पति परमेश्वर या कामेश्वर….!

पति परमेश्वर या कामेश्वर….!

ईश्वर ने जब सर्वप्रथम मनुष्य ‘आदम’ को बनाया तो उसे लगा कि अभी कुछ कमी है। अकेला आदम कैसे जीवित रहेगा। उसने एक स्त्री को बनाया जिसे ‘हव्वा’ का नाम दिया। उसी ‘आदम-हव्वा से इस संसार का निर्माण हुआ। जैसा पवित्र बंधन उन दोनों के बीच था, वैसा ही बंधन आज भी पुरूष और स्त्री में प्रचलित है जिसे विवाह बंधन कहा जाता है।
प्राचीन समय में इस अटूट बंधन का आमरण पालन किया जाता था किन्तु आज की पीढ़ी ने इस बंधन की धज्जियां उड़ा दी हैं। आए दिन पत्र-पत्रिकाओं में पढऩे को मिलता है कि ‘मैं दो बच्चों का बाप हूं लेकिन मेरे संबंध अनजाने में किसी और स्त्री से भी बन गए है मैं भी उसे चाहने लगा हूं किन्तु समाज के डर से कुछ भी नहीं कर सकता, उपाय बताएं क. ख. ग.।’
मैं कहता हूं कि संबंध अनजाने में बन कैसे जाते हैं। दो बच्चों का पिता इतना अनजान तो नहीं हो सकता कि उसे अच्छे बुरे की ही पहचान न हो और अगर वह सब अनजाने में था तो फिर आप उसे चाहने कैसे लग गए। ऐसी घटनाएं आए दिन घटती हैं और हर रोज कोई न कोई पति अपनी अर्धांगिनी, जो उसे अपना पति परमेश्वर मानती है, के साथ विश्वासघात करता है। उस वक्त आपकी वो कसमें वादे कहां गए जो आपने ईश्वर को साक्षी मानकर किए थे।
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स्त्री क्या महज मनोरंजन का साधन है कि जब जी भर गया तो उसे छोड़कर किसी और को अपना लिया। क्या उसकी कोई उमंगें नहीं? उसकी कोई इच्छाएं नहीं? अगर है तो फिर उनके साथ खिलवाड़ क्यों? क्यों पति द्वारा उसे वो दर्जा नहीं दिया जाता जो स्वयं वो उससे चाहता है?
हमारी संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है और हमारी संस्कृति कभी भी हमें इन अवैध संबंधों की इजाजत नहीं होती। फिर क्यों हम अपनी सभ्य संस्कृति को छोड़कर असभ्य संस्कृति की ओर दौड़ते हैं? हमारे ग्रन्थों में पति को परमेश्वर कहा है किन्तु आज का पति ‘कामेश्वर बनता जा रहा है।
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वह विषय-वासना में इतना अंधा हो चुका है कि उसे अच्छे बुरे का कुछ ध्यान नहीं। वह न केवल अपने परिवार को धोखा दे रहा है अपितु इस समाज के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है।
हमें अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ऐसी मनोवृत्ति को त्यागना होगा ताकि सम्पूर्ण भारत ही नहीं विश्व में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हमारी संस्कृति पर गर्व कर सके।– जितेन्द्र अन्शु

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