पड़ोसी मूल्क भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते पर सवाल…प्यार और तकरार एक साथ कैसे?

पड़ोसी मूल्क भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते पर सवाल…प्यार और तकरार एक साथ कैसे?

Rajeev Ranjan Tiwaआजकल भारत और पाकिस्तान के बीच केमेस्ट्री कुछ इसी तरह की दिख रही है। लगता है कि दोनों देश प्यार और तकरार साथ-साथ करने के मूड में हैं। अब सवाल यह उठता है क्या यह संभव है? जो हो, पर भारत सरकार तो यही कह रही है कि पाकिस्तान से उसके रिश्ते बेहतर हुए हैं। पठानकोट हमले की जांच को पाकिस्तान सरकार भले ही बेहद सुस्त गति से आगे बढ़ा रही हो, लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अभी नाउम्मीद नहीं हैं। उनका कहना है कि भारत की जांच टीम के वहां जाने का रास्ता भी अभी बंद नहीं हुआ है। विदेश मंत्री यह भी मानती हैं कि राजग सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल में पड़ोसी देश के साथ रिश्ते पहले से मजबूत हुए हैं। खास तौर पर जिस तरह से दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच एक सामंजस्य और रिश्तों में सहजता बनी है, वह काफी उम्मीद जगाती है। भारत ने पाक के साथ रिश्ते को तीन स्तरों पर आगे बढ़ाने का फैसला किया था। उसी आधार पर आगे बढ़ा जा रहा है। भारत पाक के साथ हर मुद्दे को आपसी बातचीत के साथ तय करना चाहता है। साथ ही दोनों देशों के बीच हर मुद्दे पर सीधे बातचीत होनी चाहिए। भारत पाक को लेकर आगे बढ़ाना चाहता है। यह बात बैंकाक में विदेश सचिव स्तरीय बातचीत से लेकर पीएम मोदी के अचानक लाहौर पहुंचने से भी साफ है। स्वराज की मानें तो भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते काफी जटिल हैं। उनके कुछ समय में या कुछ बैठकों में हल होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि इस बीच दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच काफी सहज रिश्ते बने हैं। मोदी का अचानक शरीफ के यहां पहुंचना या फिर दिल का आपरेशन करने से पहले शरीफ का पीएम को फोन करना उनके बीच बन रहे केमिस्ट्री की कहानी कहते हैं। मुद्दों को सुलझाने के लिए कई बार रिश्तों की आवश्यकता होती है। ये तो रही भारत की बात। अब जरा पाकिस्तानी गतिविधियों पर भी नजर डालें। आए दिन सरहद पर सीज फायर का उल्लंघन और आतंकी हमले हो रहे हैं। अमूमन हर रोज पाकिस्तानी घुसपैठी कश्मीर में खून-खराबा करते हैं। इस स्थिति में भारतीय विदेश मंत्री की बातों पर कितना भरोसा किया जाए।
विदेश मंत्री के तौर पर माह जनवरी में अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में सुषमा स्वराज ने कहा था कि उनकी प्राथमिकता एक सक्रिय, मजबूत व संवदेनशील विदेश नीति देने की है। पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कूटनीति की जो नींव रखी गई है उसको कई विशेषज्ञ लीक से हटा हुआ लेकिन काफी उत्साहजनक मान रहे हैं। पहले दो साल में आधार तैयार हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को लेकर राजनीतिक विरोधी सवाल भले ही उठाते रहे होंए लेकिन इससे विरोधी भी इन्कार नहीं कर सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को देखने का नजरिया बदला है। पिछले दो साल में यह स्पष्ट हो गया है कि भारत दुनिया में तेजी से हो रहे कूटनीतिक बदलावों का सिर्फ मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। इसकी पहली मिसाल तब मिली जब विदेश मंत्रालय ने लुक ईस्ट नीति की जगह एक्ट ईस्ट को अपनाने का ऐलान किया। भारत का यह ऐलान इसलिए अहम है क्योंकि पूर्वी एशिया के समुद्री क्षेत्र में चीन का दबदबा बढ़ता जा रहा है और उस क्षेत्र के तमाम देश भारत की तरफ उम्मीद से देख रहे हैं। ऐसे में हनोई वियतनाम की यात्रा के दौरान स्वराज ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इस क्षेत्र की सुरक्षा व शांति भारत के हितों से जुड़ी है। सक्रिय कूटनीति का दूसरा बड़ा उदाहरण स्वराज की इजरायल यात्रा थी। पिछले वर्ष राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी इजरायल की यात्रा की थी। जानकार मानते हैं कि भारत अब इजरायल के साथ अपने रिश्ते को लेकर कुछ भी छिपाना नहीं चाहता। भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह दिखाया है कि वह संवेदनशीलता बनाए रखते हुए दुनिया के सामने एक मजबूत कूटनीति का उदाहरण पेश कर सकता है। यमन में फंसे भारतीयों को बाहर निकालने के ऑपरेशन में स्वराज की कूटनीति बहुत काम आई। इसके लिए एक तरफ जहां सऊदी अरब को कुछ घंटे के लिए हमला रोकने के लिए मनाया गया वही यमन प्रशासन को जगह-जगह फंसे भारतीयों को एक जगह एकत्रित करने के लिए तैयार किया गया। कुछ ही दिनों में 5000 भारतीयों को वहां से निकाला गया। पाकिस्तान से गीता को भारत लाकर उसे पुर्नवास का काम स्वराज की देखरेख में चल रहा है। उधर, भारत, अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए हालांकि ज्यादा चेताने वाली सूचना यह है कि पाकिस्तान ने नई पीढ़ी की परमाणु क्षमता वाली रणनीतिक मिसाइलें विकसित कर ली हैं। विशेषज्ञों की माने तो इस घटनाक्रम ने भारतीय उपमहाद्वीप को दुनिया की सबसे खतरनाक रिहाइशी जगह बना डाला है। पाकिस्तान ने इन रणनीतिक परमाणु हथियारों को कथित रूप से अपनी आर्टिलरी में शामिल कर लिया है ताकि जंग की किसी हालत में वह आगे बढ़ती भारतीय सेना की टुकड़ी को नेस्तोनाबूद कर सके। इससे पहले भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही रणनीतिक परमाणु हथियारों का एक बड़ा जखीरा विकसित किया था, जो महानगरों की सामान्य आबादी को हमले कर आतंकित करने या सरहद से कुछ दूरी पर अहम सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाने के काम आने वाले हैं। मसलन, अग्नि-5 पांच हजार किलोमीटर दूर के लक्ष्य को भेद सकती है और इसे दक्षिणवर्ती चेन्नै से इस्लामाबाद या चीन पर दागा जा सकता है। पाकिस्तान ने भी गौरी और शाहीन नाम की मिसाइलें विकसित की हैं, जो भारत में कहीं भी हमला कर सकती हैं। इन मिसाइलों की रेंज को अब अंडमान और निकोबार द्वीपों तक विस्तारित कर दिया गया है, जहां भारतीय सेना के तीनों अंगों का अड्डा है। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि परमाणु हथियार को जंग के मैदान में रणनीतिक बढ़त पाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि दुश्मन की बढ़ती टुकडिय़ों को थामा जा सके। लाल और सफेद रंग की इस परमाणु क्षमता वाली मिसाइल का नाम नस्र है। यह एक पतले से रॉकेट जैसी है, यह 60 किलोमीटर की यात्रा कर सकती है। पिछले साल पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस की परेड के दौरान इसे प्रदर्शित किया गया था। इसे एक मल्टीबैरल प्रक्षेपण वाहन में रखा गया था, जो एक साथ ऐसी चार मिसाइलें दागने में सक्षम है।
परमाणु क्षमता वाली मिसाइल अपने विस्फोट की ताकत से जान नहीं लेती या शत्रु की टुकडिय़ों को निष्क्रिय नहीं करती। इससे जो गर्मी निकलती है और उसके बाद जो विकिरण होते हैं, वह अपंग बना देने वाली बीमारियां पैदा कर सकते हैं और हमले के मिनटों के भीतर भारी संख्या में टुकडिय़ों को मौत के घाट उतार सकते हैं। पाकिस्तान में इस पर पिछले पांच साल से काम चल रहा था, लेकिन भारतीय आक्रमण को नाकाम करने के लिए इसकी सामरिक तैनाती की पहली घोषणा विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी ने पिछले साल अक्तूबर में ओबामा के साथ नवाज शरीफ की द्विपक्षीय बैठक से ठीक पहले की थी। कई महीनों से यह अटकल लगाई जा रही थी कि पाकिस्तान ने अमेरिका से वैसी ही परमाणु संधि करने का अनुरोध किया था, जैसी अमेरिका ने भारत के साथ 2005 में की थी। इसके जवाब में अमेरिका ने पलट कर पाकिस्तान को उसके परमाणु कार्यक्रम को समेटने को बाध्य किया, जो पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं को सीमित कर सकता था। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखने वाली नेशनल कमांड अथॉरिटी एनसीए के परामर्शदाता तथा अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल खालिद अहमद किदवई कहते हैं कि ऐसे किसी हमले का जवाब देने के लिए पाकिस्तान को ऐसे सामरिक परमाणु हथियार विकसित करने पड़े हैं, जो अचानक भारत की ओर से हुए किसी हमले की सूरत में उसकी टुकडिय़ों को सरहद पर ही नाकाम कर दें। बहरहाल, एक तरफ पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते को लेकर भारत आश्वस्त है और पाकिस्तान है कि भारत के खिलाफ लगातार अपनी सामरिक ताकतों को बढ़ाए जा रहा है। इस स्थिति को क्या कहेंगे। आखिर यह प्यार और तकरार साथ-साथ कब तक चलेगा? देखना है कि पाकिस्तान से मधुर रिश्ते की उम्मीद पाले भारत की अगली कार्रवाई क्या होती है?
राजीव रंजन तिवारी

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