ा सवाल यह है कि जब पानी की वास्तव में कमी है तो ये प्राइवेट कंपनियां कहां से पानी ला रही हैं। जिस लातूर और बुंदेलखंड में पानी की बेहद कमी है, वहां भी तो पानी बिक रहा है वो कहां से आ रहा है। आज पानी का कारोबार हजारों करोड़ रुपए है। अगर हम अब भी नहीं संभले तो स्थिति आगे चलकर और भयावह होगी, इसलिए हमें अपने जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। बारिश के पानी को संजोकर रखना होगा।
राजेन्द्र मिश्र राज

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