पत्नी पीडि़तों के लिए भी कानून बनें!

पत्नी पीडि़तों के लिए भी कानून बनें!

महिलाओं के लिये घरेलू हिंसा रोकथाम कानून आ जानेे के बाद अब इस बात की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है कि पत्नी पीडि़तों के लिये भी इस तरह का कानून बना कर उसे अमल में लाया जाये।
पत्नी पीडि़तों के लिये कोई कानून होना इसलिये भी जरूरी है क्योंकि पतियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने के लिये वर्तमान कानून में पतियों को अपना पक्ष रखने का कहीं कोई प्रावधान नहीं है। दूसरी बात यह है कि जिस तादाद में पतियों के खिलाफ शिकायतें बढ़ रही है उसी तादाद में पत्नियों के खिलाफ भी शिकायतें आ रही हैं लेकिन कानून के अभाव में पतियों की सुनवाई कहीं नहीं हो पा रही है।
वर्तमान समय में जब पतियों के खिलाफ पत्नियों को दैहिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताडि़त करने के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं, वहीं पतियों के द्वारा पत्नियों के खिलाफ उन्हें धमकाने और झूठे मुकदमों में फंसाने की शिकायतें सालाना 16 फीसदी की दर से बढ़ रही हैं। बहुओं के खिलाफ सासों की शिकायतों पर भी जांचकर्ता कोई कानूनी प्रावधान नहीं होने की वजह से कुछ नहीं कर पा रहे हैं। सास, बहू और पति के बीच उत्पन्न विवादों में कौन सही है और कौन गलत, इसका फैसला करने में भी जांचकर्ताओं के पसीने छूट रहे हैं।
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वर्तमान समय में महिलाओं को जो कानूनी अधिकार और संरक्षण प्रदान किया गया है उसे यदि पर्याप्त मान लिया जाये तो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार चाहे वे किसी भी श्रेणी के हो, उनकी संख्या काफी कम हो जानी चाहिये थी लेकिन ऐसा कुछ अब तक नजर नहीं आ रहा है।
इसका मतलब यह है कि महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों के प्रति पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गई हैं या फिर कानून में अब भी कहीं कोई कमी रह गई है। यदि ऐसा कुछ भी नहीं है तो तीसरी बात सही है अर्थात महिलाओं को दिये गये कानूनी अधिकार और सरंक्षणों का खुद महिलाओं के द्वारा ही दुरूपयोग किया जा रहा है।
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महिला उत्पीडऩ सम्बन्धी मामलों की जांच करने वाले अधिकांश जांचकर्ताओं का मानना है कि उनके पास आने वाले अधिकांश दहेज संबंधी प्रकरण झूठे होते हैं। यदि यह बात सही है तो यह भी एक गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि कानून का दुरूपयोग किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिये और उसका दुरूपयोग यदि कोई करता है तो उसे इतनी सजा मिलनी चाहिये जितना उस अपराध के अपराधी के लिये निर्धारित है।
अत: महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की रोकथाम के लिये बनाये गये कानूनों की सार्थकता तभी संभव है जब आरोपी पक्ष पति और सास को भी अपनी बात रखने का बराबर मौका दिया जाये।
-रमेन दासगुप्ता ‘शुभ्रो’

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