न अति कट्टरता, न अति उदारता

न अति कट्टरता, न अति उदारता

इस नश्वर संसार में कुछ भी चिरस्थायी नहीं है। कल जो था, आज नहीं है। जो कुछ आज है कल उसमें से बहुत कुछ नहीं रहेगा। कल जो नये धर्म प्रकाश में आये थे, अल्पसंख्यक थे, वे बहुसंख्यकता की ओर कदम बढ़ा रहे है। जो कल बहुसंख्यक थे वे आज अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं।
एक को दूसरे से हीन समझना या श्रेष्ठ समझना हमारे मन के भीतर छुपी वह नकारात्मक अहंकार प्रवृत्ति है जो हमें कभी भी सच्चा ईमानदार नहीं रहने देती। यही हमें मनमाना करने को उकसाती है। यहीं से सत्ता का जन्म होता है। यही से विवादों का जन्म होता है। सत्ता ही राज्य और धर्म के झगड़ों का कारण है। आदमी आदमी में भेद यहीं से शुरू होता है।
हमारे देश में शिक्षा काला धंधा बन गई है
निहित स्वार्थी तत्वों के स्वार्थ के कारण समय के साथ साथ हर समाज में कुछ बुराइयां प्रवेश कर गई है। समाज चिंतकों को बुद्धिवेत्ताओं द्वारा तार्किक बहस कर समय समय पर इनको दूर करते रहने के लिये हर समाज में इस परिवर्तनों के लिये आवश्यक उदारता अपनाने की गुंजाइश बचाये रखने की जरूरत है। समय रहते इनका सुधार न किया गया तो बाद में ये नासूर बन पूरी मानव जाति के लिये विनाशक सिद्ध हो सकते है।
जिंदगी कैसे जिएं
हम सब जानते हैं कि जैसे अति कट्टरता ने इस्लाम को बदनाम किया है, वैसे ही अति उदारता ने हिंदुत्व को चोट पहुंचाई है। जीवन के लिये मध्यमार्गी होने पर विवादों में बचने की संभावना बनी रहती है। धार्मिक दृष्टिकोण में भी मध्यमार्ग का रास्ता खुले तो अनेक समस्याओं का सामाधान स्वत: निकल आयेगा।
– कौशल्या अग्रवाल

Share it
Share it
Share it
Top