नयी शिक्षित पीढ़ी को सदाचार की भी शिक्षा दें..!

नयी शिक्षित पीढ़ी को सदाचार की भी शिक्षा दें..!

हमारी वर्तमान शिक्षापद्धति में भाषाएं, गणित, विज्ञान, इतिहास, कंप्यूटर जैसे अनेक जीवनोपयोगी विषयों की शिक्षा को प्रमुखता दी जाती है। ऐसी शिक्षा पद्धति छात्रों को अपनी अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार विविध विषयों का उन्नत ज्ञान प्राप्त करते हुए जीविकोपार्जन करने के लिए अवश्य सक्षम बनाती है।
बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रवृत्तियों ने ऐसा वातावरण उपस्थित कर दिया है कि इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर, प्रबंधक जैसे विषयों की उपाधियां प्राप्त करने पर युवक युवतियां कैंपस सेलेक्शन द्वारा ही ऐसे ओहदे पर जाते हैं जिनका सालाना वार्षिक वेतन दस बारह लाख रूपये तक का है। पर क्या ऐसी शिक्षा पद्धति सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य का निर्माण करने में भी सफल है? नयी शिक्षित पीढ़ी की जीवनशैली देखकर हमें तो यही बताना पड़ता है कि ‘शायद नहीं।’ कारण यही है कि स्वार्थता से परार्थता की ओर ले जाने का अपना दायित्व वर्तमान शिक्षा पूरी नहीं कर पाती। आत्म संयम का प्रशिक्षण देने में भी वर्तमान शिक्षा सफल नहीं हो पाती। फलस्वरूप हमारी नयी शिक्षित पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग दिखाई देती है पर कर्तव्यों के प्रति विमुख। उपभोगवाद के वे बुरी तरह शिकार हो रहे हैं। बूढ़े मां-बाप की उपेक्षा करते हुए वे सुखभोग के साधन जुटा रहे हैं। उत्तम मानवीय मूल्यों की शिक्षा में हमारे धार्मिक ग्रंथों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। किसी भी धर्म के आधारभूत ग्रंथों को लीजिए। उनमें ऐसी अनेकों कथाएं मिलती हैं जो पाठकों व श्रोताओं में क्षमा, स्नेह, त्याग, करूणा, सत्यनिष्ठा जैसे उदात्त मानवीय मूल्यों का संचरण कर सकती हैं। उन्हें यथार्थ मानव बना सकती हैं।
कैलेंडर की कहानी

प्राचीन समय में धार्मिकता का जो प्रमुख स्थान था, वह धीरे-धीरे लुप्त होता गया है। आज राजनीति ने धर्म को पीछे धकेलते हुए अग्रासन ग्रहण किया है। चूंकि हमारे संविधान ने धर्म निरपेक्षता का सिद्धांत अपनाया है, इसलिए राजनीतिक दल प्राय: अपने को धर्म विशेषों से अपने को मुक्त रखने का प्रयत्न करते हैं।
धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या की जाती है कि सार्वजनिक शिक्षा पद्धति में किसी धर्मग्रंथ को या किसी धर्म के सिद्धांतों को स्थान नहीं दिया जा सकता। धर्मनिरपेक्षता की सही अवधारणा क्या होनी चाहिए, इस पर पर्याप्त चर्चा अभी तक शायद नहीं हो पायी है। सर्वधर्म समानता की दृष्टि अभी विकसित नहीं हो पायी है। वर्तमान स्थिति यह है कि धार्मिक ग्रंथों का अध्यापन सार्वजनिक शिक्षा पद्धति के बाहर ही किया जा सकता है, यानी हर धर्म अपने ग्रंथों के अध्यापन के लिए अपना अपना प्रबंध करें तो यह कार्य सुगमता पूर्वक हो सकेगा अन्यथा नहीं।
हमारे देश में स्थिति यह है कि इस्लाम, ईसाई, जैसे धर्मों के आराधनालयों में उनके धार्मिक ग्रंथों के अध्यापन के लिए काफी व्यवस्था की जाती है जबकि हिन्दू धर्म के आराधनालयों में इसकी कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं है। जिन मंदिरों में प्रतिमाह भक्तों की तरफ से लाखों करोड़ों रूपये की आय मिलती है वे भी शायद धार्मिक शिक्षा देने के लिए कोई विशेष प्रबंध नहीं करते। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
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राष्ट्रीय स्तरीय व राज्य स्तरीय धर्मिक संगठनों को इस दिशा में आगे बढऩे के लिए कोई सफल कार्यनीति बनानी है। यदि हर मंदिर में सायं कालीन, प्रात:कालीन रविवारीय पाठशाला चला सकें तो वहां बच्चों को रामायण, भागवत, महाभारत, श्रीमदभगवदगीता जैसे धार्मिक ग्रंथों का यथासंभव परिचय दिया जा सकेगा। इसके लिए राष्ट्र स्तर पर कोई सुगठित पाठ्यक्रम का निर्माण हो, अध्यापकों को उचित पारिश्रमिक देने की व्यवस्था हो और इन ग्रंथों के सस्ते सटीक संस्करण हर भारतीय भाषा में उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था हो। चूंकि गीता, उपनिषद जैसे ग्रंथों की मूल रचनाएं संस्कृत में हैं इसलिए संस्कृत का सामान्य परिचय भी बच्चों को दिया जा सके तो अच्छा होगा। योग की शिक्षा का भी प्रावधान हो सकता है।
हमारे समाज में महिलाओं के प्रति जो दुष्कर्म बढ़ रहे हैं, नर हत्या के जो हादसे बढ़ रहे हैं, राजनीतिक भ्रष्टाचार का जो कुहरा छा रहा है, इन सबसे मुक्ति पाने के लिए इससे अच्छा और क्या उपाय हो सकता है?
– के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

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