पहली बार होगा बीजेपी का राष्ट्रपति 

पहली बार होगा बीजेपी का राष्ट्रपति 

राष्ट्रपति चुनाव के लिए जहां एक तरफ पूरा विपक्ष एकजुट होने की लगातार कोशिशें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा हैं। आन्ध्रप्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए बीजेपी को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी है जिससे बीजेपी के उम्मीदवार का राष्ट्रपति बनना तय हो गया है। एआईएडीएमके, टीआरएस, बीजेडी के साथ-साथ जगमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस पर भी सबकी नजरें टिकी हुई थीं कि राष्ट्रपति चुनाव में वे किस तरफ रुख करेंगे।
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करने के बाद राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। इससे पहले टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्रीय समिति) भी कह चुकी है कि राष्ट्रपति चुनाव में वह बीजेपी को अपना समर्थन देगी। ऐसे में रेड्डी की मदद से बीजेपी उम्मीदवार का राष्ट्रपति बनना तय माना जा रहा है। भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पास राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल मतदाताओं के 48.64 प्रतिशत मतदाता हैं। एनडीए को जीत के लिये 1.37 प्रतिशत अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है। जगनमोहन रेड्डी के समर्थन देने से उनकी पार्टी के 1.53 प्रतिशत मत एनडीए प्रत्याशी को मिलेंगे। इससे उसकी जीत तय हो गयी है। इसके अलावा तेलंगाना राष्ट्र समिति के 1.99 प्रतिशत मत भी एनडीए को ही मिलेंगे। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री व एआईडीएमके नेता ओ पन्नीरसेल्वम ने भी प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के बाद अपने गुट का समर्थन एनडीए को देने की घोषणा की है। पन्नीरसेल्वम गुट के पास 10 सांसद व नौ विधायक हैं। पन्नीरसेल्वम के एनडीए को समर्थन देने की घोषणा के बाद पार्टी को एकजुट रखने की कवायद में जुटे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी गुट के पास भी एनडीए को समर्थन देने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है।
8000 करोड़ के घोटाले में लालू की बेटी मीसा के सीए को ईडी ने किया गिरफ्तार..!

बीजेपी सूत्रों के मुताबिक बीजेपी का उम्मीदवार पार्टी के अंदर से ही पूर्णतया बीजेपी विचारधारा वाला राजनेता ही होगा। बीजेपी पार्टी से इतर किसी गैर-राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र से और स्वतंत्र सोच वाली किसी शख्सियत को अपना उम्मीदवार नहीं बनाने वाली है। वह विपक्ष के साथ किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति के नाम पर सर्वसम्मति बनाने के मूड में भी नहीं हैं। भाजपा वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को भी दूसरा कार्यकाल नहीं देगी। देश में पहली बार बीजेपी इतनी ताकतवर हुयी है कि वो अपना राष्ट्रपति बना सके। ऐसे में भाजपा का प्रयास होगा कि पार्टी की विचारधारा का ऐसा नेता राष्ट्रपति बने जो गांधी परिवार के नेताओं की जयन्ती व पुण्यतिथि पर उनकी समाधि पर श्रद्वांजलि देने ना जाये जैसे प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी महात्मा गांधी के अलावा अन्य किसी नेता की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने नहीं जाते हैं। बीजेपी में राष्ट्रपति पद के लिये लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, झारखंड की राज्यपाल द्रोपदी मूर्मु, मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला, केन्द्रीय मंत्री थावरचन्द गहलोत, केन्द्रीय मंत्री नीर्मला सीतारमण, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया,सांसद करिया मुण्डा सहित कई नाम चल रहे हैं मगर राष्ट्रपति वही बनेगा जिसका नाम प्रधानमंत्री मोदी घोषित करेगें।
कांग्रेस पार्टी अपने लगातार गिरते ग्राफ को लेकर काफी चिंतित नजर आ रही है। कांग्रेस मोदी सरकार को घेरने में नाकाम रही है। नोटबंदी का मुद़दा भी भाजपा के पक्ष में चला गया। ऐसे में राष्ट्रपति चुनाव के बहाने कांग्रेस भाजपा के हाथों चुनावों में मात खा चुके दलो को साथ लेकर एक मोर्चा बनाना चाहती है, जिससे वह पुन: ताकतवर बनकर उभरने का प्रयास कर सके। कांग्रेस को पता है कि अगला राष्ट्रपति बीजेपी का बनना तय है। इसलिए वह राष्ट्रपति चुनाव को लेकर ज्यादा गंभीर नजर नहीं आ रही है। मगर उसे असली चिंता 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव कीे लेकर है। वर्तमान हालात में 2019 में कांग्रेस का अपनी मौजूदा स्थिति बरकरार रख पाना भी मुश्किल लग रहा है।
मुनव्वर हत्याकांड का खुलासा : सबसे अजीज दोस्त ने ही किया पूरे परिवार का मर्डर, 6 शव बरामद

राष्ट्रपति चुनाव में हार तय मानकर ही कांग्रेस शरद पवार,गोपालकृष्ण गांधी, शरद यादव,मीराकुमार में से किसी को विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार बनाना चाहती है। मगर चतुर शरद पवार ने चुनाव लडऩे से इंकार कर दिया है। पवार हार के लिये चुनाव लड़ कर अपनी पैठ खराब नहीं करवाना चाहते हैं। शरद पवार को पता है कि वर्तमान में देश में नरेन्द्र मोदी की हवा बरकरार है। ऐसे में वो मोदी का सीधा विरोध कर जनता में अपनी मोदी विरोधी छवि नहीं बनाना चाहते हैं। उन्हे मोदी का खुलकर विरोध करने वाली कांग्रेस, सपा, बसपा, आप, शिवसेना जैसी पार्टियों का हश्र मालूम है। पवार को पता है कि राष्ट्रपति चुनाव लडऩे पर उन्हे कांग्रेस का अहसानमन्द होना पड़ेगा व चुनाव हारने पर वो हासिये पर चले जायेंगें, जबकि उनकी नजर तो 2019 में प्रधानमंत्री पद पर है। गोपालकृष्ण गांधी,शरद यादव व मीरा कुमार का खुद का कोई जनाधार नहीं है। शरद यादव व मीरा कुमार तो चुनाव में हारे हुये नेता हैं। यदि वो राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ते हैं तो कुछ दिन चर्चा में बने रहना ही उनके लिये उपलब्धि होगी।
कांग्रेस जैसी स्थिति कम्यूनिस्ट पार्टियों की भी हो रही है। कभी देश की राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाली वामपंथी पार्टियों के समक्ष आज अपनी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता बचाने का संकट व्याप्त हो रहा है। राष्ट्रपति चुनाव में सभी वामपंथी पार्टियों के पास कुल मिलाकर 2.99 प्रतिशत ही मत हैं। देश में धीरे-धीरे वामपंथी दल बहुत कमजोर होते जा रहें हैं। ममता बनर्जी व नीतीश कुमार मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को दूसरी बार मौका देने की बात कर रहें हैं। मगर प्रणब मुखर्जी को पता है कि उन पर कांग्रेस की छाप लगी हुयी है। ऐसे में मोदी किसी भी परिस्थिति में उनको दूसरा मौका नहीं देगे। विपक्ष के समर्थन पर चुनाव लड़ कर वो अपनी इज्जत खराब नहीं करवाना चाहते हैं। राष्ट्रपति चुनाव हमेशा से ही विपक्ष के लिए टेढ़ी खीर रहा है, लेकिन अब विपक्ष के लिए क्षेत्रीय दलों की वजह से राष्ट्रपति चुनाव जीतना नामुमिकन सा हो गया है। अगर बीजेडी की बात करें तो उसने भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं जबकि ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और सीताराम येचुरी संपर्क कर चुके हैं।
नरेंद्र मोदी की अगुआई वाले एनडीए को राष्ट्रपति चुनाव में वोट शेयर के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष से तकरीबन 15 फीसदी बढ़त हासिल है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर किया गया आकलन तो यही दिख रहा है। एक मोटे आकलन के मुताबिक, एनडीए (23 पार्टियों के सांसद और राज्यों के सदनों में जनप्रतिनिधि) के पास राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित इलेक्टोरल कॉलेज में तकरीबन 48.64 फीसदी वोट हैं। इसके उलट, राज्य या केंद्र में राजनीतिक समीकरणों के आधार पर कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष के साथ जाने वाली 23 राजनीतिक पार्टियों का वोट शेयर 35.47 फीसदी बैठता है। विपक्ष का यह कुनबा न सिर्फ वोट शेयर के मामले में एनडीए से काफी पीछे है, बल्कि केवल बीजेपी के वोट से भी कम है। विपक्ष के 35.47 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले अकेली बीजेपी के पास इस इलेक्टोरल कॉलेज में 40.03 फीसदी वोट हैं।
बहुमत के आंकड़े को पार करने के लिए एनडीए को सिर्फ एक पार्टी के समर्थन की जरूरत होगी। चूंकि बीजेपी केंद्र की सत्ता में है, लिहाजा उसके पास चुनावी नतीजे अपने पक्ष में करने के लिए काफी राजनीतिक गुंजाइश है। हाल में खत्म हुए बजट सत्र के दौरान बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी दलों के साथ बैठक कर जहां राष्ट्रपति चुनाव से पहले एकता का संकेत दिया, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए व्यापक गठबंधन बनाने के लिए विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकत कर रही हैं। ये राजनीति बैठकें इस बात का संकेत हैं कि नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए सरकार और विपक्ष दोनों तरफ से पर्दे के पीछे से काम चल रहा है। हालांकि जीत का पलड़ा बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए के पक्ष में भारी नजर आ रहा है।

Share it
Share it
Share it
Top