नोट बन्दी के समर्थक भी बैंको की व्यवस्थाओं को लेकर परेशान है…!

नोट बन्दी के समर्थक भी बैंको की व्यवस्थाओं को लेकर परेशान है…!

new-note_1478622284प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर की रात देश में 500 व 1000 के नोटो के प्रचलन को तत्काल प्रभाव से बन्द करने की घोषणा की। उनकी घोषणा का जनता ने दिल खोलकर स्वागत किया। लोगों ने प्रधानमंत्री के फैसले को देश में काले धन की रोकथाम की दिशा में एक मील का पत्थर माना। सरकार विरोधी दलों के नेताओं ने जरूर शुरू में सरकार के इस फैसले का विरोध किया मगर जनता का मूड भांपकर उनके सुर भी धीरे-धीरे बदलने लगे। कांग्रेस जहां शुरू में इसे प्रधानमंत्री का तुगलकी फैसला बता रही थी वहीं बाद में देश की जनता से प्रधानमंत्री के फैसले को मिल रहे अथाह समर्थन को देखकर इसे सही फैसला तो बताने लगे मगर साथ ही जनता को नोट बदलने में बैंको में हो रही परेशानी को मुद्दा बनाकर विरोध करना शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही पूरे देश में बहस जारी है। मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा कि इससे कालेधन पर अंकुश लगेगा और आतंकवादियों को मिलने वाले पैसे पर भी लगाम लगेगी। जहां कई विपक्षी पार्टियां नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना कर रही हैं तो कुछ पार्टियां नोटबंदी का समर्थन करने के बावजूद उसके बाद के हालात से निपटने की सरकार की तैयारी को लेकर हमलावर मुद्रा में हैं। नोटबंदी को लेकर नेता और आम जनता के साथ आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ भी बंटे नजर आ रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने नोटबंदी को कालेधन पर लगाम लगाने में बेअसर बताया तो भारतीय रिजर्व बैंक के चार पूर्व गवर्नरों सी रंगराजन, बिमल जालान, वाई वी रेड्डी व डी सुब्बाराव ने विमुद्रीकरण पर मोदी सरकार के कदम का समर्थन करते हुए इसे देश में बड़े सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला एक ऐतिहासिक कदम बताया है। इन पूर्व गवर्नरों के विचार इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इन चारों को आर.बी.आई. गवर्नर के तौर पर देश में अर्थव्यवस्था के चार अलग अलग हालातों के अनुभव है। सी. रंगराजन 1992 से शुरू हुई उदारीकरण की प्रक्रिया, बिमल जालान 1997 के बाद के आर.बी.आई. के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान देश की मौद्रिक, वित्तीय, और अर्थव्यवस्था से रूबरू रहे हैं। वाई. वी.रेड्डी 2003 के बाद की आर्थिक तेजी व डी.सुब्बाराव 2008 के ठीक बाद के वित्तीय संकट से वाकिफ रहे हैं। इनका ये भी कहना है कि सकारात्मक परिवर्तन के लिए जब इतने बड़े कदम उठाए जाते हैं तो अस्थायी व्यवधान और असुविधा होती ही है, लेकिन दूरगामी गुणात्मक सु-प्रभावों के प्रकाश में ये अस्थायी असुविधाएं नगण्य हैं। विशाल स्तर पर जनता का समर्थन, अधिकांश विशेषज्ञों का समर्थन, और कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और प्रमुखों का मिल रहे समर्थन को भी अगर विपक्ष नहीं देख पा रहा तो क्या ये समझा जाए कि मोदी के इस सकारात्मक कदम से विपक्षी दलों पर अस्तित्व का संकट आ गया है जो उनकी बौखलाहट से झलक रहा है? 2008 से 2013 तक भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे दुव्वुरी सुब्बाराव मानते हैं कि थोड़े समय के लिए भले ही नोटबंदी से समस्या हो लेकिन बाद में इसके फायदे दिख सकते हैं। डी. सुब्बाराव के अनुसार नोटबंदी बैंकों की ब्याज दर कम हो सकती है। आरबीआई द्वारा कोई नई राहत दिए बिना भी इस फैसले की वजह से बैंंकों का कॉस्ट ऑफ फंड कम होगा जिससे वो लोन पर ब्याज दर कम कर सकते हैं। और अगर बैंक लोन पर ब्याज की दर कम करेंगे तो अर्थव्यवस्था में ज्यादा निवेश होगा। सुब्बाराव के अनुसार रियल एस्टेट में सबसे ज्यादा कालाधन लगा हुआ है। नोटबंदी से इस सेक्टर पर काफी असर पड़ सकता है। सुब्बाराव मानते हैं कि नोटबंदी के बाद नकद कालाधन के खात्मे के बाद जमीन-मकान इत्यादि की कीमतों और किराए में कमी आ सकती है। सुब्बाराव मानते हैं कि कालेधन का अर्थ है वो पैसा जिसके बारे में आयकर विभाग को जानकारी न दी गई हो। यानी कालाधन ऐसा पैसा है जिस पर इनकम टैक्स नहीं चुकाया गया है। नोटबंदी के बाद अघोषित आय पर लगाए गए टैक्स और जुर्माने से सरकारी खजाने में बड़ी राशि आ सकती है। माना जा रहा है कि सरकार नोटबंदी से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.5 प्रतिशत (65 हजार करोड़ रुपए) टैक्स के रूप में पा सकती है। इससे वित्तीय कनसॉलिडेशन बढ़ेगा और सरकार इस पैसे का उपयोग आधारभूत ढांचे को विकसित करने में कर सकती है। इसके
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  अलावा नोटबंदी से नकदी राशि के बाहर आने से प्राइवेट सेक्टर में भी निवेश बढ़ सकता है। उनका मानना हैं कि थोड़े समय के लिए भले ही नोटबंदी से समस्या हो लेकिन थोड़े समय बाद इसके फायदे दिख सकते हैं। नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की एक तरह से सफाई भी होगी जिससे बचत और निवेश पर सकारात्मक असर पड़ेगा। अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता आने से कारोबारी सहूलियत बढ़ेगी। निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा। इससे भारत की उत्पादन क्षमता भी बढ़ सकती है। परंपरागत तौर पर सोने और जमीन-मकान के तौर पर संपत्ति जमा करने वाले भारतीय इसके बाद वित्तीय बचत की तरफ बढ़ सकते हैं जिससे अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। स्वतंत्र भारत में एक बार पहले भी 1978 में ऐसा निर्णय लिया गया था। तब देश में जनता पार्टी की सरकार थी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे। तब देश में पांच हजार के नोट भी चलते थे। परन्तु उस वक्त इतना शोर नहीं मचा था क्योंकि तब बड़े नोट अपेक्षाकृत बहुत कम लोगों के पास थे। उस वक्त रिर्जव बैंक और कुछ चुने हुए बैंकों के सामने ही नोट बदलवाने वालों की कतारें लगी थीं। पर इस बार तो जैसे हर भारतीय विमुद्रीकरण की मार झेल रहा है। सरकार के इस निर्णय के औचित्य, आर्थिक स्थिति पर पडऩे वाले प्रभावों के बारे में अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं, लेकिन यह बात समझनी कतई मुश्किल नहीं है कि कालेधन के शाप से मुक्ति पाने के लिए ऐसी किसी बड़ी कार्रवाई की देश को आवश्यकता थी। सवाल सिर्फ कालेधन का ही नहीं है, सवाल नकली नोटों और आतंकवादियों का हथियार बने पैसों का भी है। इसीलिए, कुल मिलाकर देश की आम जनता ने इस कड़े फैसले को एक हद तक सराहा भी है। लोगों को कठिनाई हो रही है इसमें कोई संदेह नहीं है सरकार की नीति के क्रियान्वयन पर भी सवाल उठ रहे हैं। कहीं-कहीं इस नीति पर भी प्रश्नवाचक चिह्न् लगे हैं। इसके बावजूद नोटबन्दी को देश की जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। लोग बैंको के सामने शान्ति से घंटो लाईनो में खड़े रहकर भी अपने धर्य का परिचय दे रहें हैं। मगर सरकारी स्तर पर लोगो की समस्यायें कम करने की दिशा में प्रभावी उपाय कम हो रहें हैं। सरकार ने छोटे नोट अभी बहुत कम संख्या में जारी किए हैं इस कारण 2000 के नोटों के बाजार मे खुले मिलने में बहुत दिक्कत हो रही है। इसका फायदा बहुत लोग उठा रहें हैं। टोल टैक्स बूथों पर खुल्ले पैसे नहीं देने पर टोल वालों के लठैत वाहन चालकों से अभद्र व्यवहार करते हैं जिससे टोल बूथो पर अक्सर जाम लगा रहता है। इससे वाहनो के टोल बूथो पर जाम में फंसने से बेवजह तेल जलता है व समय भी खराब होता है। निजी अस्पतालों में भी लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। गांवों में कार्ड से भुगतान की व्यवस्था नहीं होने से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को जल्द ही 500 के नए नोट भी जारी करने चाहिए व टोल बूथो पर व्याप्त अव्यवस्थाओं को दूर करने की दिशा में प्रभावी कार्यवाही करनी चाहिए। सरकार को बैंक मैनेजरों पर भी नजर रखनी होगी लगातार आ रही मीडिया रिपोर्ट में बैंक प्रबन्धको की भूमिका सबसे ज्यादा संदेह के घेरे में आ रही है जिनकी जनहित में उच्चस्तरीय जांच होनी जरूरी है। प्रधानमंत्री ने देश की जनता से पचास दिन कष्ट सहने का आग्रह किया है। उनके अनुसार पचास दिन बाद सबकुछ अच्छा-अच्छा हो जाएगा। बैंकों के सामने कतारें लगाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हर एक के पास पर्याप्त ऐसी मुद्रा होगी जो बाजार में काम आ सके। बैंकों में जमा किए गए अरबों-खरबों के नोटों के सहारे देश की अर्थ-व्यवस्था पटरी पर दौडऩे लगेगी। लेकिन मौजूदा हालात में तो 50 दिनो में व्यवस्था सुचारू होती कम ही नजर आ रही है ऐसे में सरकार को आम जन तक नए प्रचलित नोट पहुचाने की गति को और अधिक तेज करना होगा तभी देश की जनता को राहत मिल पाएगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)-रमेश सराफ

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