पाकिस्तान के लिए चिंता और चिंतन का समय : सत्यम सिंह बघेल

पाकिस्तान के लिए चिंता और चिंतन का समय : सत्यम सिंह बघेल

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर 2008 में आतंकी हमलों के जिम्मेदार और जमात उद दावा (जेयूडी) प्रमुख हाफिज सईद को पाकिस्तान सरकार ने नजरबंद कर लिया है।आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और वर्तमान में जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद के मुंबई के 26/11 हमले में हाथ होने की बात सामने आई थी। हमले में छह अमेरिकी नागरिक समेत 166 लोग मारे गये थे। सिर्फ मुंबई ही नहीं भारत और अफगानिस्तान में हुए कई हमलों में साफ तौर पर हाफिज सईद का हाथ रहा लेकिन पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा। 11 सितंबर 2001 में अमेरिका पर हुए हमलों के बाद लश्कर-ए-तैयबा पर दुनिया की नजरें टिकीं और अमेरिका ने लश्कर को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया था। वर्ष 2002 में पाकिस्तानी सरकार ने भी लश्कर पर प्रतिबंध लगा दिया। उसके बाद हाफिज सईद ने लश्कर-ए-तैयबा का नया नाम जमात-उद-दावा रखा, हालांकि हाफिज सईद इस बात से इन्कार करता है कि जमात-उद-दावा का लश्कर से कोई संबंध है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मुंबई आतंकी हमलों के तुरंत बाद दिसंबर 2008 में जमात-उत-दावा को आतंकी संगठन घोषित किया था। मुंबई हमलों के बाद सईद को अंतरराष्ट्रीय दबाव को देखते हुए छह महीने से कम समय तक नजरबंद रखा गया था। लाहौर हाई कोर्ट के आदेश के बाद उसे 2009 में रिहा कर दिया गया था।
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 हाफिज़ सईद ने अफग़ानिस्तान में जिहाद का प्रचार करने और लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए 1985 में जमात-उद-दावा-वल-इरशाद की स्थापना की और लश्कर-ए-तैयबा उसकी शाखा बनी। 1990 के बाद जब सोवियत सैनिक अफगानिस्तान से निकल गए तो हाफिज़ सईद ने अपने मिशन को भारत प्रशासित कश्मीर की तरफ मोड़ दिया। भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी कार्रवाई करने वाला सबसे बड़ा पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तैयबा है, जो अपनी गतिविधि ‘तहरीक ए आजादी ए कश्मीर’ के नाम से चला रहा है और 14 जनवरी को एक प्रेस कांफ्रेंस में खुद सईद ने यह नाम अपनाया था। भारत लगातार पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठनों पर आतंकवाद का आरोप लगाता रहा है और पाकिस्तान से उसे सौंपने और इसके खिलाफ कार्रवाई की मांग करता रहा है, लेकिन पाकिस्तान भारत की इस मांग को सबूत का बहाना बना नकारता रहा है। वहीं, दूसरी तरफ हाफिज सईद पाकिस्तान में भारत के खिलाफ खुलेआम रैलियां कर जहर उगल रहा है। हाफिज सईद ऐसा प्रतिबंधित चरमपंथी है जो आज़ादी से पाकिस्तान में घूम-घूमकर सार्वजानिक तौर पर सभाओं को संबोधित करता रहा है। हाफिज सईद खुलेआम जिहाद के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी करता रहा है। पाकिस्तान हाफिज सईद के जमात-उद-दावा को सामाजिक संगठन करार दे चुका है, कुछ दिन पहले पाकिस्तानी गृह मंत्री चौधरी निसार अली खान ने कहा कि आतंकी संगठनों और कट्टरपंथ के आधार पर बैन संस्थाओं के लिए अलग-अलग कानून होने चाहिए। कट्टरपंथी संगठन कोई टेररिस्ट ग्रुप नहीं हैं। इनमें हाफिज सईद के जमात उद दावा और मौलाना मसूद अजहर के जैश ए मोहम्मद भी शामिल थे। जबकि खुफिया एजेंसियों के मुताबिक पाकिस्तान में कई ऐसे चरमपंथी संगठन हैं, जिनका संबंध आतंकवादी गतिविधियों से है।
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 पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल के मुताबिक, पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर कार्रवाई का कदम अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में उठाया है। अमेरिका के नए ट्रंप प्रशासन ने इस्लामाबाद को स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर उन्होंने जमात-उत-दावा और सईद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो वह प्रतिबंधों के लिए तैयार रहे। ट्रम्प साफ कर चुके हैं कि आतंकवाद फैलाने वाले देशों पर बैन लगाया जाएगा। माना जा रहा है कि पाकिस्तान पर भी अमेरिका बैन लगा सकता है। हालांकि जमात-उद-दावा के चीफ हाफिज की नजरबंदी चौंकाने वाली नहीं है। जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति का ऐलान किया है, पाकिस्तान सरकार को यह दिखाना ही था कि वह आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं के खिलाफ कदम उठाने का ‘निश्चय’ कर चुका है। अमेरिका कहीं पाकिस्तान के नागरिकों को भी अपने यहां आने से न रोक दे, इस संभावना को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया। सईद को पहली बार इस तरह नजरबंद नहीं किया गया। पहले भी उसे घर जैसी जेल से रिहा किया जा चुका है। इसी नरमी के कारण हाफिज भारत के खिलाफ आतंक को बढ़ावा देता रहा है। पाकिस्तान में आतंकियों के आकाओं को पहले तो हाउस अरेस्ट किया जाता है, फिर दबाव पड़ा तो उन्हें जेल भेजा जाएगा। तब जेल को फाइव स्टार दर्जा मिल जाता है। एक अन्य आतंकी सरगना जकी उर रहमान लखवी तो जेल में ही बाप बन गया था। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय दबाव हटता है, पाकिस्तान की अदालत कह देगी कि कोई सबूत नहीं है और रिहा किया जाए, जैसे पहले भी हो चुका है। वैसे कुछ दिन पहले पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने भी नवाज सरकार को आतंकवाद के मुद्दे पर फटकार लगाई है। दरअसल क्वेटा हमले की जांच के लिए पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए एक आयोग ने ‘प्रतिबंधित आतंकी गुटों से नजदीकियों’ को लेकर नवाज शरीफ सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि आतंकी संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, ऐसे संगठनों के खिलाफ आतंकवाद रोधी कानून सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि सच्ची भावना के साथ लागू करना चाहिए। आयोग ने कहा है कि कानून जन प्रतिनिधियों, नौकरशाहों पर भी समान रूप से लागू होता है और उन्हें प्रतिबंधित संगठनों के स्वयंभू सदस्यों से ‘नजदीकी’ नहीं रखनी चाहिए। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, अगर पाकिस्तान अमन और अलग-अलग धर्मों के बीच सदभाव चाहता है तो कानून और संविधान को फिर से स्थापित करना होगा और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को अपने पाखंडी रवैये को बंद करना चाहिए। पाकिस्तान के लिए यह चिंता और चिंतन करने का वक्त है, नही तो सच में दुनिया के देशों से अलग-थलग पड़ सकता है। पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट की फटकार और अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का दबाव, तथा इससे पहले भारत की कूटनीति के तहत कई राष्ट्रों का खुलकर पाकिस्तान का विरोध और भारत का समर्थन करना। आतंकवाद पर पाकिस्तान चौतरफा घिरते जा रहा है, पाकिस्तान को आतंकवादी प्रेम त्याग कर समय रहते सम्भलने और इस तरह के दोहरे रवैये की नीति को छोड़कर, सही दिशा की ओर रुख करना चाहिए वरना धारा के विपरीत चलने का अंजाम बुरा ही होता है। पाकिस्तान ने अगर आगे चलकर हाफिज़ सईद की पहले की तरह स्वतंत्र रूप से गतिविधि जारी रखनी चाही तो पाकिस्तानी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं

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