पर्यावरण पर मंडराती काली छाया..एक चौथाई जमीन हो चुकी है बंजर..!

पर्यावरण पर मंडराती काली छाया..एक चौथाई जमीन हो चुकी है बंजर..!

 चिंता का विषय है कि वर्तमान में समस्त विश्व के पर्यावरण पर प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र विदोहन, औद्योगिक क्रांति, दु्रतगामी परिवहन साधनों, बढ़ते शहरीकरण व मशीनीकरण के कारण संकट की काली छाया मंडरा रही है। विश्व में बढ़ते पर्यावरण संकट का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व की लगभग एक चौथाई जमीन बंजर हो चुकी है और ऐसा अनुमान है कि आगामी कुछ वर्षों में सूखा प्रभावित क्षेत्र की लगभग 70 प्रतिशत जमीन बंजर हो जाएगी जिससे विश्व के सौ देशों की एक अरब से अधिक जनसंख्या के जमीन अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा। निस्संदेह पर्यावरण असंतुलन की वजह से मानव, पशु पक्षी और वनस्पति के जीवन पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।
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गौरतलब है कि मानव ने अपना जीवन सुविधाजनक, आरामदेह एवं विलासपूर्ण बनाने के लिए पर्यावरण को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है। पर्यावरण पर बढ़ते संकट के कारण ही समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। कृषि, उद्योग, घरेलू एवं अन्य क्षेत्रों में ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के कारण प्राणघातक गैसें वायुमंडल को विषाक्त कर रही हैं, वायमुंडल का औसत तापमान बढ़ रहा है जिससे पर्यावरण में असंतुलन बढ़ता जा रहा है। साथ ही औद्योगिक इकाइयों की धुआं निकालती चिमनियां, जहरीले अवशिष्ट पदार्थ भी पर्यावरण को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
अफसोस की बात है कि पर्यावरण पर मंडराते संकट के बादलों के निवारण के लिए अनेक सम्मेलन, कार्यक्रम एवं नीतियों का आयोजन किया गया लेकिन इन सबके बावजूद भी विश्व में पर्यावरण प्रदूषण की मात्रा घटने की अपेक्षा उत्तरोतर बढ़ती जा रही है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि इस वैश्विक व ज्वलंत समस्या के समाधान के लिए विश्व के सभी देशों को आपसी मतभेद, मनमुटाव व संघर्ष को दर किनार करते हुए शीघ्र प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
ताकि घर परिवार वाले और बाहर वाले भी आपकी प्रशंसा करते न थकें..!

गौरतलब है कि पर्यावरण प्रदूषण जैसी घातक व विकराल समस्या का जनक स्वयं मानव है अत: इसके निवारण हेतु विश्व के समस्त मानवों को सामूहिक रूप से, सहयोगात्मक दृष्टिकोण को अपनाते हुए समन्वित ढंग से सतत सार्थक प्रयास करने होंगे। तभी संपूर्ण विश्व का भविष्य सुरक्षित एवं उज्जवल होगा।
मानव प्रकृति के साथ मित्रवत् एवं संवदेनापूर्ण व्यवहार करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन पर रोक लगाए, विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की बलि न चढ़ाए तथा पर्यावरण संरक्षण के यज्ञ में यथाशक्ति अपनी आहुति दे, तभी पर्यावरण संतुलन एवं शुद्ध पर्यावरण की कल्पना को मूर्त रूप देना संभव है।
अब समय आ गया है कि हम अपनी मूर्खता से बाहर निकलें और निश्चित करें कि तीव्र आर्थिक विकास चाहिए अथवा पर्यावरण सुरक्षा। निस्संदेह रूप से विश्व के विकसित एवं विकासशील देश आर्थिक विकास और नई तकनीकी की पर्यावरण समस्याओं के परिपेक्ष्य में देखकर ही पर्यावरण पर मंडराते संकट को कम कर सकते हैं।
– कपिल कुमार नेमा

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