नोटबंदी के एक माह: नकदी को लेकर सरकारी प्रयास नाकाफी साबित..नोटों का पूर्वानुमान लगाने में चूके आरबीआई और एसबीआई

नोटबंदी के एक माह: नकदी को लेकर सरकारी प्रयास नाकाफी साबित..नोटों का पूर्वानुमान लगाने में चूके आरबीआई और एसबीआई

rbi-pti-lनई दिल्ली । देश में नोटबंदी को लागू हुए गुरुवार को एक महीने हो गए। देश में कारोबारी, छोटे दुकानदार, किसान, नौकरीपेशा, ऑटो मोबाइल, रियल इस्टेट और दिहाड़ीदार मजदूर हर कोई नकदी की समस्या से दो-चार है। सरकारी स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए अभी तक जो प्रयास किये गए हैं वे नाकाफी साबित हुए हैं। 500 और 1000 रुपये के बाजार में कुल कितने अमान्य नोट हैं ? दरअसल इसका सही पूर्वानुमान लगाने में आरबीआई और एसबीआई चूक गए। इसलिए इन नोटों को जमा कराने का क्रम एक महीने बाद भी जारी है। प्रधानमंत्री ने आठ नवम्बर को जब 500 और एक हजार रुपये के नोटबंदी का ऐलान किया था तो देश की आम जनता बिना उफ़ किये अगली सुबह से बैंको और एटीएम के बाहर लाइन में खड़ी हो गयी। उसे उम्मीद थी कि इन ठिकानों से तो उसे उसकी जरूरत भर की नकदी मिल ही जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
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 क्योंकि उसके लिए न तो बैंक और न ही एटीएम तैयार थे। देश के कई अस्पतालों में सरकारी फरमान बेअसर साबित हुआ और लोग इलाज़ के अभाव में दम तोड़ गए। एटीएम और बैंको के बाहर लाइन में खड़े कई लोग असमय काल के गाल में समा गए। हालाँकि इसका कोई सरकारी आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है लेकिन आज गुरुवार को राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नवी आज़ाद ने ऐसे लोगों की तादाद 100 से ऊपर बताई। सरकार के स्तर से किये जाने वाले प्रयास कितने कारगर साबित हुए हैं यह सबके सामने है। शुरुआत में तो एटीएम की कैलिब्रेशन ही अपने आप में बड़ी समस्या बन गयी। अब सरकर इससे निपट रही है। इसके अलावा पेट्रोल पम्पों, बिग बाजार और इसी तरह के कुछ और केंद्रों के जरिये सरकार ने लोगों की नकदी की समस्या से निपटने के जो उपाय किये वो महज फौरी ही साबित हुए हैं। लेकिन आने वाले दिनों में चाहे जबरन ही सही, अगर एक बार देश की जनता को ई-ट्रांसैक्शन की आदत पड़ गयी तो कर चोरी से लेकर दहेज़ जैसी कुरीतियां और कानून व्यवस्था से जुड़े तमाम मामले काफी हद तक स्वत: निपट जायेंगे। देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत पार्लियामेंट में भी 16 अक्टूबर से इस मुद्दे पर विपक्ष का विरोध और धरना प्रदर्शन जारी है।
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 शीतकालीन सत्र में कोई भी एक ऐसा दिन नहीं है जिस दिन यह कहा जा सके कि कोई भी एक सदन दिन भर काम काज किया हो। संसद के बाहर (जंतर-मंतर) तथा कई शहरों में लोगों ने जाम लगा कर और धरना-प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी का इजहार भी किया लेकिन देश की ज्यादातर जनता इस सरकारी फैसले को चुपचाप सहन कर रही है। जिसे सरकार यह कह रही है कि देश की जनता उसके साथ है। सरकारी आंकड़े रबी की बुवाई के चाहे जो भी दावे करें लेकिन असलियत तो सुदूर गांव में किसानों के बीच जाकर ही पता चलेगी क्योंकि उसे बीज, उर्वरक और कीटनाशक के लिए नकदी नहीं मिल पाई। खरीफ की जो उपज किसान के घर में आयी, उसे खरीदने के लिए व्यापारी के पास नकदी का टोटा है, लिहाजा वह या तो उसे क्रेडिट पर खरीद रहा है या फिर किसान अपनी उपज को सहेज कर रख रहा है। छत्तीसगढ़ में किसानों से टमाटर की उपज वाजिब दाम पर नहीं खरीदने के कारण किसान सड़कों पर फेंक कर अपना विरोध जताने को मजबूर है। यह इस देश के किसान की परेशानी को समझने की नब्ज भर है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि 30 दिन में हालात ठीक हो जायेंगे और 50 दिनों में पूरी तरह सामान्य हो जायेंगे। वित्त मंत्री कह रहे थे कि एक पखवाड़े में हालात ठीक हो जायेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
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 अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह रहे है कि हालात सामान्य होने में तीन महीने लगेंगे। बाजार का यह आलम है कि सरकार ने बचत खाते और करंट अकाउंट के लिए जो लिमिट क्रमश: 24 हजार और 50 हजार निर्धारित की है, बैंकों के पास नकदी की बनी हुई किल्लत के चलते वह अमाउंट मिल नहीं पा रहा है। घंटो लाइन में खड़े रहने के बाद जब ग्राहक की कैश लेने की बारी आती है तो वह सरकारी घोषणा और बैंक के पास पर्याप्त नकदी के संकट की स्थिति से रूबरू होता है। बैंक स्टाफ कैश कम होने की दुहाई देकर आपकी लिमिट से कम नकदी देता है। एटीएम पर भी किस्मत वाले को ही नकदी मिल पाती है। क्योंकि कई बार लाइन में पीछे खड़े लोगों का नम्बर आने तक कैश ही ख़त्म हो जाता है। बाजार ठन्डे पड़े हुए हैं। खाने-पीने के होटल-ढाबों की आमदनी घट गयी है। उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कंस्ट्रक्शन की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एल एंड टी के 4000 कर्मचारियों की छंटनी भी इसी दौरान हुई है। कहने के लिए वजह कुछ भी हो सकती है।
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सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स की मानें तो नोटबंदी की वजह से नवंबर में कारों की बिक्री पर बुरा असर पड़ा है। एसोचैम का कहना है कि नोटबंदी के नकारात्मक असर भी हैं। इंडस्ट्रीज पर बुरा असर पड़ रहा है, लोगों की नौकरियां जा रही हैं। पाकिस्तान और रूस के दूतावासों ने अपने स्टाफ के खर्च के लिए पर्याप्त नकदी नहीं मिलने पर विरोध जता चुके हैं। जहाँ तक काला धन की बात है तो आरबीआई ने नोटबंदी के समय आंकलन किया था कि बाज़ार में 500 और 1000 रुपये के नोटों के गुणक में कुल करीब 14.17 लाख करोड़ रुपये थे। लेकिन बुधवार की शाम की क्लोजिंग के समय 500 और 1000 रुपये के नोटों के गुणक में 11.55 लाख करोड़ रुपये जमा हो चुके थे।
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 शुरुआत में देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक वे आशंका व्यक्त की थी कि 500 और 1000 रुपये के नोट वाले करीब ढाई लाख करोड़ रुपये सिस्टम में वापस नहीं आएंगे। लेकिन अगर कल तक के क्लोजिंग रिकॉर्ड को खंगालें तो पता चलता है कि इस आंकलन में आरबीआई और एसबीआई दोनों ही चूक गए। क्योंकि अगर आरबीआई के पूर्वानुमान पर भरोसा किया जाये तो फिर तो अमान्य नोटों को जमा करने की प्रक्रिया अब रुकनी चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। इन नोटों को जमा कराने का क्रम सतत रूप से जारी है।
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