पति पत्नी और वो

पति पत्नी और वो

pati patni aur woभारतीय समाज की मान्यता के अनुसार विवाह को एक अटूट व पवित्र बंधन के रूप में माना जाता है। यह बंधन आत्मिक होता है जो दो आत्माओं को एक करके जीवन के चरमसुख को पाने की ओर सदैव अग्रसित रहता है किंतु आज यह स्थिति होती जा रही है कि पवित्र वैवाहिक रिश्ता भी अन्य रिश्तों की भांति टूटकर अलग होने लगा है।
विवाह के रिश्ते में चटकाव आने के अनेक कारण हो सकते हैं। पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति अलगाव, चाहे मानसिक रूप से हो या शारीरिक रूप से, होता परिणाम भयंकर ही है। अनेक सामाजिक संगठनों ने इस विषय पर अनेक शोध व सर्वेक्षणों के माध्यम से इस तथ्य को प्रस्तुत किया है कि विवाह टूटने के पीछे अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण पति या पत्नी का विवाहेत्तर संबंध ही होता है अर्थात् पति और पत्नी के मध्य में तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप। पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे व्यक्ति का आगमन सचमुच इस विवाह के पवित्रतम रिश्ते को अपवित्र बना डालता है। विवाहित जीवन के अपने कुछ सिद्धांत होते हैं जिनको न मानने वाले व्यक्ति इस पवित्रतम रिश्ते को कलंकित कर डालते हैं।
सोच-विचार किये बिना किसी भी रिश्ते को आगे बढ़ाना बुद्धिमानी नहीं होती। आरंभ में भले ही वह आनंद देने वाला हो सकता है परंतु बाद में वह विषधर नाग से भी अधिक भयंकर व विषैला साबित होता है क्योंकि विषधर का डसा व्यक्ति एक ही बार में मर जाता है जबकि अनैतिक रिश्ता जीवन भर घुट-घुटकर जीने पर मजबूर कर देता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किसी के जीवन में तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप तभी संभव हो सकता है जब पति-पत्नी के बीच परस्पर मधुर संबंध न हों। एक-दूसरे की भावनाओं को जानकर उस पर अमल करने के हर संभव प्रयास से ही पति-पत्नी के बीच मधुर संबंध स्थापित रखा जा सकता है। पति को पत्नी की तथा पत्नी को पति की भावनाओं व इच्छाओं का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। आज के समय में नब्बे प्रतिशत पति-पत्नियों का विलगाव परस्पर उपेक्षा के कारणों से ही होता है। हर महिला व पुरुष की यही इच्छा होती है कि उसका पति या पत्नी उसकी भावनाओं को जाने-समझे और उनकी कद्र करे। दोनों को ही परस्पर समय निकालकर बातचीत के माध्यम से अपनी उन भावनाओं के प्रति सजग रहकर हमेशा एक दूसरे के अनुरूप करने के लिए समय निकालना चाहिए। जो पति-पत्नी अधिकांशत: साथ रहते हैं, उनके अपने साथी को धोखा देने या विवाहेत्तर संबंध बनने के कम चांस होते हैं। जितने वक्त तक साथ-साथ रहें, उसे महत्त्वपूर्ण बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। अधिकांश समय दोस्तों के बीच बेमतलब बिताने की अपेक्षा अपने घर में बिताने से दांपत्य संबंध दृढ़ होते हैं। अपने कार्यालय के सहकर्मियों के साथ आत्मीयता बनाकर रखने में कोई हर्ज नहीं होता क्योंकि सहकर्मी एक मानव है और मानव को मानवीय संबंध बनाकर रखना ही चाहिए परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि ‘हमबिस्तर’ होकर उस मानवीय रिश्ते को कलंकित कर दिया जाय। ‘सेक्सÓ का दायरा सिर्फ पति-पत्नी के बीच तक ही सीमित रखकर दांपत्य के सुख को प्राप्त किया जा सकता है।
संतुष्टि या संतोष सबसे बड़ा धन है। जितना है, जिस अवस्था में है, वही मेरा है, की भावना को रखकर उससे ही संतोष करने की भावना का विकास अपने अंदर करते रहना चाहिए। ‘सेक्स’ जीवन के लिए आवश्यक अवश्य है परन्तु वही सब कुछ नहीं है। पति को पत्नी की सेक्सगत कमजोरी या पत्नी को पति की सेक्सगत कमजोरियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि आपसी सूझबूझ व तालमेल से उस समस्या का हल ढूंढऩा चाहिए। ऐसा न करके विवाहेत्तर संबंध स्थापित कर लेना जीवन की सबसे बड़ी भूल होती है।
दूसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है, किंतु उस आकर्षण से जुड़े अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित कर सही दिशा में ले जाना ही आपके लिए हितकर है। किराये के खूबसूरत मकान से कहीं अच्छी अपनी झोंपड़ी ही होती है।
अपना पति या अपनी पत्नी भले ही खूबसूरत न हो परंतु वह अपना ही होता है। जीवन साथी का अर्थ है सुख-दुख में साथ निभाते हुए जीवन भर सुखमय समय को व्यतीत करना। इन भावनाओं को साथ लेकर चलते रहने पर ही अपने दांपत्य की डोर को मजबूत बनाकर रखा जा सकता है।
पूनम दिनकर

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