पर्यावरण-सब हमारा किया धरा है

पर्यावरण-सब हमारा किया धरा है

सदियों से चला आ रहा ऋतुचक्र गड़बड़ाने लगा है। गरमी का प्रकोप हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। ओजोन की परत में छेद हो गया है। विश्व भर में पानी की भीषण कमी के स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं।
पर्यावरण संरक्षण आज सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं चर्चित मुददा बन गया है, विश्व भर में संस्थाएं इस दिशा में क्रियाशील हो गई हैं। सरकारी स्तर पर भी कदम उठाए जा रहे हैं। जन-जागरण की सर्वाधिक आवश्यकता है। विडम्बना यह है कि एक ओर तो पर्यावरण संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं, दूसरी ओर पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण बदस्तूर बने हुए हैं बल्कि उन में निरन्तर वृद्धि हो रही है। उदाहरणस्वरूप दुपहिया तथा चारपहिया वाहनों से निकलने वाले धुएं से होने वाले प्रदूषण को ही लें। एक ओर सल्फर रहित पैट्रोल तथा सी. एन. जी. के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है, दूसरी ओर वाहनों की संख्या में दिनोंदिन अंधाधुंध वृद्धि हो रही है।
संतोष की बात है कि उच्चतम न्यायालय तथा अधिकांश उच्च न्यायालय पर्यावरण संरक्षण के प्रति काफी संवेदनशील तथा जागरूक हैं। इसी कारण चाहते न चाहते केंद्र सरकार तथा प्रदेश सरकारों को भी इस ओर सक्रियता दिखानी पड़ रही है। फिर भी इस समस्या ने जितना विकराल रूप धारण कर लिया है। उस के अनुपात में समाधान की गति एवं उत्साह नगण्य ही कहे जा सकते हैं।
पर्यावरण को दूषित करने में हमारी नासमझी, कहीं हमारी परम्पराओं, कहीं हमारी आधुनिकता, हमारी वैज्ञानिक प्रगति, हमारे स्वभावगत लोभ, हमारे नेताओं को वोट की भूख, सभी का मिलाजुला योगदान है। झुग्गी-झोंपडिय़ों की बसाहट, यहां-वहां, जहां-तहां गंदी बस्तियों का कुकुरमुत्तों की भांति उगते जाना वर्षों से एक आम बात हो गई है जहां सामान्य नागरिक सुविधाओं का नाम निशान तक नहीं होता। इस बढ़ते प्रदूषण की अनदेखी ही नहीं की जाती बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि इसे ढके-छिपे बढ़ावा दिया जाता है।
पेड़ कटते ही चले जा रहे हैं। कानून है मगर मिलीभगत से उन की धज्जियां उड़ायी जाती हैं। भ्रष्टाचार हमारे खून में घुल चुका है। साधन सम्पन्न अपने को हर कानून से ऊपर मानता है और हर प्रकार से मनमानी करता है। योजनाएं बनाई जाती हैं मगर वे पूरी नहीं होती। गंगा स्वच्छता अभियान पर करोड़ों रूपये खर्च कर दिए गए किंतु गंगाजी में प्रदूषण पहले से भी अधिक बढ़ गया है।
जिंदगी कैसे जिएं
ऐसा लगता है कि थोड़ा बहुत, आधा अधूरा जो कुछ भी हो रहा है उस में किसी स्पष्ट नीति, कार्य-योजना का नितांत अभाव है। शासन, प्रशासन, कानून का डर किसी को भी नहीं रहा। जिस के जो जी में आए, वह कर रहा है। जगह-जगह अतिक्रमण आम बात है। जमीन की भूख ऐसी बढ़ गई है कि लोग निकास के रास्ते तक बंद कर देते हैं। गंदे पानी के नालों पर दुकानें और मकान बन जाते हैं। कन्जरवेंसी लेन तक समेट लेते हैं। रेलवे लाइनों के किनारे मीलों तक झोंपड़ पट्टियां ही नजर आती हैं। नगरों के आसपास के सुंदर टीलों व पहाडिय़ों का कत्लेआम आम बात है। वहां झुग्गी-झोंपडिय़ां बसती जा रही हैं। प्राकृतिक संपदा का जैसे कोई वली वारिस ही नहीं रहा। लाखों वर्ष पुरानी चटटानों पर धड़ल्ले से विज्ञापनबाजी की जा रही है। शहरों के अंदर डेरियां चल रही हैं। सब्जी मंडियां कीचड़, कचरे व सड़ांध का पर्याय बन कर रह गई हैं। न कोई देखने वाला है न सुनने वाला एवरेस्ट शिखर तक पर, पर्वतारोही दल दलों कचरा छोड़ आते हैं।
जगह जगह लाउडस्पीकर बजते रहते हैं। अब तो जागरण, कथा, कीर्तन भी लाउडस्पीकरों के बिना नहीं होते। मंदिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों में लाउडस्पीकर लग गए हैं। पढऩे वाले बच्चों, बीमारों, वृद्धों की असुविधा का किसी को ध्यान नहीं, मोटरसाइकिलों, स्कूटरों से एक्जहास्ट हटा कर भयंकर शोर करते हुए सड़कों पर दौड़ाया जाता है। गाडिय़ों में लगे प्रेशर हार्न बजाने वालों के कानों को बहरा करते चलते हैं। साइलेंस जोन अभी भी हैं किंतु उपेक्षित। पशु पक्षी तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। गिद्धों की अचानक घटती संख्या आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है। नदियों और समुद्रों में बढ़ते प्रदूषण के कारण जल जन्तुओं का निरन्तर हृस हो रहा है।
नीम आधारित उत्पाद
करोड़ों वर्षो में प्रकृति ने जो सृजन किया था, वह हम कुछ वर्षों में मिटाने पर तुल गए हैं। विज्ञान और प्रकृति में बजाय सामंजस्य के एक होड़ लगी है।
प्लास्टिक की थैलियों ने तो कहर ही ढा रखा है। पशु उन्हें निगलते हैं और बिन आई मौत मरते हैं। दूषित पर्यावरण का कुप्रभाव मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। नए-नए रोग अस्तित्व में आ रहे हैं। मनुष्य आत्म-संतुलन, धैर्य व सहिष्णुता खो कर हिंसक होता जा रहा है। जरा-जरा सी बात पर किसी की जान ले लेना आम बात होती जा रही है।
यह तो थी पर्यावरण की एक छोटी सी बानगी। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है किंतु अधिक विस्तार न आवश्यक है न ही व्यवहारिक। अब समय कहने सुनने का नहीं, वास्तव में कुछ करने का है। हर व्यक्ति इस संदर्भ में अपनी प्राथमिकताएं खुद ही निश्चित कर ले और उन्हें कार्यरूप में परिणित करने में जुट जाए। समस्याएं हमारे सामने हैं। अपनी परिधि के अंदर, अपनी क्षमता के अनुरूप, अपनी सामथ्र्य के अनुसार हम में से हर एक को अपना-अपना कर्तव्य स्वयं निश्चित करना है और उसे अमल में लाना है।
– ओमप्रकाश बजाज

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