नोटबंदी से लेकर गधे तक की चर्चा हुई, लेकिन ‘यमराज’ के रुप में खड़ा इन्सेफ्लाइटिस नहीं बना चुनावी मुद्दा..!

नोटबंदी से लेकर गधे तक की चर्चा हुई, लेकिन ‘यमराज’ के रुप में खड़ा इन्सेफ्लाइटिस नहीं बना चुनावी मुद्दा..!

कुशीनगर। इसे विडम्बना कहें या कुछ और लेकिन यह सत्य है कि पूर्वांचल को बेहाल कर देने वाली जानलेवा बीमारी मस्तिष्क ज्वर उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा में चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष अमित शाह, पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत सभी पार्टियों के बडे-बडे नेताओं ने इस इलाके में रैलियां कीं। नोटबंदी से लेकर गधे तक की चर्चा हुई। बिजली के तार पकडने से लेकर नारियल पानी तक व्यंग्य किये गये, लेकिन सत्तर के दशक से बच्चों के लिए “यमराज” के रुप में खडी इन्सेफ्लाइटिस (मस्तिष्क ज्वर) से निजात दिलाने के बारे में कोई ठोस आश्वासन नहीं आया।
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यह चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। शायद मरने वालों में ज्यादातर गरीबों के बच्चे रहे हैं, इसलिए पूर्वांचल की इस बडी समस्या को दरकिनार कर दिया गया। इसके चुनावी मुद्दा नहीं बन पाने का सबसे दु:खद पहलू यह है कि जिन गरीबों के बच्चों को इसने ‘डसा’ है, वे भी इसे मुद्दा बनाने को तैयार नहीं हैं। वे नहीं कह रहे हैं कि जो इस बीमारी को समाप्त करायेगा, वोट उसी को दिया जायेगा। 
महराजगंज के खालिसपुर गांव के राजित राम का 11 वर्षीय पुत्र दो साल से कोमा में है। नौ वर्ष की उम्र में उसे इस बीमारी ने जकडा और देखते ही देखते खाट पर लिटा दिया। उसकी मां उसे निहारती रहती हैं , उसे उम्मीद है कि उसका बेटा एक न एक दिन जरुर उठ खडा होगा। तमाम परेशानियां झेलने के बावजूद मजदूर राजितराम बेटे की बीमारी को लेकर वोट देने को तैयार नहीं है।
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वह कहता है, “भैया, जहां भाई बन्धु वोटवा दिहें, वहीं हमहूं दय दिहल जायी। ” दलित राजितराम कहता है, “वोकरे एक वोट से का होई, कौनो बवन्डर तो न आ जाई। ” जब उससे पूछा गया कि तुम्हारा बेटा जिस बीमारी से ग्रस्त है उसे मुद्दा बनाकर क्यों नहीं वोट देते, उसने तपाक से कहा, “ बाबू गरीबन कय कौन सुनत है। बडन करा लइकन के साथ होत तब अब तक तूफान आय गयल होत। ” इस बाबत गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ का कहना है कि वह निजी तौर पर काफी प्रयास कर रहे हैं।
एम्स की स्थापना हो रही है। गोरखपुर मेडिकल कालेज में इसके लिए विशेष वार्ड बनवाये गये हैं। राज्य में भाजपा की सरकार आते ही और बेहतर उपाय करवायें जायेंगे। सवाल उठता है, कि इस जानलेवा बीमार का प्रकोप साल दो साल से नहीं है।
करीब चालीस वर्षों से इसने पूर्वांचल के बडे हिस्से को जकड रखा है। इन चालीस वर्षों में सभी दलों ने उत्तर प्रदेश पर शासन किया। अभी तक इसका “तोड” क्यों नहीं निकाला गया। जवाबदेही से कोई पार्टी या सरकार कैसे बच सकती है।
उधर, मस्तिष्क ज्वर से पीडित बच्चों की मदद करने वाली एक संस्था से जुडे विनोद शंकर गुप्ता कहते हैं कि सत्तर की दशक से यहां शुरु हुई इस बीमारी ने अब तक नब्बे हजार से अधिक बच्चों की जान ले चुकी है। मृतकों में ज्यादातर गरीबों के ही बच्चे शामिल रहते हैं।
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अमीर तो अपने बच्चों को निजी अस्पतालों में इलाज करा लेता है, लेकिन मारा तो गरीब जाता है, शायद इसीलिये यह बीमारी चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रही है। उनका कहना था कि महराजगंज की नौतनवां विधानसभा सीट की चुनाव के दौरान खूब चर्चा हुई। वहां से चुनाव लड रहे अमनमणि त्रिपाठी सुर्खियों में छाये रहे, लेकिन इन्सेफ्लाइटिस की चर्चा भी नहीं हुई। उम्मीदवारों ने सोशल मीडिया के जरिये वोट तो मांगा लेकिन किसी ने भी नहीं कहा कि उन्हें वोट दीजिये क्योंकि वे इस जानलेवा बीमारी से निजात दिलाने की कोशिश करेंगे।

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