नेताओं की मौत बन जाती है पहेली

नेताओं की मौत बन जाती है पहेली


सत्ता की चौसर पर शह-मात के खेल में कई तरह के दांव चले जाते हैं। नेताओं की मौत को छिपाने और उजागर करने के पीछे एक पूरी कवायद होती है। इतिहास गवाह है कि बड़े नेता की मौत से किसी को फायदा और नुकसान होता है।
हाल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मौत पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। मौत अथवा उनकी लंबी बीमारी को राजनीतिक नफा-नुकसान के रूप में देखा जा रहा है। कई सवाल हैं जो पूर्व में भी बड़े नेताओं की मौत के बाद उठे। भारत ही नहीं, दुनियाभर में बड़े नेताओं की मौत के बाद कई ऐसे राज होते हैं जो उनके साथ ही दफन हो जाते हैं।
भारतीय राजनीति में कई नेताओं की असमय मौत को ले कर कोहरा छाया रहता है। इन मौतों पर चर्चाओं का दौर गाहे-बगाहे चलता रहता है लेकिन इनके कारणों को सामने लाने में राजनीतिक दल और नौकरशाही ज्यादातर चुप्पी ही साधे रहती है।
कई नेताओं की मौत आज भी पहेली बनी हुई है। एक सिरा मिलता है, दूसरा नदारद। देश के कई लोकप्रिय नेताओं की असमय मौत का रहस्य आज भी कायम है। इनकी मौत के बारे में लोगों में चर्चाओं का दौर चलता रहता है लेकिन इन सवालों के पुख्ता जवाब कभी नहीं मिल पाते हैं।
जे.जयललिता 75 दिन अस्पताल में रहीं। उनको बुखार और निर्जलीकरण की शिकायत थी। फिर करीब 1० दिन बाद फेफड़ों में संक्रमण की बात कही गई। श्वसन रोग की भी बात सामने आई। कहा जाता है कि जयललिता मधुमेह से ग्रस्त थी। उसकी भी आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं की गई। ब्रिटेन के डॉ.रिचर्ड बीले ने एक्स और अपोलो के विशेषज्ञों के साथ मिल कर उनका इलाज किया था। विदेशी फिजियो भी बुलाए गए थे।
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उनके निधन से कुछ दिन पहले अपोलो अस्पताल के चेयरमैन डॉ.प्रताप सी.ने उनको पूरी तरह फिट और घर लौटने लायक बताया था। इस बीच 4 दिसंबर को उनको दिल का दौरा पड़ा और अगले दिन मृत्यु हो गई।
उनके समर्थकों को जिंदगी भर इस बात का मलाल रहेगा कि वे उन 75 दिनों में जयललिता की जीवित झलक नहीं देख पाए। सोशल मीडिया में इस दौरान कई बार उपचाररत जयललिता की फर्जी तस्वीरें जारी हुई तो कई दफा उनको मृत घोषित कर दिया गया था। कोई उनके ब्रेन डेड होने की बात कह रहा था। बीच-बीच में अपोलो अस्पताल बुलेटिन जारी कर वेंटीलेटर पर होने की बात कहता। उनके निधन से कई लोग सदमे में हैं। अन्नाद्रमुक का दावा है कि जयललिता के निधन व बीमार होने की खबर से 28० लोगों की मौत हो चुकी है।
जनता भी दबी आवाज में कुछ ऐसे ही संदेहास्पद सवाल उठा रही है। उनकी राय है कि अब तो अपोलो अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज जारी किए जा सकते हैं? सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही? अभिनेत्री गौतमी ने तो जयललिता की मौत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मामले की जांच की मांग की है।
इसी तरह निरून्नलवेली के एक युवक ने आरटीआई में अस्पताल में पूर्व मुख्यमंत्री को दिए गए इलाज और उनके निधन को ले कर की गई घोषणाओं समेत करीब दो दर्जन सवाल के जवाब मांगे हैं जबकि अपोलो अस्पताल के चिकित्सकों ने दो दिन पूर्व इलाजरत जयललिता के साथ बिताए पलों के अनुभव बांटे।
हमारे देश में राजनेता इसलिए भी अपनी बीमारी का खुलासा नहीं करते क्योंकि उन्हें अपनी पार्टी और विरासत के नुकसान का डर रहता है। सोनिया गांधी जब अमरीका के एक अस्पताल में इलाज के लिए जाती हैं तो उनकी बीमारी का खुलासा नहीं किया जाता। हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को किडनी फेल होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया। हमें यह अचानक हुई बीमारी लगती है पर वे काफी वक्त से इस समस्या से गुजर रहे होते हैं।
राजनीतिक दल वोट बैंक को कायम रखने के लिए भी ऐसा करते हैं। समर्थकों को भरोसा रहता है कि उनके नेता सक्रिय हैं और स्वस्थ हैं। इसके पीछे वजह परिवारवाद और संरक्षणवाद की राजनीति है। राजीव गांधी का जिस बम धमाके में निधन हुआ, उसके बारे में कहा जाता है कि सुरक्षा में चूक जानबूझ कर की गई थी यानी इन नेताओं के बारे में कभी स्पष्ट स्थिति राजनीति में नहीं बताई जाती है बल्कि उसका जब-तब लाभ ही उठाया जाता है।-नरेंद्र देवांगन

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